शिवत्व मोक्ष – ध्यान समाधी अघोरत्व

    ध्यान एवं योग आदी अनादी काल से श्री सदाशिव शंकर से जुड़ा सहज, गुढ एवं अनमोल ज्ञान है। यह गुढ अनमोल ज्ञान प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी जानते थे उन्हे आध्यात्म के सप्त सोपानो का ज्ञान था जो इस प्रकार हे।


धारा  – जन्म से जो पांच कर्मेद्रीय आँख, कान, नाक, जिव्हा, त्वचा से जो अनुभव एवं बाते ग्रहण करते है।

धारणा जैसी धारा होगी बस उसी प्रकार की धारणा बनती हे जो व्यक्तित्व निर्माण करती है।

कर्मयोग व्यक्ति का जो धारणा होगी उसी प्रकार का कर्मयोग बनेगा।

ध्यान व्यक्ति के धारा धारणा अनुरूप कर्मयोग होगा तब ही व्यक्ति का उस कर्म मे ध्यान लगेगा।

समाधी जो कर्मयोग में ध्यान लगेगा और समय संक्षिप्त हो चेतना विस्तृत होगी तब समाधी लगेगी।

अघोरात्व  पांचो प्रकार की समाधी सिध्धता के बाद मनुष्य अघोरात्व को प्राप्त करता है।

शिवत्व अघोरात्व की अवस्था में जो अघोरी मनुष्य मात्र की मर्यादा का उलंगन नहीं करता वह शिवत्व को प्राप्त होता है, शिवत्व ही मोक्ष है।


         मोक्ष मार्ग को ले जाने वाले आध्यात्म के सप्त सोपानो के इस अनमोल गुढ ज्ञान को ऋषिमुनी ओ ने श्री सदाशिव शंकर के रहस्य द्वारा आने वाली नइ पीढी के लीये सुरक्षित कीया था।


       श्री सदाशिव नटराजना है नटराजना जो नुत्य का एक भाग है सु-मधुर संगीत के ताल पर मग्न हो नुत्य करने से मनुष्य के शरीर में ब्रह्माण्ड उर्जा का संचय होता है एवं मन एकाग्र होता है। जब शरीर में उर्जा का संचय होता है तब नुत्य बंद कर उत्तर की ओर मुख कर पद्मासन में बैठ दोनों नेत्र बंद कर के दोनों हाथ की हथेली ऊपर की ओर रख योगमुद्रा मे बैठ पांच से ज्यादा बार प्राणवायु से सम्पूर्ण फेफडे भर प्राणवायु बहार गमन करते हुए दिर्ध ॐ कार करने से शरीर में प्राण का संचार होता है शरीर प्रफुल्लीत होता है। शरीर के कोष मे प्राणवायु का बहाव बढने से शरीर के कोष दोषमुक्त बनते है। रक्त प्रवाह में ज्यादा प्राणवायु धुलने से मस्तिष्क के कोष नवपल्लीत होते है जीस से मस्तिष्क ज्यादा अच्छी प्रकार से कार्य करता है।


       योग मुद्रा मे उत्तर की ओर मुखकर बैठ पांच से ज्यादा बार दिर्ध ॐ कार कर दोनों नेत्र बंद कर जो सांस चल रही है ना ज्यादा ना कम जो सामान्य प्रकृतीक लय है उसी लय मे सांस अंदर और बहार करना है। सांस बहार निकाल ते समय केवल मन ही मन में राम शब्द का जाप करना है राम ही मनुष्य के अंदर की चेतना (आत्मा) का प्रतिक है। सनातन धर्म शास्त्रो मे मनुष्य के अंदर निवास करने वाली इस चेतना को राम कहा गया है। जब तक चले तब तक यह क्रिया मुक्त रीत से चलने देनी है। निरंतर सांस गमन समय मन ही मन मे राम शब्द का जाप करना है। कहा जाता है श्री सदाशिव शंकर “प्रकृति” ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना मे अपने अंतर चेतना (राम) को एकात्म कर ध्यान करते है। श्री सदाशिव ॐ महाचेतना एवं अंतर की चेतना प्रतिक राम का ध्यान धरते है। सांस ही वह माध्यम है जो शरीर एवं आत्मा को जोड़े रखता है जो सांस का लय ठीक न हो तो शरीर एवं आत्मा बैचेन हो जाते है, जब सांस लय में हो तब शरीर एवं आत्मा प्रफुल्लित होते है।


       मनुष्य को कोई भी परेशानी हो मन चिंतीत हो तब सांस का लय डगमगा जाता है। निंद्रा नहीं आती और मन बेचेन हो जाता है अंदरुनी चेतना (आत्मा) बैचेनी अनुभव करती है मनुष्य के मनोभाव मनुष्य पूरा शरीर अस्तित्व डगमगा जाता है। किंतु इस मनोस्थीती में भी जब निंद्रा आती है तब शरुआत जोको से होती है। एक निंद्रा का जोका दुसरा निंद्रा का जोका और निंद्राधिन किंतु मन पर जो मनोभाव सवार हो वह कीतनी ही गहरी निंद्रा के बाद भी नही बदलते है। इसलीये सुबह पुर्ण गहरी निंद्रा के बाद मनुष्य के मनोभाव मनोस्थीती बदलते नही और सब से पहले प्रथम जो ज्यादा दु:खदाइ मनोभाव हो वोही मन आत्मा में असर करते है। जैसे की कोई भी चिंता हो वह चिंता सुबह उठते ही सबसे ज्यादा मन को परेशान करती है। कुछ अच्छा नहीं लगता मन आत्मा बेचेंन हो जाता है।


       किंतु ध्यान क्रिया निंद्रा से एक अलग ही अनुभूति है। ध्यानस्थ अवस्था में प्रकृतीक लय मे जो सांस चल रही है यह सांस के साथ राम शब्द का मनोजाप करते करते मन विचार सोच मे गुम हो जाता है। स्वभाविक है सभी ध्यानी मनुष्य के साथ ऐसा होता है। अचानक विचार तंद्रा से बहार निकल सांस के साथ राम शब्द का मनोजाप शुरू होता है। ऐसा बारबार होता है और एक क्षण एसा आता है जब विचार भी नहीं निंद्रा भी नहीं और राम शब्द का मनोजाप भी नहीं सारा अस्तित्व ही सुन्य है इस सुन्य अवस्था को ही समाधी कहते है। ना कोइ मनोभाव है ना कोइ मानशिक स्तर बस उस क्षण मनुष्य की चेतना ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की महाचेतना के साथ एकात्म होती है। सारे मनोभाव सारी धारा धारणाए अपने आप सुन्य मे विलय होने लगती है। सब कुछ छुट सा जाता है किंतु यह दिव्य अनुभव व्यक्ति-व्यक्ति, मनुष्य-मनुष्य अलग अलग होता है। बचपन से जो संस्कार मनोचित में प्रभावक होते है वह संस्कार के प्रभाव मे ध्यानस्थ समाधी में दिव्य अनुभव भी अलग-अलग होते है।


       ध्यान क्रिया वो नहीं जो एक बार एक दिन मे करने से अनुभव हो जाय नियमीत हर दिन निरंतर बारबार ध्यान क्रिया करने से समाधी लगने से दिव्य अनुभव होते है। प्रथम पडाव नटराजन यानी नुत्य है दुसरा पडाव पद्मासन में बैठ दो नेत्र बंद कर कम से कम पाच दीर्ध ॐकार का जाप है। तीसरा पडाव जो प्रकृतीक लय से सांस चलता है उस के साथ मनोमन राम शब्द का जाप है।  निरंतर जब तक बैठना अच्छा लगे तब तक यह बहुत ही सहज एवं सरल ध्यान क्रिया करना है।


       ध्यान से समाधी लगने से सारी धारा धारणाये सारे मनोभाव का क्षय होता है। अंदर की चेतना राम जो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा भगवती की ॐ महाचेतना मे एकात्म होने से ब्रह्मांड की महाउर्जा का समाधीस्थ मनुष्य में वास होता है। समाधी के बाद सब आहालादक औलोकीक लगता है बस जैसे सब ठहर जाता है शांत बैठने का मन होता है। अंदर से आनंद की लहरे उत्प्पन होती है। मनुष्य सारे दु:खद मनोभावो से अंतर से मुक्त होता है जो मनोभाव से निंद्रा के बाद मुक्त नहीं होते है। मनुष्य हर समय कीसी ना कीसी मनोभाव के बंधन मे बंधा हुआ होता है कीसी न कीसी धारा-धारणा का मनो शिकार होता है। किंतु समाधी में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में अंतर की चेतना (राम) एकात्म होने से सर्व मनोभाव सर्व धारा धारणा पिगलने लगती है। जो मनुष्य समाधी लीन होते है उन्हे बहुत ही अच्छे से जीवन की सब धटमाल समज में आने लगती है। जो ध्यान –समाधी के बाद अधोर की उच्च अवस्था प्राप्त करने का मार्ग है। ध्यान जो अंतर की चेतना (राम) को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में एकात्म लीन करने की क्रिया मात्र है। जो क्षण नहीं विचार- नहीं निंद्रा –नहीं राम शब्द का मनोजाप वह क्षण समाधी है। इस शुन्य क्षण को ही समाधी कहते है एवं श्री सदाशिव ध्यान लगा समाधी में लीन ही रहते है।


       निरंतर ध्यान क्रिया के अभ्यास से समाधी लगने लगती है किंतु समाधी अवस्था कभी भी याद नही रहती है। समाधी अवस्था में मनुष्य के मनोभाव, विचार, या धारा-धारणा कुछ होता ही नहीं सब कुछ शून्य होता है और शून्य अवस्था कभी भी याद नहीं रहती है। किंतु समाधी अवस्था में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐमहाचेतना ध्यानस्थ मनुष्य की चेतना (राम) के साथ एकात्म हो एक नाटकीय कार्य करती है जीस से समाधीस्थ मनुष्य अज्ञात ही रहता है। वो नाटकीय घटना होती है ॐ महाचेतना ध्यानस्थ मनुष्य के अंतर की चेतना को निर्मल शुध्ध बनाने का कार्य कराती है। मनुष्य के संस्कार ,स्वभाव, धारा-धारणाऐ सभी ॐ महाचेतना के प्रभाव मे परिशुध्ध होना शुरू होता है। और मनुष्य की चेतना भी ॐ महाचेतना जैसा शुध्ध निर्मल स्वरूप धारण करने लगती है। समाधीस्थ मनुष्य की चेतना के साथ मन एवं मनुष्य का संपुर्ण अस्तित्व निर्मल बनता है ऐसी निर्मल अवस्था को ही अघोर अवस्था कहते है। इसी लीये समाधी मे लीन श्री सदाशिव शंकर को निरंजन अघोरी कहा गया है।


       अघोर अवस्था में मनुष्य को कोई पसंद- नापसंद, इच्छा-आकांक्षा कोई  धारा-धारणा होते नही है। जीस प्रकार स्वंम “प्रकृति” ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना सबके साथ जुडी हुई है ॐ महाचेतना के नियम अनुसार सृष्टि की सर्व घटमाल का सर्जन होता रहता है। किंतु हरेक जीव मात्र के स्वतंत्र कर्म मे ॐ महाचेतना हस्तक्षेप नही करते सभी जीव अपनी इच्छानुसार कर्म करने को स्वतंत्र है। अघोर अवस्था में पहोंचे मनुष्य को सब शांत, सुंदर एवं अहलादक दिखता है सब स्पष्ट रुप से दिखइ देता है ना कोई धारा ना कोई धारणा है जो है उसका मात्र शाक्षी भाव से स्वीकार है। आनंद के महासागर मे निजानंद के गोते लगाने मे मस्त, नहीं कीसी से द्रेश नहीं कीसी मे आशक्ति जो है बस आनंद ही आनंद है। जहा नझर करो सब औलोकीक दिव्य ही नझर आता है समग्र अस्तित्व प्रेम से भर जाता है चेतना विसृत होने से समय संक्षीप्त होता है पर सुन्य भाव मे विचार भी सुन्य होते है। जहा है बस उसी मे लीन है वर्तमान मे जो धटमाल चल रही है उसी मे लीन है निजआनंद में निजानंद है।


       यह अधोर अवस्था ही शिवत्व का द्वार है। इसी लीये श्री सदाशिव के लीये कहा गया है की,,,

शिव ही सांसारीक है शिव ही वैरागी है।

शिव ही भोले है शिव ही ज्ञानी है।

शिव ही योगी है शिव ही भोगी है।

शिव ही शांत है शिव ही क्रोधित है।

शिव ही नटराजन है शिव ही अर्धनारेश्व है।

शिव ही सर्जनहार है शिव ही संहारक है।

शिव ही ध्यानी है शिव ही त्रांडव है।

शिव ही सत्य है शिव ही शक्ति है।

शिव ही अधोरी है शिव ही आनंद है।

शिव से ही भुत भविष्य और वर्तमान है।

शिव ही आत्मा से पर है जो भूतनाथ है।

      इतना सारा विरोधाभाषी व्यक्तित्व अपने मे समेटे पांचो दिव्य इन्द्रियों से मुक्त ध्यानस्थ समाधी में लीन निरंजन अधोरी श्री सदाशिव है। इस अवस्था को ही अघोर कहा गया है और इस अवस्था को प्राप्त मनुष्य अघोरी है। अधोर अवस्था को प्राप्त मनुष्य “प्रकृति” के अगोचर रहश्य आसानी से समज सकता है जीस से कइ गोचर अगोचर क्रियाए मात्र शाक्षी भाव मे आत्मसहज कर लेता है। जीस से कइ प्रकार के एसे कार्य जो अधोरी के लीये सहज हो वह दुसरे लोगो के लीये चमत्कार होते है। अधोर अवस्था में पहोचा हुआ मनुष्य कोई भी असंभव को संभव करने के लीये शक्तिमान है किंतु इतनी उच्च अवस्था में पहोचा हुआ मनुष्य कभी अपनी मर्यादा का उलंधन नहीं करेगा। अर्थात कीसी दुसरे लोगो का मनोचित अपने प्रति आकर्षीत हो ऐसा कार्य नहीं करेगा। अधोरी अपने आनंद के निजानंद में मस्त रहेगा किंतु कोई चमत्कार कभी भी नहीं करेगा क्योंकी अघोरी का लक्ष ‘शिवत्व’ को प्राप्त करना है। शिवत्व ही मोक्ष है जिसे प्राप्त करने को सभी आध्यात्मिक मनुष्य विविध पंथसंप्रदाय के विविध धारा-धारणा के भवर मे फस कर अज्ञान के अंधकार में डूब कर अघोरात्व को प्राप्त नहीं कर पाते है।


       अघोरी सृष्टि में घटती हर घटमाल का मात्र साक्षीभाव से स्वीकार कर उसका आनंद लेता है। अघोरी जीवन मे धटती हर धटमाल मे लिप्त होकर भी अलिप्त रहता है। अधोरी अपने निर्णय कोई भी गुण-दोष या धारा- धारणा से मुक्त रह करता है। यह ऐसी अवस्था है जीस मे अधोरी चारो ओर के मनुष्यो के मनोभाव स्पष्ट रुप से समजता है। अघोरी अपनी शांत चेतना में दुसरे मनुष्य के आसपास की विरुद्ध चेतना के सारे मनोभाव अनुभव करता है।


      मनुष्य की चेतना (आत्मा) जीस के पांच स्तर है जिसे आज का विज्ञान ओरा (उर्जा) कहता है। ध्यान से ओरा (उर्जा) विस्तृत बनता है जीस से मनुष्य के प्रभाव एवं एकाग्रता का उत्थान होता है। एकाग्रता के बडने से मनोभाव स्थीर हो समाधी लगती है जीस से चेतना विस्तृत हो समय संक्षीप्त होता है।


       जैसे एक बालक को खेलना पसंद है वह खेल में इतना लीन हो जाता है की वह खेलने का समय उस के लीये ध्यान समाधी ही है। और बालक की चेतना विस्तृत होती है एवं समय उस बालक ले लीये रुक सा जाता है संक्षिप्त होता है। जैसे कीसी मनुष्य को मनपसंद कार्य करने को मिले तब वो उस तल्लीन होता है वह भी एक प्रकार की ध्यान अवस्था समाधी ही है जीस मे भी चेतना विस्तृत और समय संक्षिप्त होता है।


समाधी अवस्था के मुख्य पांच प्रकार होता है।


नटराजन  सु मधुर संगीत पर नृत्य कर अनंत मे खो जाना समाधी है। सदशिव नटराजन है। 

अर्धनारेश्वर स्त्री पुरुष की एक दुसरे को समर्पीत प्रणय अवस्था समाधी है। सदाशिव अर्धनारेश्वर है। 

शिव अपने आश्रितों के लीये जीवन निर्वाह के कार्य करने मे तल्लीन होना एवं खेल खेल ने मे लीन होना समाधी है। सदाशिव अपने परीवार एवं शिवगण के साथ आनंद मे है।

त्रांडव  —  सत्य सनातन धर्म के लीये लडने वाले धर्म युध्ध मे लडते लडते झनुनात्म क होना समाधी है। सदशिव त्रिनेत्रधारी क्रोधाग्नि स्वरुप त्रांडव करते महाविनाशक महाकाल है। 

ॐकार  — अपने अंतर की चेतना (राम) को ॐ महाचेतना मे एकात्म लीन करना समाधी है। सदाशिव ध्यान समाधी मे लीन है। 


   यह पांचो प्रकार की समाधी अवस्था मे चेतना का विस्तार हो समय संक्षीप्त होता है एवं इन पांचो प्रकार की समाधी सिध्धता के बाद अघोरात्व प्राप्त होता है। 


       अघोरी अपने निजानंद में मस्त रहता है सत्य का परम उपासक होता है। किंतु सत्य का हनन असत्य का पालन कभी स्वीकार नहीं करेगा और सत्य के पुन: स्थापन के लीये अघोरी कुछ भी कर शकता है। अधोरी के लीये कुछ भी असंभव नहीं है वह अघोरी सत्य का पुन: स्थापन करके ही रहेगा उसे कोई रोक नहीं शकता है।


       अपना मन पसंद कार्य करने से मनुष्य की चेतना शरीर एवं ॐ महाचेतना एक लय में हो तब मनुष्य का मन प्रसन्न होता है। चेतना एवं मन एक होने से समाधी मे समय संक्षिप्त लगता है। यह सब मनुष्य के स्वभाव एवं संस्कार पर भी निर्भर करता है की मनुष्य का मनपसंद कार्य कोन सा है? मनुष्य के भितर जो मानशिक भाव की कमी हो वह मनोकमीया समाधी अवस्था मे ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना चेतना द्वारा ज्ञान का अवतरण हो कमीयो की पूर्ति होती है। समाधी अवस्था मे ॐ महाचेतना द्वारा जो ज्ञान मनुष्य को मीलता है वो ज्ञान मनुष्य के जीवन मे बहुत ही उपयोगी होता है।


       ध्यान समाधी के बाद मनुष्य की चेतना शांत होती है। उस अवस्था में मनुष्य कोई भी संकल्प लेता है तो वह संकल्प ॐ महाचेतना द्वारा पूर्ण करने का प्रयास होता है। इसलीये ध्यान समाधी द्वारा शांत हुए ध्यानयोगी केवल संकल्प द्वारा कठिन से कठिन कार्य सहजता पूर्वक पुर्ण करते है।


       ध्यान समाधी बाद ॐ महाचेतना की उर्जा मनुष्य में होती ही है वह अखंड उर्जा को ब्रह्माण्ड उर्जा कहते है। यह ब्रह्मांड उर्जा को अघोरी मात्र संकल्प द्वारा अपने शरीर से इस विश्व में कोई भी जगह प्रवाहित कर शकते है। जीस से अघोरी जो उन से आत्मियता से जुडे हो उन लोगो के कोई भी शारीरिक दु:खो एवं मानशिक दु:खो का निवारण कर शकते है।


       ॐ महाचेतना की उर्जा समूह में अघोरी ऋषिमुनी ओ की चेतना के साथ एकात्म हो कर एक निच्चीत स्थान पर केन्द्रित करने से वह स्थान उर्जावान बनता है। एक स्थान पर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की उर्जा जो ॐ महाचेतना है वह केन्द्रीत होने से वह स्थान एक श्री शक्तिपीठ का स्वरुप बनता है। भारतीय उपखंड में विविध स्थान पर जो अलग अलग श्री शक्तिपीठ है वह अघोरी ऋषिमुनी ओ के द्वारा अस्तित्व में आये है। सभी श्री शक्तिपीठो मे अघोरी ऋषिमुनी ओ द्वारा ॐ महाचेतना की अखंड ब्रह्मांड उर्जा का वास होने से सभी श्री शक्तिपीठ ध्यान समाधी में लीन श्री सदाशिव के पत्नी सत्य स्वरूपा श्री सतीदेवी के स्वरुप एवं ॐ महाचेतना के अंश ही कहलाते है। भारतीय उपखंड मे जीतने ही पवित्र श्री शक्तिपीठ है उन्हे श्री महामाया पींड स्वरुप दैवीशक्ति कहा गया है।


       जब मनुष्य ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के चेतना स्वरूप श्री शक्तिपीठ में जा कृतज्ञ भाव प्रकट करता है तब ॐ महाचेतना की शुध्ध अखंड उर्जा जो श्री शक्तिपीठ में केन्द्रित है वह शुध्ध उर्जा वहा आने वाले मनुष्य की चेतना पर प्रभाव डालती है। जीस से वह मनुष्य जो गोचर अगोचर या मलिन शक्ति के प्रभाव में होता है वह भी इस सत्य श्री शक्तिपीठ के केन्द्रों पर जाने से सभी मलिन दुष्ट शक्तिओ के प्रभाव से मुक्त होता है। मनुष्य के जीवन में आनेवाली अडचने दूर होती है श्री शक्तिपीठ मे नियमीत जाने वाले मनुष्य के सभी संकल्प परीपुर्ण हो उस का सर्वांग मनोवांछित विकास शरु होता है।


       भैरव जो ध्यानस्थ समाधी मे लीन श्री सदाशिव के क्रोध का स्वरूप वीरभद्र है जो भारतीय उपखंड में स्थापीत सभी श्रीशक्तिपीठ में विभाजित है। सत्यधर्म का नाष हो और असत्य का अधर्म का पालन हो कोई भी मनुष्य को अन्याय हो उस समय श्री शक्तिपीठ पर वह सत्य प्रभावक ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना के प्रभाव में शिवक्रोध से प्रगट श्री भैरव शक्ति में संकल्प लेने से जरुर सत्यधर्म की विजय और असत्य का अधर्म का सर्वनाष होता है। श्री शक्तिपीठ एवं श्री भैरव की शरण जाने वाले व्यक्ति को न्याय मीलता है इस लीये सनातन धर्म में श्री शक्तिपीठ एवं उनके श्री भैरव के स्थान का महत्व है। भारतीय उपखंड के सभी श्री शक्तिपीठ एवं भैरव के दर्शन कर उनको यथा योग्य भोग प्रसाद का चडावा लगाने से मनुष्य की चेतना श्री शक्तिपीठ की चेतना के साथ रुणानुबंधन मे बंध जाती है। वहा उपस्थीत पवित्र शक्तिया मनुष्य के रक्षार्थ प्रतिबध्ध होती है।


       भारत में नवदुर्गा का नवरात्री एवं दुर्गापूजा में विशेष पूजन महत्व होता है वह भी धयानस्थ अघोरीओ द्वारा केन्द्रित महाउर्जा से प्रगट ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना के श्री शक्तिकेंद्र ही है। सर्व मनुष्यों के आशापूर्ण करने वाले श्री आशापुरा माता, अन्न के देवी श्री अन्नपूर्णा माता, सत्यधर्म के रक्षक सभी शक्तिपीठ ॐ आदी दैवीशक्तिया भी अघोरी सिद्ध रुषीमुनि ओ द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबाकी ॐ महाचेतना की शुध्ध अखंड उर्जा एक स्थान पर केन्द्रित कर स्थापीत श्री शक्तिपीठ है।


     नाम जाप में भी उर्जा होती है मनुष्य की चेतना के लीये राम शब्द का प्रयोग होता है एवं भारतीय धर्मसंस्कार मे पवित्रता से  जुडा नाम भी राम शब्द है। हजारो वर्ष से राम शब्द का जाप पवित्रता एवं आदर सम्मान से कीया जाता है। राम शब्द मे हजारो वर्ष से बहोत बडे वर्ग की धर्मआस्था जुडी होने से ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना की उर्जाशक्ति राम शब्द मे केन्द्रित होती है। इसी लीये कहा गया है रामनाम के जाप मात्र से संकट दूर हो शुध्ध उर्जा का अवतरण हो सर्व अनिष्ट दूर होते है।


       श्रीगणेश जी की पुजा शुभकार्य के शरुआत मे होती है हजारो वर्षो से श्रीगणेश शुभकार्य मे प्रथम याद कीये जाते है शुभ संकल्प की शुध्ध उर्जा शक्ति श्रीगणेश मे केन्द्रित होती है श्रीगणेश की उर्जा से उन्हे शुभकार्य मे प्रथम पुजन से शुभकार्य मे विध्न नही आते। श्री हनुमानजी आदी देव रक्षण के साथ जुड़े हुए है श्री हनुमानजी भी वैसा ही फल देने वाली श्री शुध्ध उर्जाशक्ति का आह्वान कर उन्हे पुजने वाले मनुष्यों को शुभ फल प्रदान करते है उनकी रक्षा करते है।


       ध्यान द्वारा मनुष्य की चेतना को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में केन्द्रित कर उस अखंड ब्रह्मांड उर्जा को ज्यादा लोगो द्वारा निच्चीत नाम या स्थान में केन्द्रित करने से प्रगट देवशक्ति को ध्यानक्रिया से प्रगट देवशक्ति कहा है। और इन देवशक्ति में जो प्रभाव होता है वह प्रभाव के अनुसार कर्मफल उनको पूजते एवं वहा दर्शन जाते सभी मनुष्य को भी मीलता है जो सत्य सनातन है।