त्रिदेव शक्ति – ब्रह्मा विष्णु महेश

      श्रीहरी  विष्णुनारायण।

         श्री सृष्टी रचयता ब्रह्मदेव।

  श्री सदा शिवशंकर।

     सनातन धर्म शास्त्र अनुशार श्रीहरी विष्णु, श्री ब्रह्मदेव, श्री सदाशिव यह त्रिदेव ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से उत्पन्न हुए उनके पुत्र है। इस पृथ्वी के सभी मनुष्यों को अपने जीवन मे कौन से कर्म करने चाहीये एवं कौन से कर्म नहीं करने चाहीये वह ज्ञान हमे त्रिदेव सिध्धांत से मीलता है। भारत की आने वाली नयी पिढी के लीये हमारे ज्ञानी ऋषिमुनी ओने यह अनमोल दिव्यज्ञान त्रिदेव सिध्धांत के ज्ञानरहश्य को मुर्तीरहस्य मे सुरक्षीत कीया था। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के साथ एकात्मता रख अपने जीवन मे धर्मज्ञान, कर्मयोग, आध्यात्म का संकलन कर कैसे सद्कार्य करना चाहीये वो ज्ञान हमे त्रिदेव सिध्धांत से मीलता है। ज्ञानी ऋषिमुनीओ के दीव्य त्रिदेव सिध्धांत श्रीहरी विष्णु, श्री ब्रह्मदेव, श्री सदाशिव का ज्ञान विश्व के समस्त सभ्य सनातन समाज को मीला अनमोल धर्मज्ञान है।

 

। श्रीहरी विष्णुनारायण ।

    श्रीहरी विष्णुनारायण का स्मरण करे वो क्षीर सागर में पांच मुंह वाले शेषनाग पर विराजमान है। शेषनाग श्रीहरी विष्णुनारायण के मस्तक पर अपने पांच मुख फैलाए छत्र बनाए हुए है। श्रीहरी विष्णुनारायण के चार भुजाए है चारो भुजाओ में अलग अलग शस्त्र शंख, गदा, कमल, एवं सुदर्शन चक्र है। श्रीहरी विष्णुनारायण जी की धर्मपत्नी श्री महालक्ष्मी देवी है जो श्रीहरी के चरण कमल की सेवा कर रहे है। श्री महालक्ष्मी देवी धन-धान्य, कर्मफल एवं सामाजीक व्य्वस्था के अधिष्ठाता देवी है। श्रीहरी विष्णु देव धर्म की स्थापना एवं अधर्म के विनाष के लीये युगोयुगो से इस पृथ्वी पर जन्म धारण करते है। श्रीहरी विष्णुनारायण की नाभि कमल में से सृष्टी रचयता श्री ब्रह्मदेव प्रगट हुए है। श्रीहरी विष्णुनारायण जहा निवास है उसे वैकुंठ कहा जाता है। सर्व पक्षी ओ मे श्रेष्ठ गरुड़ श्रीहरी विष्णु के वाहन है।

 

      इस का अर्थ प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ ने कुछ इस प्रकार कीया है। क्षीरसागर अर्थात यह विश्व एवं श्री विष्णु अर्थात इस विश्व में बसने वाला नर (मनुष्य) है। नारायण का अर्थ इस विश्व में रहेने वाला नर जो सद्कर्म कर नर में से नारायण बनता है। पांच मुह वाले शेष नाग का अर्थ काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया जो दिव्य इन्द्रिय है वो इस विश्व में रहने वाले सभी नर अर्थात मनुष्य के मस्तक पर विविध मनोभावना के स्वरूप सवार होता ही है। मनुष्य जो सुनता है जो देखता है जो अनुभव करता है वो सभी यह पंच दिव्यइन्द्रिय वृति से होकर उसके मन चित पर प्रभाव डालते है। जो मनुष्य अपने जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया का समप्रमाण उपयोग कर शांतचित से चारो भुजा ओ से सदकर्म करता है वही मनुष्य नर से नारायण बन वैकुंठ का सुख भोगता है। 

 

     श्रीहरी विष्णुनारायण के चारभुजा है और चार भुजा मे अलग अलग अस्त्र शस्त्र है उनका अर्थ यह है।

 

१. शंख। शंख कीसी भी प्रकार के धर्मकार्य, सामाजीक शुभकार्य एवं धर्मयुध्ध जैसी विकट परीस्थीती मे सर्व प्रथम बजाने वाला वाध्य है। श्रीहरी  विष्णु नारायण भी इस विश्व में सभी शुभकार्य, धर्मकार्य एवं धर्मयुध्ध के अवसर पर समाज के धर्म के कल्याण में सर्व प्रथम होते है।

     श्रीहरी विष्णुनारायण द्वारा इस विश्व के सभी मनुष्य को संदेश मीलता   है की हमें शुभकार्य में, धर्मयुध्ध में, कुदरती या मानव सर्जित विकट परिस्थिति में सर्व समाज को मददरूप होने में प्रथम रहना चाहीए। धर्मज्ञान में, धर्मकर्म में, धर्मयुध्ध में जो मनुष्य प्रथम रहता है वो नर नहीं शाक्षात श्री नारायण का स्वरुप ही है।

 

२. गदा। गदा कर्मशक्ति का प्रतिक है। जहा गदा का प्रहार होता है वहा सब परीपूर्ण होता है। श्रीहरी विष्णुनारायण जो भी शुभकार्य की शुरुआत करते है वह शुभकार्य हमेशा परिपूर्ण होता है कभी भी अधुरा नहीं रहता। श्रीहरी विष्णुनारायण इस विश्व के सभी मनुष्य को संदेश देते है सर्व मनुष्य जो शुभकार्य का शरुआत करे वो महेनत संधर्ष से परिपूर्ण कर के ही रहे। कभी भी कोई भी कार्य अधुरा नही छोडना चाहीए सोच समज के जो शुभकार्य की शरुआत कर दी फिर कीसी भी वीपरीत परीस्थीती मे भी शुभकार्य पूर्ण करे वो नर नहीं नारायण ही है।

 

३. सुदर्शनचक्र। सुदर्शनचक्र कोई भी सुंदर, सुरुप तरीके से चलती निरंतर क्रिया जिसके द्वारा धर्म, समाज में दिव्य संदेश मीलता हो उसका प्रतिक है। श्रीहरी विष्णुनारायण अपना धर्मकार्य निरंतर चलायमान रखते है। श्रीहरी विष्णु समस्त विश्व के मनुष्य को सृष्टि के कर्मयोग ज्ञान का अच्छा दर्शन करवाते है एवं निरंतर धर्मकार्य करने की प्रेरणा देते है। श्रीहरी विष्णु नारायण इस विश्व के समस्त मनुष्यो को संदेश देते है की सभी मनुष्य को अपने जीवन मे कर्म निरंतर करते रहना है। कोई भी कार्य करते करते कभी भी रुकना नहीं एवं समाज को धर्म को राष्ट्र को अपने से जो अच्छा है वह अर्पण करना है। जो मनुष्य निरंतर कर्म करता है एवं समाज, घर्म, राष्ट्र को अपना जो अच्छा है वह अर्पण करता है वो मनुष्य नर नहीं नारायण है।

 

४. कमल।  कमल हमेशा कीचड़ में ही खिलता है एवं कमल पवित्रता की निशानी है। श्रीहरी विष्णुनारायण कीसी भी विकट परिस्थिति में सम रहते है पवित्र रहते है बुद्धि से स्थिर रहते है। श्रीहरी विष्णुनारायण द्वारा इस पृथ्वी के समस्त मनुष्य को संदेश मीलता है की धर्मकार्य मे कीसी भी प्रकार के आर्थीक व्यवहार मे धर्मयुध्ध के कार्य मे सम एवं प्रामाणीक रहना चाहीये। कीसी भी प्रकार के सामाजीक सबंध में माता-पिता के सबंध में पुत्र-पुत्री एवं पति-पत्नी के सबंध में भाई-बहन एवं सगे सबंधी ओ के सबंध में सम एवं प्रामाणीक रहना चाहीये। कीसी भी प्रकार के व्यवहारीक लेन देन मे प्रामाणीक ओर पवित्र रहना है। पूर्ण कर्तव्य से प्रामाणीक एवं पवित्रता से सभी सामाजीक, धार्मीक, राष्ट्रीय कर्तव्य निभाने चाहीये। जो मनुष्य इस प्रकार प्रामाणीक एव्ं पवित्रता से अपने कर्तव्य ओर सभी सामाजीक सबंध निभाते है वह नर नहीं नारायण है।

 

     इस विश्व में रहने वाले सभी मनुष्य के मनोचित में काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया यह पांच दिव्य इन्द्रिय के जो मनोभाव है वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने दी हुई सभी मनुष्य को अनमोल भेट है। यह दिव्य इन्द्रिया काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया के भाव को अपने जीवन में सम उपयोग कर सदकर्म एवं धर्मकार्य करना चाहीये। इन पांचो दिव्यइन्द्रियो का अपने जीवन मे भोगविलास के नाम अतिरेक या पंथ संप्रदाय के नियम पालन के नाम दमन करना विकृति है। पंथ संप्रदाय के नाम अपने जीवन मे कीसी भी प्रकार से विकृती को लाना श्रीहरी विष्णुनारायण एवं ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अपराध है।

 

     जो मनुष्य शांत चित से चारो भुजाओ से जो शस्त्र प्रतीक है वह दिव्य संदेश के अनुसार अपना कर्म करता है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने जो अनमोल भेट दी है वह सर्प रूपी पंच दिव्यइन्द्रियो का जीवन में सम उपयोग करके अपने जीवन कर्म पूर्ण निष्ठा एवं पवित्रता से परीपुर्ण करता है, वो मनुष्य सच में नर नहीं किंतु नारायण के रूप में है। ऐसे नर के पास ही सुख, एश्र्वर्य, समृद्धि और मान-सम्मान होगा जीसका उपभोग कर मनुष्य वैकुंठ जेसा स्वर्ग सुख भोगता है। इसी लीये एश्वर्य, धन, धान्य एवं समृध्धी के प्रतीक माता श्री महालक्ष्मीजी श्रीहरी  विष्णु के धर्मपत्नी कहलाते है। इस विश्व के सभी मनुष्य जो कर्म महेनत करते है उसके कर्म फल यानी उसके अर्थ आजीवीका एवं सुख समृध्धी के अधिष्ठाता देवी श्री महालक्ष्मीजी है।

 

     सर्वपक्षी ओ मे सर्वश्रेष्ठ गरुडजी को श्रीहरी विष्णु के वाहन का स्थान मीला है। अर्थ गरुड़जी बहूत ही ऊपर तक उडान भरते है और गरुडजी की द्रष्टि नीचे धरापर छोटे से छोटी चीजो पर भी होती है। अर्थात जीस मनुष्य का जीवन ध्येय बहूत ही उच्च हो लक्ष्य बहूत ही बड़ा हो जीवन कक्षा और मूल्य बहूत ही उच्च हो। किंतु सभी छोटी और मुलभुत तत्वो की भी जो अनदेखी नहीं करता वह मनुष्य अवश्य उच्च पद प्राप्त कर के नर से नारायण स्वरूप बनता है।

 

     प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ ने श्रीहरी विष्णुनारायण का जो स्वरूप बताया है उस अनुरुप से जो मनुष्य अपना जीवन जीता है अपने जीवन में   उच्चकर्म कर उच्चपद प्राप्त करने वाले मनुष्य हमेशा बुद्धिमान एवं ज्ञानी होगा। यानी ऐसे उच्चपद को प्राप्त मनुष्य में ज्ञान भी होगा और सद्बुद्धि भी होगी इसी लीये ही पुराणो में कहा है की ज्ञान के देवता सृष्टीरचयता श्री ब्रह्मदेव श्रीहरी विष्णुनारायण की नाभिकमल में से प्रगट हुए है।

 

     ब्रह्म का अर्थ ज्ञान बुद्धि से है जो मनुष्य अच्छे कार्य कर नर से नारायण स्वरूप अवस्था को प्राप्त होते है। उसी मनुष्य में समबुद्धि होती होगी एवं उस मनुष्य मे विवेक, समज ज्ञान होता है ब्रह्मचर्य का सत्यअर्थ अपने जीवन मे ज्ञान आधरीत आचरण करना है। जो मनुष्य अपने जीवन मे इस ज्ञान आधरीत आचरण वाले ब्रह्मचर्य का व्रत लेता है उस मनुष्य का ही जप, तप, बल, बुध्धी, तेज, पराक्रम का व्रुध्धी होता है। भारत के प्राचीन रुषीमुनि अपने गुरुकुल आश्रम मे अपनी पत्नी संग ग्रहस्थ सुख भोगते हुए यह ज्ञान आधरीत आचरण वाले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे। महाबली हनुमानजी एवं समस्त रुषीमुनि अपने जीवन मे ज्ञान आधरीत आचरण से ही ब्रह्मचारी कहलाय है। 

 

     इस पृथ्वी पर श्रीहरी विष्णुनारायण के कर्म सिध्धात अनुरूप अपने जीवन मे ज्ञान आधरीत आचरण वाले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर्ता महा मानवो के धर्मकार्य एवं धर्मरक्षा के कार्यो को बृहद जनसमुदाय हमेशा उन्हें आदर भावना से देखते है। उन महामानवो के कीये गए धर्मकार्य द्वारा उनका बृहद जनसमुदाय युगो सदियो तक उन महामानवो का अनुसरण करता है।

 

     ऐसे महामानव युगोयुगो से इस पृथ्वी पर धर्मकार्य को धर्मस्थापना को अवतरण करते है। श्री रामचंद्र एवं उनके पहले के श्रीहरी के छेह आवतार को मानव सभ्यता विकास कड़ी एवं मानव कल्याण के कार्य, धर्मस्थापना के महाकार्यो के लीये नर नहीं श्रीहरी विष्णुनारायण के अंश कहलाते है। इसी लीये ही सनातन मान्यता मे धर्मपालक एवं अपने जीवन चरीत्र से मानव सभ्यता का शिखर मापदंड बनने वाले महामानव श्री रामचंद्र को श्रीहरी विष्णु नारायण का अवतार ही माना गया है जो सत्य है। मानव सभ्यता की विकास कड़ी को भी श्री विष्णु अवतार कहा गया है।

 

1. मच्छ अवतार – जीवन की सरुआत जल में हुई।

2. कच्छप अवतार – जीवन जल से निकल भूमि पर आया।

3. वराह अवतार – जीवन भूमि पर दलदल में विकसित होने लगा।

4. वामन अवतार – जीव वामन से मनुष्य के विराट स्वरुप  की और आगे बढा।

5. नरसिंह अवतार – पूर्ण रूप पशु से मनुष्यतय की और क्रमीक विकास हुवा।

6. परशुराम अवतार – मनुष्य आदीमता से बहार आ धनुष एवं कुल्हाडी (परशु) का प्रयोग कर अपनी सिध्धता साबित करी।

7. श्री रामचन्द्र अवतार – मानव सभ्यता का शिखर मापदंड

मनुष्य सभ्यता के नीती नियम का गठन हुवा।

 

      इस विश्व के समस्त मनुष्यो को श्रीहरी विष्णुनारायण से प्रेरणा मीलता है की अपने अंतर मे प्रगट हुए सद्ज्ञान द्वारा सद्बुद्धि द्वारा हमेशा धर्मकार्य करने चाहीए। जीस प्रकार प्राचीन भारतीय ऋषिमुनीओ ने श्रीहरी विष्णुनारायण का स्वरूप समजाया है उस प्रकार ही मनुष्य का जीवन कर्म होना चाहीये एवं जीवन सैली होनी चाहीए। सभी मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, जो दिव्येद्रीय है उस का अपने जीवन में सम उपयोग कर अपने आपको मीली सामाजीक, आर्थीक, धार्मीक कर्तव्य को प्रामाणीक ता से निभाना चाहीये। हाथ में लीया हुआ कोइ भी कार्य पूर्ण करना चाहीए हमेशा सद्कार्य करते रहना चाहीये। समाज मे धर्म मे दुसरे लोगो को भी सद्कार्य करने धर्मकार्य एवं धर्मयुध्ध करने को प्रोत्साहीत करने चाहीए। अपने जीवन मे हमेशा पवित्रता रखनी और अच्छे कार्य को धर्मदान को, धर्मकर्म को, धर्मयुध्ध को कोई भी विपत्ती मे समाज को राष्ट्र को मदद करने को हमेशा प्रथम रहना चाहीए। जीवन ध्येय हमेशा उच्च रखना चाहीए छोटी छोटी बातो को भी कभी अनदेखा नहीं करनी चाहीए हमेशा महेनत, संधर्ष से कार्य करने से अवश्य एक मनुष्य नर नहीं किंतु नारायण स्वरूप ही कहलाता है।

 

       अपने जीवनको कीस प्रकार जीना वो सभी मनुष्य को समजना चाहीये। बस नर बनके रहना या कुछ विशेष धर्मकार्य करके नारायण स्वरुप बनना वो सभी मनुष्य के अपने विवेक बुद्धि पर आधारित है। “जीस मनुष्य को उच्च जीवन ध्येय नहीं जीसके रदय में प्रेम भाव नहीं जीसकी बुध्धी सम नहीं जो मनुष्य धर्म का पालन नही करता वो मनुष्य पृथ्वी पर बोझ रूप ही है।”

 

      सनातन धर्म मे हम सुनते है की भक्ति करो भक्ति करो। भक्ति करने से जीवन का बेडा पार होता है किंतु भक्ति का अर्थ क्या? और सनातन धर्म अनुसार कीसकी भक्ति करनी चहीए यह प्रश्न का उत्तर आज सभी मनुष्य के पास है। श्रीहरी विष्णुनारायण सभी मनुष्य के आराध्य देव होने चाहीए और श्रीहरी विष्णुनारायण की भक्ति करनी चाहीए। अर्थात सभी मनुष्य को श्रीहरी विष्णुनारायण जैसे बनना है। प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ ने जो ज्ञान बताया उस अनुसार से ज्ञान आधरीत आचरण वाले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए जिवन कर्म करना है। जीवन मे उच्च ध्येय रखना एवं उच्च जीवन ध्येय सिद्ध करने के लीये करना पड़ता कठोर परिश्रम और संघर्ष ही सच्ची भक्ति है। उच्च जीवन ध्येय की प्राप्ती के लीये करना पड़ता परिश्रम या संघर्ष ही भक्ति कहलाती है। प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ ने इस लीये ही भक्ति का इतना महिमा गाया है।

 

      आज अज्ञान के अंधकार मे डुबे कीसी भी मनुष्य का कोई उच्च जीवन ध्येय नहीं है। अधिकतर मनुष्य भूतकाल को याद करते है किंतु भूतकाल से कोइ जीवनबोध नहीं लेते है। भविष्य में प्राप्त हो पाए एसा ऊँचा जीवन ध्येय रख अच्छे भविष्य के आयोजन के बदले सब अच्छा नहीं होता इस डर से भविष्य की अमंगल अवधारणा कर निराशा के अंधकार मे डुब जाते है। वर्तमान में जो सदकर्म, धर्मकार्य करना है जो महेनत करनी है जो वर्तमान का सुख प्राप्त करना है उसका सत्यानाश करते है।

 

      अज्ञान ही मनुष्य एवं मनुष्य समूह का सबसे बड़ा सत्रु है। अज्ञानी मनुष्य ही बारबार दूसरी असभ्य एवं मौलीक धर्म से विपरीत पंथ संप्रदाय के वैचारीक प्रभाव में आ जाता हे। और एक अज्ञानी ही धर्म विरुध्ध पंथ संप्रदाय के नियम पालन से अपना आचरण बदल कर स्वयम एवं अपने धर्मसमूह, राष्ट्र को संकट में डाल देता है। एक अज्ञानी ही भीरु एवं कायर होता हे जो अपने समूह के संकट समय एक होने के बजाय आपस में लड़ने लगता हे। एक अज्ञानी एवं उनका समूह ही अपने बच्चो को अपने मूल धर्मसंस्कार, संसकृति, इतिहास की शिक्षा से वंचित रखने का पाप करता हे। एक अज्ञानी ही अपने अपनों के विरुध्ध अपने समुदाय के सत्रु से मित्रता कर उनका दास गुलाम बन जाता है। एक अज्ञानी ही पंथ संप्रदाय के प्रभाव में वैराग्यक बन अपने कर्मो को दोष देता अपने और अपने समुदाय के अंत की और अग्रेसर होता है। 

 

      एक ज्ञानी ही निर्भय होता है, एक ज्ञानी ही दुसरो को अपने प्रभाव में ला सबका दिशानिर्देश कर सबका प्रेरणाश्रोत बनता हे। एक ज्ञानी एवं उसका समूह ही एक हो एकात्म हो पुरे विश्व में सबको अपने प्रभाव में ला सबको अपना दास बना अपने सनातन धर्म का विजय धर्मध्वजा लहराता है। ज्ञानी मनुष्य वो है जो प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ ने बताये हुए श्रीहरी विष्णुनारायण के कर्म सिद्धांत अनुरूप अपने जीवन में उच्च जीवनध्येय रख वह प्राप्त करने के लीये कठिन महेनत करता है परीश्रम करता है। प्रेम पूर्वक प्रमाणीकता से अपने कर्तव्य पूर्ण कर सफल जीवन जीता है। जो मनुष्य धर्मकर्म के लीये धन से, धर्मज्ञान के लीये मन से, धर्मयुध्ध के लीये तन से सदा उपलब्ध रहता है वही मनुष्य कर्मफल अर्थ मोक्ष को प्राप्त कर सर्व वैकुठ सुख को प्राप्त करता है।

 

  २. सृष्टी रचयता श्री ब्रह्मदेव।

        प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ के बताये ज्ञान अनुशार श्री ब्रह्मदेव श्रीहरी विष्णुनारायण की नाभिकमल में से प्रगट हुए देव है। श्री ब्रह्मदेव प्रगट होने के बाद कभी भी ये जान नही पाए की वो कब और कहा से प्रगट हुए है। श्री ब्रह्म देव कमल पर विराजमान सृष्टी रचयता देव है। श्री ब्रह्मदेव के तीन मुख है सप्तऋषि, इन्द्रदेव, श्रीविश्वकर्माजी, देवर्षीनारद आदी श्री ब्रह्मदेव के मानस पुत्र है। श्री ब्रह्मदेव असुरो को प्रसन्न हो वरदान देते है बाद वो वरदान पाए असुर स्वर्ग पर आक्रमण कर स्वर्गाधिपती इन्द्रदेव को पराजय दे स्वर्ग पर आधिपत्य जमा देते है। श्री ब्रह्मदेव ने अपनी पुत्री श्री सरस्वती देवी से विवाह कर उनको अपना पत्नी बनाया है। समग्र सृष्टि के रचयता श्री ज्ञानदाता ब्रह्मदेव है। ब्रह्म का अर्थ ज्ञान समज विवेकबुद्धि श्री ब्रह्मदेव ही ज्ञान समज और बुद्धि के देवता है। श्री ब्रह्मदेव श्रीहरी विष्णुनारायण की नाभी कमल से प्रगट हुए एवं कमल पर विराजमान देव है। अर्थात जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है वो नर नहीं किंतु श्रीहरी विष्णुनारायण का ही स्वरूप है। ऐसे मनुष्य मे सद्बुद्धि और ज्ञान का प्रगट्य हुआ होता है। श्री ब्रह्मदेव जो बुद्धि एवं ज्ञान के देवता है वो श्रीहरी विष्णुनारायण की नाभि में से प्रगट हुए देवता कहलाते है। दांडी कमल यानी मनुष्य की करोड़रज्जू और उसके ऊपर मस्तिक है वो कमल का प्रतिक है। मस्तिक मे विराजमान बुद्धि ज्ञान जो कहो वही श्री ब्रह्मदेव है। इसलीये ही श्री ब्रह्मदेव को श्रीहरी विष्णुनारायण की नाभी से प्रगट हुए कमल पर विराजमान देव कहा गया है। श्री ब्रह्मदेव प्रगट होने के बाद ये जान नहीं पाए की वो कहासे और कब प्रगट हुए है। अर्थात कीसी भी मनुष्य मे समज बुद्धि या ज्ञान कब प्रगट हो इस का कोई निच्चीत समय नहीं होता है। सोचे जन्म के बाद बालक से बड़े हुए मनुष्य में समज, बुद्धि एवं ज्ञान कब प्रगट हुआ है क्या कभी कोइ जान पाएंगा? कभी नहीं इसी लीये कहा गया है की श्री ब्रह्मदेव प्रगट होने के बाद कभी ये नही जान पाए के वह कहा से और कब प्रगट हुए है। श्री ब्रह्मदेव तीन मुख वाले देव है इस का अर्थ यह है की ज्ञान हमेशा तीन आयामी होता है। मनुष्य मे ज्ञान विवेक समज भूतकाल, वर्तमानकाल और भविश्यकाल पर आधारित होते है। अर्थात भूतकाल की धटना याद कर सभी मनुष्य उसमे से कुछ बोधपाठ ले वह ज्ञान है वर्तमान में सभी मनुष्य जो सदकर्म करता है वो भी ज्ञान द्वारा ही संभव है सभी मनुष्य जो भविष्य में करने वाले कर्म की योजना बनते है वह भी ज्ञान द्वारा ही संभव है। इस लीये ज्ञान के देवता श्री ब्रह्मदेव तीन मुख वाले देव कहा गया है।

 

    समस्त सृष्टि के रचनाकार या रचयता श्री ब्रह्मदेव है। मनुष्य जो चारो ओर देख रहा है जो विविध शोध शंशोधन, मकाने, मार्ग, हवाई-जहाजे, गाड़िया, मोबाइल, कम्पूटर, उपग्रह जीतना भी सोचे कम है। खेती, कारखाने, उत्पादन जितना भी है जो सुख सुविधा है सब मनुष्य ने ज्ञान से ही आविश्कार कीया हुआ है। जो मनुष्य मे ज्ञान या बुध्धि का अभाव होता तो? आज दूसरी प्रजाति के जीवो की तरह मनुष्य भी प्राथमिक रीत से प्रकृतीक कुदरती जीवन जीता आदीम मानव ही होता। सभी मनुष्य के सामाजीक मानवीय सबंध माता-पिता, बहन, भाई, भाभी, मासा, मासी, दोस्त, दुसमन, राजा, मंत्री, उद्योगपति, नोकर आदी सभी सामाजीक सबंध कीस के प्रभाव से है? ज्ञान या बुद्धि अर्थात श्री ब्रह्मदेव के कारण ही है। सभी मनुष्य को जो सुख सुवीधा है उसकी रचना विविध शोध-शंशोधन, मानवीय सबंधे सब कुछ ज्ञान बुद्धि से ही संभव बना है। इस लीये ही सृष्टी के रचयिता श्री ब्रह्मदेव है और श्री ब्रह्मदेव ने ही सृष्टि की रचना की है। श्रीब्रह्मदेव का इस स्रष्टि को ओर भी ज्यादा सुंदर सुधड सुख सुवीधा युक्त करने का कार्य आज भी निरंतर चलायमान ही है।

 

सप्तऋषि, इन्द्रदेव, देवर्षीनारद, श्री वाश्वकर्माजी श्री ब्रह्मदेव के संतान है। श्री ब्रह्मदेव असुरो को वरदान देते है असुर स्वर्गाधिपती इन्द्रदेव को परास्त करके स्वर्ग पर आधिपत्य जमा स्वर्ग को नर्क बना देते है।

 

   इसका अर्थ यह है की सप्तऋषि आज की परिभाषा में विविध शोध-शंशोधन करते वैज्ञानीक है जो ज्ञान के कारण ही है। यदी ज्ञान ही न होता तो वैज्ञानीक कहा से? इसलीये विविध शोध-शंशोधन कर जन कल्याण जन सुखकारी बढ़ाने वाले वैज्ञानीक सप्तऋषि को ज्ञान यानी श्री ब्रह्मदेव के पुत्र कहा गया है। जो वैज्ञानीक ज्ञान आधारित शोध-शंशोधन कर आनेवाली पेढ़ी को सुख सुविधा प्रदान करते है वह ज्ञान श्री ब्रह्मदेव के पुत्र ही कहलाते है

 

    1आयुर्वेद चिकीत्सा, 2 युध्ध शस्त्र विद्या, 3 यन्त्र विज्ञानं वास्तु, 4 गणित अर्थशास्त्र, 5 खगोलशास्त्र, 6 राजनीती न्यायशास्त्र, 7 मनोविज्ञान तर्क धर्मशास्त्र 

 

    इन सात विषय पर शोधसंशोधन से ही सप्तऋषि ओ को ज्ञान श्री ब्रह्मदेव के पुत्र कहा गया हे।

 

    प्राचीन भारत के ऋषिमुनि ओ ने सभी मनुष्य में बुद्धि ज्ञान से उत्पन्न विचार सोच को ही “देवर्षीनारद” कहा है। विचार प्रगट कहा से होते है? मस्तिक में बिराजमान बुद्धि या ज्ञान से अर्थात श्री ब्रह्मदेव से इस लीये विचार के प्रतिक श्री “देवर्षीनारद” को श्री ब्रह्मदेव के पुत्र कहा गया है। कहते है की देवर्षी नारद कभी भी कही भी विचरण करते है। कही भी कीसी के बीच लडाइ झगडा या मनमुटाव करा सकते है। देवर्षीनारद जटील से जटील समस्या का समाधान भी कर सकते है। अर्थात “देवर्षीनारद” यानी मनुष्यों के मस्तिक से उदभव विचार कही भी परिभ्रमण कर शकते है। एक पल में विचार द्वारा मनुष्य समग्र पृथ्वी पर चन्द्र पर या कही भी परीभरमण कर सकता है। एक पल यहाँ तो दूजे पल में कही भी विचार के घोड़े दोड शकते है विचार ने से ही मनुष्य कीसी से ध्रुणा, शत्रुता करता है या प्रेम मित्रता करता है। सोच विचार द्वारा ही लडाइ झगड़े या सुलह शांति होते है यह कार्य देवर्षीनारद करते है। सोच विचार ने समज ने से ही हर जटील से जटील समस्या का समाधान हो सकता है इस लीये देवर्षी नारद को सर्व समस्या का समाधान करने वाले भी कहा गया है। देवर्षीनारद नारायण नारायण मंत्र का जाप करते है अर्थात मनुष्य का अपना विचार कीस के साथ वार्तालाप करेगा? कीसे बुलाएगा? जीस के विचार हो उस मनुष्य को ही अर्थात सभी मनुष्य का विचार दुसरे नर- मनुष्य से तो वार्तालाप करने वाला नहीं है। और एक मनुष्य के विचार दूसरा कोई मनुष्य कभी जान भी नहीं शकता है इस लीये मनुष्य के विचार जो स्वयं मनुष्य के साथ वार्तालाप कर ता है। इस लीये विचार-देवर्षीनारद सद्कर्म धर्मकार्य करन से नारायण स्वरुप बने स्वयं को ही पुकारेगे और नारायण नारायण मंत्र का जाप ही करते है।

 

  इन्द्रदेव को श्री ब्रह्मदेव के पुत्र कहा है इन्द्रदेव मनुष्य के “मन” का प्रतिनीधीत्व करते है। इन्द्रदेव का शस्त्र वज्र ही मनुष्य का मनोबल आत्मबल है कहा जाता है मन चंचल है और इन्द्रदेव का आचरण भी चंचल है। कीसी भी मनुष्य के मन का उद्गम कहा है? मस्तिक, बुद्धि, ज्ञान जो मनुष्य मे बुद्धि या ज्ञान ही न हो तो “मन” का अस्तित्व कहा से होता ? जीस मे बुध्धि नही ज्ञान नही वो कीसी भी प्राणी मे मन का अस्तीत्व नही होता है। मन बुध्धि ज्ञान से उद्रभव होने से मन रुपी इन्द्रदेव ज्ञान अर्थात श्री ब्रह्मदेव के संतान है। सभी मनुष्य का मन स्थिर होगा तो सद्गुण रूपी देवता ओ के सहयोग से एवं प्रकृति के तत्व रूपी देव वरुण, अग्नि, वायु, जल, एवं प्राक्रुतीक तत्वो का उपयोग कर मनुष्य स्वर्ग जैसा सुख प्राप्त करता है। प्रकृति के सहयोग एवं अपने ज्ञान बुध्धि से अच्छे जीवन कर्म कर मनुष्य अपने जीवन को स्वर्ग जैसा बना सकता है। स्वर्ग जैसे जिवन का राजा मनुष्य का अपना मन ही होता है।

 

     दुर्गुण के जैसे असुर श्री ब्रह्मदेव अर्थात ज्ञान या बुद्धि से तर्क लगा कर मन रुपी इन्द्रदेव पर आक्रमण करते है। मन अपने मनोबल द्वारा उस दुर्गुण रुपी असुर राक्षस का प्रतिकार करता है। कभी मन का पराजय संभव हो सकता है अर्थात इन्द्रदेव का पराजय और स्वर्ग का नर्क मे रुपांतर हो जाता है।

 

द्रष्टांत –  मनुष्य अपनी बुद्धि से मनोबल से सद्गुणों से अच्छे कर्म करके स्वर्ग जैसा सुख प्राप्त करता है। किंतु जीवन मे दुर्गुण जैसा की,, कोई नशे की लत हो या शंकाशिल स्वभाव हो यह सभी दुर्गुण अपने सही होने का तर्क तो बुध्धि से ज्ञान से ही सिध्ध करेगा। अर्थात यह दुर्गुण रुपी असुर राक्षस श्री ब्रह्मदेव के ही आशीर्वाद ले “मन” को पराजीत कर देते है। मनुष्य का मनोबल टूट जाता है और स्वर्ग पर असुर रूपी दुर्गुण का आधिपत्य स्थापीत हो जाता है। जीस मनुष्य का “मन” स्थिर होगा, मनोबल या आत्मबल मजबूत होगा वह अपनी धारणा के अनुसार ही कर्म करता है। सद्गुणों से अपना ऊँचा जीवन ध्येय रखकर ज्ञान और बुद्धि से महेनत संधर्ष कर स्वर्ग जैसा सुख प्राप्त करता है। किंतु जीस मनुष्य का मन चंचल होगा मनोबल मजबूत नहीं होगा अपने जीवन का कोइ ऊँचा जीवनध्येय नहीं होगा सद्गुण नहीं होंगे जीवन में सभी प्रकार के असुर रुपी दुर्गुण होगे तो उस मनुष्य को स्वर्ग जैसा सुख कहा से मील सकता है?

 

    श्री ब्रह्मदेव अपनी पुत्री श्री सरस्वती देवी के साथ रमण कर उनको अपनी पत्नी बनाया अर्थात श्री सरस्वती देवी जो मनुष्य की सद्वाणी है जो ज्ञान द्वारा मुख से उत्पन्न होती है। इस लीये ज्ञान द्वारा प्रगट हुई सदवाणी को ज्ञान की पुत्री श्री सरस्वती कहा गया है। श्री ब्रह्मदेव की पुत्री श्री सरस्वती देवी है यह सत्य कथन है। ज्ञानी मनुष्य अपनी वाणी द्वारा ही दुसरे मनुष्यो को ज्ञान की बात समजाता है वाणी द्वारा अपने ज्ञान की रजुआत करता है ज्ञान कीतना भी उच्च हो सदवाणी के बीना कुछ कामका नहीं है। ज्ञानी मनुष्य अपनी सदवाणी के साथ ही रमण करेगा अर्थात ज्ञान रुपी श्री ब्रह्मदेव सदवाणी-श्री सरस्वती देवी के साथ ही रमण करेंगे इस लीये श्री सरस्वती देवी को श्री ब्रह्मदेव की पत्नी कहा गया है। श्री सरस्वतीदेवी अर्थात सदवाणी द्वारा हम दुसरे मनुष्य को समजा सकते है विध्या-ज्ञान दे सकते है श्री सरस्वती देवी से ही ज्ञान विध्या का प्रचार प्रसार होता है। संगीत भी वाणी से उत्पन्न होता है इस लीये श्री सरस्वती देवी को विणा वादीनी कहा गया है। अनुशाशन भी विध्या ज्ञान से सम्भव है इस लीये श्री सरस्वतीदेवी को ज्ञान, विध्या, संगीत, कला, अनुशाशन, प्रेम की देवी कहा गया है।

 

 

 

३. श्री सदाशिव शंकर। 

     दोनों नेत्र बंद कर ध्यान में लीन श्री सदाशिव शंकर तीसरा नेत्र खोल अनिष्ट असुरो को जलाकर भस्म करते है। श्री सदाशिव को स्मशान में रहने वाले देव कहा जाता है जो भूतनाथ है। गले में सर्प रखते है सर पर चन्द्र बिराजमान है। श्री गंगामैया श्री सदाशिव शंकर की जटा से निरंतर बहती है जो सर्व मनुष्यो के पाप धोते है। श्री सदाशिव शंकर के दो पत्नी है प्रथम पत्नी श्री सतीदेवी और दूसरी पत्नी शक्ति श्री पार्वतीदेवी है। श्री सतीदेवी का प्रजापती दक्ष के यग्न कुंड में बलिदान होते ही श्री सदाशिव त्रांडव करते है। श्री सदाशिव क्रोध मे अपनी शिखा से भैरव विरभद्र उत्पन्न कर प्रजापती दक्ष एवं यग्न का नाष करते है। श्री सदाशिव के दुसरे पत्नी शक्ति श्री पार्वती देवी को दो पुत्र है। बड़े श्री कार्तिकेय जो मोर पर सवार है छोटे श्रीगणेश जो हाथी के मस्तक वाले है। श्रीगणेश का वाहन मुषक है श्रीगणेश के दो पत्नी रिद्धि सिद्धि है। श्री सदाशिव शंकर के प्रतिक समान शिवलींग है जीस पर अभिषेक कर शिवलींग की पूजा अर्चना होती है। शिवलींग के समुख श्री देवी मा की मूर्ती स्थापीत है एवं शिवलींग के आगे कछुए और नंदी की प्रतिमा स्थापीत है।श्री सदाशिव और शक्ति श्री पार्वतीदेवी अनिष्ठकारी असुरो का संहार कर इन्द्रदेव एवं दुसरे देवता ओ का रक्षण करते है।

 

       दो नेत्र बंद कर ध्यान लगा अपने अंतर मे एकात्म हो ज्ञान रुपी तीसरा नेत्र खोलना वह श्री सदाशिव शंकर का तीसरे नेत्र का प्रतिक है। जब कोई भी मनुष्य चारो ओर के संकटो से घिर जाता है तब वो शांत चित से बैठ कर दोनों नेत्र बंद कर अपने अंतर मे एकात्म हो ध्यान धरे तो अंतर का ज्ञान रूपी तीसरा नेत्र खुलता है। जीस ज्ञान से सर्व अनिष्ट रूपी संकटो से उगर ने का मार्ग मील जाता है इस लीये कहा गया है श्री सदाशिव शंकर के तीसरे नेत्र से कोई भी अनिष्ट या संकट रूपी असुर बच नहीं सकता वो जल के भस्म हो जाता है। ध्यान लगा अपने अंतर मे एकात्म हुए मनुष्य ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना से जुड जाता है। ॐ महाचेतना से जुडा मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया से ध्यान समाधी समय मुक्त होता है इस लीये ध्यानस्थ श्री सदाशिव शंकर ने “काम” पर विजय प्राप्त की है ऐसा कहा जाता है।



       मनुष्य ध्यान लगा अपने अंतर मे लीन हो अपने आपको जान लेता है। अपने गुण दोष देखता है ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में एकात्म होता है। ध्यान लगाने से मनुष्य का मन हमेशा शांत एवं उसकी प्रकृति शीतल होती है इस लीये शीतलता एवं मन के प्रतिक समान चन्द्र श्री सदाशिव शंकर के मस्तक पर बिराजमान है। ध्यान द्वारा जो ज्ञान रूपी तीसरा नेत्र खुलता है उस से मनुष्य शांत और ज्ञानी बनता है एवं उस ज्ञान रूपी तीसरे नेत्र से सभी असुर रूपी दुर्गुण जल कर भस्म हो जाते है। तर्करूपी श्री ब्रह्मदेव के आशीर्वाद से मनुष्य दुर्गुण में फसता है मन रूपी इन्द्रदेव की पराजय होती है और मनुष्य का स्वर्ग जैसा सुख नर्क की यातना में बदल जाता है। किंतु यदी वह मनुष्य ध्यान लगा अपने अंतर मे एकात्म हो अपने भितर के गुणदोष जानकर ज्ञान रुपी तीसरा नेत्र खोले तो सभी दुर्गुण जल कर भस्म हो जाते है। इस लीये इन्द्र देव को पराजीत करने वाले दुर्गुण रूपी असुर का संहार श्री सदाशिव शंकर या शक्ति श्री पार्वती देवी करते है।

 

       ध्यान द्वारा मीला ज्ञान उच्च कोटि का होता है एवं वह ज्ञान मस्तिक में होता है इस लीये ध्यान समाधी से उत्पन्न ज्ञान को ही ऋषिमुनी ओ ने श्री गंगामैया की उपमा दी है जो निरंतर श्री सदाशिव शंकर के मस्तिक से अविरत बहती रहती है। कहने का अर्थ यह है की जो ज्ञान रूपी श्री गंगा ध्यानस्थ श्री सदाशिव शंकर रूपी मनुष्य में से अवतरित होती है वह दीव्यज्ञान सर्व मनुष्य को जीवन उपयोगी होता है। दुर्गुण रुपी पापकर्म मे फसे सर्व मनुष्य का उध्धार ज्ञानरुपी श्री गंगा से ही हो सकता है। अर्थात यह ध्यानस्थ श्री सदाशिव पर अवतरीत हुए ज्ञान रुपी श्री गंगा में डुबकी लगाने वाले मनुष्य का जीवन उद्धार हो जाता है। मनुष्य दुर्गुण मुक्त पाप मुक्त हो जाता है इस लीये श्री गंगा को श्री सदाशिव शंकर के मस्तिक से अविरत बहती एवं सभी मनुष्य को पाप मुक्त करते दर्शाया गया है।

 

       जो मनुष्य ध्यान मे लीन हो अपने अंदर रही आत्मा (चेतना) को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में एकाकार लीन करता है उस मनुष्य में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना रूपी ब्रह्माण्ड उर्जा का वास होता है। ध्यानस्थ मनुष्य में बहोत ही जीवन उर्जा का संचय होता है। धयान द्वारा जो ज्ञान मीलता है वह ज्ञान से मनुष्य निडर होता है जो कीतनी ही वीपरीत परीस्थीती के बिच सत्य का उपासक बन शांत सा बना रहेता है। वह सदाशिव के गले में सर्प हे फिर भी श्री सदाशिव शांत है उसका प्रतिक है। ध्यान में रहने वाला समाधिस्थ मनुष्य में त्रिकाल ज्ञान जागृत होता है जो भुत, भविष्य, वर्तमान पर आधारित होता है। जो सदासिव के त्रिशूल का प्रतिक है। त्रिशूल नव सर्जन एवं संहारकता का प्रतिक है जीस मनुष्य को त्रिकाल ज्ञान हो वह नवसर्जन और विनाष करने को समर्थ होता है। डमरू ब्रमांड के ॐ कार के नाद का प्रतिक है जो ध्यान समाधी में लीन है वह निरंतर ब्रमांड उर्जा के नाद में निजानंद मे डूबा हुवा होता है।

 

       ध्यानस्थ मनुष्य सत्य का उपासक होता है एवं अखंड ब्रह्मांड उर्जा शक्ति का उसमे वास होता है इस लीये श्री सदाशिव शंकर को सत्य रूपी श्री सतीदेवी और जीवन शक्ति रूपी श्री पार्वतीदेवी दो पत्नी है। इस प्रकृति के अखंड अगोचर रुप को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा कहा है जो ॐ महाचेतना है। यह ॐ महाचेतना में मनुष्य की चेतना एकाकार लीन करना ही ध्यान क्रिया है। शिवलींग में लिंग है वह मनुष्य की आत्मा (चेतना) का प्रतिक है एवं निचे गोल थाल है जीसका मुख उत्तर की ओर खुला है वह माता ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना का प्रतिक है जो पुर्ण शिवलींग है। शिवलींग में लींग जो सभी मनुष्य की चेतना एवं निचे आधार है वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना द्वारा मीली अपार जीवन उर्जा शक्ति का प्रतिक है। दोनों प्रतिक आपस मे मीलकर पूर्ण शिवलींग बनता है जीसकी सनातन धर्म में पूजा प्राथना की जाती है।

 

       शिवलींग के आगे नंदी एवं कछुए की प्रतिमा होती है नंदी हमेशा ध्यान में बैठा हो अपने अंतर मे एकाकार हुआ प्रतित होता है। नंदी हमेशा बैठा हो तब नेत्र बंद कर एक योगी की तरह समाधी मे लीन ध्यानस्थ प्रतीत होता है। इसलीये नंदि ध्यानस्थ श्री सदाशिव शंकर का वाहन भी है एवं बैठा हुआ ध्यानस्थ नंदी शिवलींग आगे स्थान प्राप्त करता है। ध्यानस्थ मनुष्य प्रकृति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना मे एकाकर होने से पांचो दिव्यइन्द्रिय काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया से विमुक्त होता है। इस लीये पांचो दिव्यइन्द्रीय के प्रतिक चार पैर और सर कवच में संकोचता कछुआ शिवलींग के आगे स्थान प्राप्त करता है।

 

       पानी जीवन उर्जा का प्रतिक है एवं शिवलींग भी मनुष्य की चेतना और ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की महाचेतना के मीलन की अखंड ब्रह्मांड उर्जा का प्रतिक है। इस लीये शिवलींग हमेशा निरंतर बहते पानी के स्त्रोत के पास ही स्थापीत कीया जाता है। पृथ्वी की चुम्बकीय उर्जा उत्तर से दक्षिण वहन करती है अखंड उर्जा का खजाना सूर्य पूर्व से पच्चिम गती करता है। इस लीये सनातन धर्म मान्यता मे उत्तर एवं पूर्व दिशा को पवित्र माना जाता है। शिवलींग पर उत्तर से आती पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति केन्द्रित होती है इस लीये शिवलींग के मुख को उत्तर की ओर रखा जाता है। शिवलींग पर तांबे के पात्र से जल अभिषेक करने से शिवलींग मे केन्द्रित अखंड ब्रह्मांड उर्जा जो ॐ महाचेतना की उर्जा है वह अभिषेक करने वाले मनुष्य मे प्रविष्ट हो शुभ फल प्रदान करती है।

 

       शिवलींग को दिप धुप करने से “अग्नि” आधार “पृथ्वी” ऊपर “आकाश” चारो ओर मुक्त बहता “वायु” और मनुष्य द्वारा अभिषेक होते “जल” के स्पर्श से शिवलींग में अपार उर्जा का उदभव होता है। जो मनुष्य शिवलींग की यह पंचमहाभूत अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु, जल के साथ संकल्प पूजा करता है वह संकल्प अवश्य परीपुर्ण होते है। प्राचीन काल में सात प्रकार के संकल्प पूर्ति हेतु शिवलींग की स्थापना की जाती थी।

   १ सत्रु एवं युध्ध विजय के लीये। — २ मनोयातना मुक्ति एवं शारीरिक पीड़ा निवारण के लीये। — ३ दरिद्रता निवारण एवं धनधन्य के लीये। — ४ विद्या ज्ञान अर्जित के लीये। —  ५ ग्रहपीड़ा निवारण के लीये। — ६ तंत्रमंत्र की अगोचर शक्ति पाने के लीये एवं अगोचर शक्तिओ से मुक्ति पाने। — ७ आध्याम मार्ग में मोक्ष पाने के लीये।

 

  शिवलींग पर धतुरा, बिली, दूध, राख, चन्दन, गुड, कमल चढ़ाया जाता है।

 

धतुरा  धतुरा विष का प्रतिक है मनुष्य के भीतर रही सभी विष सामान विषय वासना को शिव को अर्पण कीया जाता है।

बिली बिली मन चित्त अहकार का प्रतिक है मनुष्य शिव को बिली चढ़ा अपने सभी मन चित अह के विकारो से मुक्त होता है।

दूध  दूध शीतलता एवं पवित्रता का प्रतिक है मनुष्य शिव को धुध चढ़ा आपने अंतर से शीतल एवं पवित्र होता है।

राख राख वैराग्य एवं मोक्ष का प्रतिक है मनुष्य शिव को राख चढ़ा अपने में वैराग्य भाव जागृत कर मोक्ष की कामना करता है।

चन्दन चन्दन सुगंध सुवास फैला पवित्रता फ़ैलाने का प्रतिक है मनुष्य शिव को चन्दन चढ़ा अपने अंतर से मलिन संकल्प मिटा चन्दन की तरह सुधंडित पवित्र संकल्प का वाहक बनता है।

गूड गुड मिठाश एवं परस्पर बंधुता का प्रतिक है मनुष्य शिव पर गुड चढ़ा अपने में मिठास जागृत कर पर्सपर बंधुत्व के भाव को ज्बधता है।

कमल कमल पवित्रता एवं बुद्धि का प्रतिक है शिव पर मनुष्य कमल चढ़ा आपनी बुद्धि शिव को समर्पित कर पूर्ण समर्पण से पवित्रता का संकल्प लेता है।

 

      ध्यान में लीन मनुष्य अपने अंतर मे एवं “प्रकृति” ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना मे एकात्म होता है शिवलींग उसका प्रतिक है। शिवलींग मे ब्रह्मांड उर्जा का वास होता है प्रकृति जो समस्त ब्रह्माण्ड में आदीअनादी है ॐ स्वरूप है इस लीये शिवलींग के आगे प्रकृति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा मा अंबा की मूर्ती  स्थापीत की जाती है।

 

       प्रकृति के मुख्य पांच तत्व है पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, वायु ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से अखंड ब्रह्मांड उर्जा एवं पृथ्वी की शक्ति पाने को शिवलींग की पूजा का महत्व है। पौराणिक समय से धोर संकट से उगरने शिवलींग स्थापीत करके पूजा करने का महत्व है। शिवलींग पर अखंड ब्रह्माण्ड की उर्जा का वास होता है एवं ब्रह्माण्ड उर्जा कोई भी विकार बिना की शुद्ध उर्जा होती है इसी लीये निर्मलता का प्रतिक स्वेत सफेद रंग के पत्थर से शिवलींग बनाया जाता है। सफ़ेद शिवलींग पर ही जयादा से ज्यादा ब्रह्माण्ड उर्जा का वास होता है। “ॐ नम: शिवाय” मंत्र का अर्थ ॐ यानी समस्त सृष्टि के नर और मादा को उनकी आत्मा द्वारा सर्वस्व अर्पण करने वाले ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा आप के द्वारा जो हमारा शिव यानी कल्याण होता है उसे हम नमन करते है।

 

       ध्यान मे लीन हो समाधी लगाने से प्रकृति स्वरूप ॐ महाचेतना में मन एकात्म होने से मनुष्य का मन एवं चेतना (आत्मा) निर्मल बनता है। मन चेतना पर कीसी भी प्रकार की अनिष्ट या दुस्कर्मो की दुष्ट असर नहीं रहती मान अपमान जैसा भी कुछ नहीं रहता है। इसीलीये श्री सदाशिव शंकर को विषैले सर्परूपी अनिष्ट गले में होने के बावजूद उनको कोई हानी नहीं पहुचाते है। ध्यानी एवं योगी मनुष्य मे अपार ज्ञान होता है जो हमेशा धर्म के कल्याण की इच्छा करता है। धर्मरक्षा को सर्वजन कल्याण को दुःख यातना भी सहन कर लेते है इस लिऐ धर्मरक्षा एवं सर्वजन के कल्याण के लीये ज़हर पिने वाले नीलकंठ भी श्री सदाशिव शंकर ही कहलाये है।

 

       ध्यानमें बैठ कर “प्रकृति” शक्ति ॐ महाचेतना से एकात्म हो ध्यानस्थ मनुष्य इस सृष्टि के सभी गोचर अगोचर जीवो से पर होता है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की उस पर सदा कृपा होती है ध्यानस्थ अवस्था में जीव सभी मनोभावो से ऊपर सुन्य होता है। इस सृष्टि के सभी चेतन जीव सब “प्रकृति” ॐ महाचेतना शक्ति के आधीन है। ध्यानस्थ तो स्यंम ॐ महाचेतना मे एकात्म होता है इस लीये इस सृष्टि के सभी चेतन जीव ध्यानस्थ मनुष्य को आधीन होते है। इसीलीये श्री सदाशिव शंकर को सभी जीव के ऊपर और आत्मा का वास हो ऐसे स्मशान में रहने वाले देव कहा गया है क्यु की ध्यानस्थ व्यक्ति में वैराग्य जागृत होता है और स्मशान वैराग्य की निशानी है।

 

       सभी जीव, देव देवी गोचर अगोचर, जीवित या मृत आत्मा स्वरूप कोई भी हो वो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना के आधीन होते है। ॐ महाचेतना मे एकात्म होने से सभी देवदेवी, गोचरअगोचर, जीवीत या मृत आत्मा इत्यादि भी ध्यानस्थ मनुष्य के आधीन होते है। इसी लीये श्री सदाशिव शंकर को सभी गोचरअगोचर शक्तिओ के स्वामी एवं देवो के देव महादेव कहा गया है। सभी जीव देव देवी ध्यानस्थ, गोचर अगोचर, सब श्री सदाशिव शंकर के आधीन होते है।

 

       ध्यान में लीन “प्रकृति” ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबाकी ॐ महाचेतना में एकात्म हो के ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य हमेशा सत्य के उपासक होते है। श्री सतीदेवी श्री सदाशिव शंकर की प्रथम पत्नी है किंतु कही भी सत्य का हनन होता है या असत्य का आचरण हो तो सत्य के उपासक ज्ञानी एवं ध्यानी मनुष्य वह असत्य सहन नहीं करते है। वो क्रोधित हो त्रिशूल ले सत्य का हनन करने वाले असत्य का अधर्म का आचरण करने वालो का सर्वनाश करते है। अर्थात त्रांडव करते है और असत्य के उपासक या असत्य का आचरण करने वाले सभी ध्यानी श्री सदाशिव शंकर का उग्र विनाषक स्वरुप सहन नहीं कर पाते है। क्रोधीत होने से श्री सदाशिव शंकर अपनी शिखा से क्रोधरूपी वीरभद्र भैरव उत्पन्न कर सर्व सत्य का हनन करने वले असत्य का आचरण करने वाले अधर्मी ओ को दंड देते है। भारतवर्ष मे श्री सदाशिव के ध्यान समाधी की शक्ति से स्थापीत श्रीशक्ति के एकावन शक्तिपीण्ड एवं श्री सदाशिव के क्रोध से उत्पन्न महारुद्रावतार वीरभद्र भैरव जो सभी श्रीशक्ति के एकावन शक्तिपीण्ड मे विभाजीत है। यह श्रीशक्ति के एकावन शक्तिपीण्ड सर्व मनुष्य के आस्था के केंद्र है। जो मनुष्य श्रीशक्ति के एकावन शक्तिपीण्ड की शरण मे हो उस मनुष्य का सर्व आसुरी शक्ति ओ से रक्षा होती है सत्य धर्म का सदा विजय होता है। 

 

       ध्यान से समाधी मे लीन मनुष्य “प्रकृति” ॐ महाचेतना स्वरुप हो निरंजन अधोर अवस्था को प्राप्त होता है। ध्यान द्वारा अधोर अवस्था मे ब्रह्मज्ञान से भुत भविश्य वर्तमान का त्रिकाल ज्ञान होता है। इसलीये श्री सदाशिव शंकर को निरंजन अधोरी कहा गया है एवं तिनो काल का प्रतिक त्रिशुल श्री सदिशिव का शस्त्र है।

 

       ध्यान द्वारा समाधी से ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में एकात्म हो जो अपार उर्जा शक्ति मीलती है वह श्री सदाशिव शंकर की दूसरी पत्नी श्री पार्वती देवी है। अखंड उर्जा के प्रतिक श्री पार्वती देवी को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का स्वरूप कहा गया है। समाधी से जो अखंड ब्रह्मांड उर्जा का अवतरण होता है उस से सर्व अनिष्ट आसुरी शक्ति नष्ट हो ब्रह्मांड की अखंड शुभ उर्जा का प्रभाव बडता है। इसलीये श्री शक्ति स्वरुपमा पार्वतीदेवी को अनिष्ट असुर संहारीणी मां दुर्गा अवतार एवं सबका कल्याण करने वाले मा अंबिका का अवतार कहा गया है। मा पार्वती ही नकरत्मक शक्ति महीसासुर का उसकी सेना समेत सर्वनाष करने वाले नवदुर्गा श्री महीसासुर मर्दिनी है। 

 

 

       ध्यान मे लीन हो दो नेत्र बंद कर ज्ञान रुपी तीसरा नेत्र खोल जो नया सोचते है जो नया शुभकार्य करते है वह इस अखंड ब्रह्मांड उर्जा शक्ति के आभारी है। ज्ञान आधारीत सोच समज कर जो नया शुभकार्य करते है वह शुभकार्य अर्थात श्रीगणेश है जो श्री शिव शक्ति के पुत्र कहलाते है। ध्यान द्वारा अर्जीत ब्रह्मांड उर्जा शक्ति द्वारा जीस शुभकार्य की सुरुआत होती है वही श्रीगणेश है। सोच समज कर शक्ति प्राप्त कर जीस शुभकार्य की सुरुआत करते है वह शुभकार्य शरुआत में मूषक जैसा छोटा होता है किंतु कार्य विस्तार होते वह शुभकार्य हाथी जैसा विशाल स्वरूप धारण करता है। श्रीगणेश को हाथी के प्रतीक और उनके वाहन को मूषक के प्रतिक द्वारा समजाया गया है।

     श्रीगणेश के चार हाथ है एक हाथ में अंकुश दुसरे हाथ में कमल तीसरे हाथ से आशिर्वाद चौथे हाथ मे लड्डू है। इसका अर्थ ऐसा होता है ॐ महाचेतना की उर्जाशक्ति अर्जित कर सोच समज कर आयोजन बध्ध शुरुआत कीया हुआ नया शुभकार्य एक अनुशासन द्वारा चलता है। जो शुभकार्य मे बहुत लोग शामील हो वहा अनुशाषन का प्रतिक अंकुश श्रीगणेश के हाथ मे है। यह शुभकार्य प्रामाणीकता एवं पवित्रता से विकसीत होता है प्रामाणीकता एवं प्रवित्रता के प्रतिक कमल श्रीगणेश के हाथ मे है। यह शुभकार्य मे सबको समान विकास एवं कार्य करने की तक मीलती है जो श्रीगणेश के आशिर्वाद देते हाथ प्रतिक है। यह शुभकार्य बहुत विकास प्राप्त कर के बहोत लोगो के लीये कल्याणकरी साबित होता है सर्व समाज के लीये कल्याणकरी होता है इसी लीये शुभ और कल्याण के प्रतिक या सुख समृद्धि के प्रतिक लड्डू श्रीगणेश के हाथ मे है। जीस शुभकार्य का चौमुखी विकास होता है वो महाकार्य बन खुब फलता फुलता है जो श्रीगणेश के बडे पेट का प्रतिक है। बहुत ही फैलता महाकार्य जो बहुत से लोगो को शुभफल दे वो शुभकार्य बहुत ही धन अर्जित करता है बहुत ही एैश्वर्म धन धान्य सुख संपदा मान सम्मान हासिल करता है वो श्रीगणेश की दोनों पत्नी श्रीरिद्धि और श्रीसिद्धि द्वारा बताया गया है इसी तरह सुभ एव लाभ भी श्रीगणेश के पुत्र कहे गए है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा प्राप्त कर सोच समज कर नव शक्ति अर्जित कर जो शुभकार्य की शरुआत करा जाता है वह शुभ कार्य अवस्य रिद्धि सिद्धि प्राप्त करता है। जो सुरुआत में मूषक जैसा छोटा और फल फूल विकास प्राप्त कर हाथी जैसा विराट रुप धारण करता है वो श्रीगणेश और उनकी पत्नीया रिद्धिसिद्धि द्वारा समजाया गया है।


       श्री सदाशिव शंकर के दुसरे पुत्र श्री क्रतिकेय जो मोर पर सवार हो समस्त विश्व में परिभ्रमण करते है। अर्थात जो मनुष्य ध्यान द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में एकात्म हो शुध्ध जीवन शक्ति प्राप्त कर धर्मकार्य मे अग्रेसर होता है। जीस से चारो ओर शिव हि शिव होता है अर्थात सर्व का कल्याण होता है उस शिव शुभत्व कल्याणक की कीर्ति विश्वमें चारो और फेलती है जो श्री सदाशिव शंकर के दुसरे पुत्र श्री कार्तिकेय द्वारा समजाया है। एक जगह जब इतना शुभ हो शिव हो उस की नामना श्रीकार्तिकेय रूपी कीर्ति मोर पर सवार हो समस्त विश्व में फेलती है। यानी कीर्ति रूपी श्रीकार्तिकेय मोर पर बिराजमान हो समस्त विश्व में परिभ्रमण करते है।