श्री रामायण – सनातनधर्म संविधान।

       यह पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न भौगोलिक स्थान पर भिन्न-भिन्न प्रकृतीक आबोहवा है उस अनुरूप वहा रहने वाले लोगो की जीवन सैली हो। वह भू-भाग के वातावरण अनुरूप उनके खान-पान हो जीवन जीने की सुविधा हो। कुछ ऐसे नियम जीस मे मनुष्य अपने कुटुंब में समाज में एवं राष्ट्र में मुख्य धारा में मील कर प्रेम पूर्वक रहने में अपने सामाजीक आर्थीक धार्मीक कर्तव्य निभाने में सुविधा अनुभव करे। अपने समुदाय साथ मील कर आनंद प्रमोद से उत्सव मे सहभागी हो सभी को सुख-दुःख में एक दुसरे का साथ सहकार  मीलता हो। मनुष्य अपनी सभी कर्तव्य सामाजीक आर्थिक एवं धार्मीक प्रवृति प्रमाणीकता निर्भयता से पूर्ण कर शके एसे समाज जीवन और राष्ट्र के धारा-धोरण हो। सभी मनुष्य को अपने कर्म अनुसार समान विकास की तक मीलती हो एसे नितीनियम ही सनातन धर्म है।

 

     आज भारतीय उप महा द्वीप में सनातन धर्म की व्याख्या ही बदल गई है। भारत की प्राचीन व्यवस्था शाक्य मत अनुसार कर्म सिद्धांत थी वह आज प्रारब्ध एवं पाखण्ड अनुशार हो गई है। आज भारतवर्ष में धर्म के नाम पर जो विसंगतता है उससे एक सामान्य सनातनधर्मी अपने आप को बहूत ही हताश दु:खी एवं लधुता का अनुभव करता है।

     भारतमे वर्ण व्यवस्था कर्म आधारीत थी कालांतर मे वर्ण व्यवस्था जन्म आधारीत हो गइ है।

 

१. ब्राह्मण— जो ब्रह्म को जानता है वह ब्राह्मण है ब्रह्म का अर्थ सामाजीक, आर्थीक, धार्मीक यह तीनो ज्ञान का सार है। यह तीनो ज्ञान को शास्त्र कहते है धर्म कहते है साथ मे शस्त्रविध्या मे जो पारंगत है वह ब्राह्मण है। ऋषि परंपरा मे सभी वर्ग के ऋषिमुनी जो जन सुखकारी के लीये वैज्ञानीक शोध-संशोधानो में लगे हुए है उन वैज्ञानिको को ब्राह्मण कहा गया है। ऋषि –जो अपने आपसे अपने कर्म से प्रामाणीक है जो अपने कुटुंब के पथदर्शक है वह सभी मनुष्य ऋषि है। महर्षी –जो प्रामाणीकता के साथ सामाजीक ज्ञान के ज्ञाता है जो अपने समाज के पथ दर्शक है वह महर्षी है। राजर्षी –जो प्रामाणीक है जीन्हे सामाजीक ज्ञान के साथ नितीन्याय एवं धर्म का ज्ञान है जो राष्ट्र के पथदर्शक है वह राजर्षी है। ब्रह्मर्षी– जीन्हे सामाजीक आर्थीक धार्मीक ज्ञान है जो नितीन्याय के साथ शस्त्रविध्या मे पारंगत है जो राष्ट्र के साथ राजा का गुरु एवं पथदर्शक है वह ब्रह्मर्षी है। देवर्षी – जीसे ब्रह्मज्ञान के साथ मोक्ष के सप्त अध्याय का ज्ञान है। जो राजा से राष्ट्, प्रजा से पदाधिकारी, साधु से सन्यासी सबका बीना भेद भाव पथदर्शक है वह देवर्षी है। जो धर्म को धारण करे हुए है जो कीसी भी सामाजीक भेदभाव उचनीच से पर है जो धर्मज्ञान लेने मे एवं धर्मज्ञान देने मे सदा तत्पर है वह ब्राह्मण है। जनसमुदाय को सनातन धर्म के पवित्र सोलह संस्कार को पूर्ण कराने का उत्तरदाइत्व जिस के कंधो पर है वह ब्राह्मण है। ब्राह्मण के इष्ट ब्रह्म के ज्ञाता त्रिकालग्यानी ध्यान समाधी मे लीन श्री सदाशिव है।

 

२. क्षत्रिय हमार धर्म का तो संस्कार ही है “जो शरण मे आय उसकी रक्षा एवं जो हमारे धर्मसंस्कार पर संकट बने उस का सर्वनाष” जो कर्म से रक्षक है वही क्षत्रिय है। जब धर्म पर संकट हो जब संस्कार पर संकट हो जब राष्ट्र पर संकट हो तब जो धर्मयोध्धा बन अपने हाथ मे शस्त्र उठा ले वह क्षत्रिय है। राष्ट्र धर्मसंस्कार एवं मातृभुमी पर मंडरा ते हर संकट का सामना कर धर्मयोध्धा बने जो स्वंम आगे आय और दुसरो को धर्मयुध्ध के लीये प्रेरीत करे वो क्षत्रिय है। जब अपने हि धर्मबंधु संकट मे हो और उनकी मद्दत न करना उन्हे शरण न देना अधर्म है। जब धर्म को धारण करने वाले समुदाय को अपने ही धर से अपनी ही भूमी से विस्तापीत कीया जाय तब उन्हे मद्दत ना कर धर्मीक लोग केवल बतीयाए पर उन प्रताडीतो का समर्थन न करे वो अपने आपको क्षत्रिय कैसे कहेंगे? अपने धर्मबांधवो को शरण दे उनकी एवं अपने मातृभूमी के मूल धर्मसंस्कार के रक्षा हेतु धर्मयुध्ध मे शामील हो धर्मयोध्धा बन आदर्श राज्य व्यवस्थापक बने वह क्षत्रिय है। क्षत्रिय के इष्ट धर्म संस्कार की रक्षाहेतु सर्व असुरो का संहार करने वाले मा अंबिका है।जो पींड स्वरुप महामाया श्रीशक्तिपीठ जो ब्रह्मांड उर्जा के शक्ति केन्द्र है वह क्षत्रिय के इष्ट है।

 

३,वैश्य जो अपने आपसे प्रामाणीक है जो अपने कुटुंब से प्रामाणीक है जो अपने अर्थ आजीवीका से प्रामाणीक है जो अपने धर्म राष्ट्र समाज से प्रामाणीक है वह वैश्य है वैश्य का एक अर्थ ही व्यपार से है। जो महेनत कर अर्थ उपार्जन कर अपने आश्रीतो का प्रामाणीक ता से पालन-पोषण कर अपने कमाइ का थोडा बहोत भाग धर्म के उत्थान मे दान करे समाज के विकाश मे अर्थ से सहभागी बने वो वैश्य है। जो धर्म के कार्यो मे सदा प्रवृत रहे जो धर्म के कार्य हेतु तन – मन – धन से सदा उपलब्ध है वह वैश्य है। जो ब्राह्मण एवं क्षत्रिय को उनके धर्म संस्कार के उत्थान, रक्षा एव व्यवस्था के कार्यो मे अपने धन से सहयोग करे वो वैश्य है। वैश्य के इष्ट जगत के पालनकर्ता श्रीहरी विष्णु है। कर्म एवं कर्मफल के अधिष्ठाता देव है श्रीहरी विष्णु जो अपने आश्रीतो का पालन-पोषण करते है।

 

४. शुद्र जीसे धर्म का ज्ञान नही जो धर्मज्ञान का श्रवण नही करता जो धर्मकार्य को हीन समजता है वह शुद्र है। जो राष्ट्र समाज धर्म को वफादार नही जो धर्म संस्कार की रक्षा को तत्पर नही जो भीरु एवं कायर है वह शुद्र है। जो बिना अर्थ बतीयाता रहेता है पर धर्म समाज के उत्थान की कर्तव्य ले कर्म करने से दुर भागता है वह शुद्र है। जो कोइ कर्म ना कर अर्थ आजीवीका का उपार्जन नही करता जो धर्म एवं समाज को तन-मन-धन से मद्दतरुप नही होता वह शुद्र है। जीसका स्वभाव महेनत करना नही केवल मांगना है वह शुद्र है आज के परिपेक्ष में जिसे सनातनधर्म का ज्ञान नहीं जो सनातनधर्म का रक्षक नहीं जो सनातनधर्म उत्थान को दान नहीं देता वह सभी सनातनी चाहे वह जन्म से ब्राह्मण हो क्षत्रिय हो या वैश्य हो वह अपने सनातन धर्म विमुख कर्मो से शुद्र ही है। 

 

     कर्म से निच्चित होता है मनुष्य कौन से वर्ण मे है। वाल्मीकीजी के पूर्व कर्मो से वो शुद्र थे किंतु अपने उच्च कर्मो से वो ब्राह्मण बन मानव सभ्यता का शिखर मापदंड श्रीरामायण को संस्कृत के महाकाव्य का विराट स्वरुप दे देवऋषि कहलाते है। परशुराम ऋषि ब्राह्मण थे पर धर्मरक्षा के अपने कार्य से एवं ब्रह्मज्ञान से ब्रह्मक्षत्रिय कहलाते है। विश्वामित्रजी भी क्षत्रिय से अपने उच्च कर्मो द्वारा ब्राह्मण बन ब्रह्मऋषि कहलाते है। कर्म को न मान जन्म से वर्णभेद कर छूआ-छुत एवं भेदभाव रखने वाले कीसी भी वर्ण मे जन्मे हो वह शास्त्र अनुशार शुद्र ही है।

 

     आज भारत मे बहुसंख्यक धर्मसमुदाय अपने पुरातन धर्मज्ञान भुला अज्ञानता वश कीतने ही भाग में विभाजित है और सभी समूदाय एक दुसरे समुदाय से विरोधाभासी है। भारत के धार्मीक लोग सोचिये इतना विशाल अथाग ज्ञान भव्य धर्मधरोहर वारसा फिर भी धार्मीक सांस्कृतिक पिछेहठ क्या कारण है? सनातनधर्म समुदाय में एकता का आभाव है संकट समय क्यों एक सनातनधर्मी समूह में एक सामान बर्ताव नहीं कर पता? आखिर ये धर्मएकता होती क्या है? क्यों एक सनातनधर्मी सनातनधर्म के नाम एक हो एक लय में नहीं आ सकता? क्या इसका कारण एक सनातनधर्मी की अपने सनातन शाक्य धर्म की धर्मज्ञान की अज्ञानता है? गुरुपरंपरा के बहाने क्य क्तिपूजा, जन्म आधारीत वर्णव्यवस्था, मूल शुध्ध सनातन शाक्य धर्म मान्यता को भुला सनातन धर्म के नाम तत्वचिंतको के निजी विचारधारा से उत्पन पंथ-संप्रदाय, संगठन, समाज का एक अलग दल बना एक कीडे की तरह उस मे ही आत्मधेलशा मे लीप्त रहेना? धर्म के नाम डर, लालच, पाखंड, अन्धश्रध्धा आखीर क्या है जो भारत का बहुसंख्यक समुदाय अपने सिमीत खोखले कोचले मे सिमट रहा है?

 

     सनातन शाक्य धर्म में सर्वोच्च शक्ति पूजा है –ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा और इन  से प्रकट त्रिदेव से सनातनधर्म के मुलभुत त्रिगुणी सिधांत का ज्ञान। शक्तिपूजा महामाया शक्तिपिंड के शक्तिपिठो की सर्वव्यापक महत्वता एवं शिव क्रोध रूपी भैरव की महत्वता। स्थानदेव देवी की जोगमाया सहीत पांचो प्रकार की देवयोनी की पूजा। सभी देव-देवीओ को निच्चित प्राक्षलन पूजा, मंदिर, यात्रा, शास्त्रोक्त कर्मकांड पूजा। सोलह संस्कार, वेदज्ञान, सनातन मुर्तीपूजा विज्ञान, सनातनधर्म सभ्यता सिखर मापदंड श्रीरामायण सनातनधर्म संविधान। विश्व में सब से प्राचीन धर्मसभ्यता सनातनधर्म सभ्यता है तो फिर एक सनातन धर्मी अपने महानतम वीराट महासागर समान सनातन ज्ञान को भुला एक छोटे-छोटे बंधियार तालाबो के सामान पंथ सम्प्रदायों के अज्ञान मे क्यों डूबा है? एक दुसरे के घोर विरोधाभाषी मिथ्या तर्कों वाले सनातनधर्म नाम पंथ-सम्प्रदायों के कारण ही क्या एक सनातनधर्मी समूह में एक नहीं हो सकता? 

 

     भारत का बहुसंख्यक धार्मीक समुदाय श्रीरामचंद्र को आराध्य मान श्रीरामचंद्र की बहुत ही पुजापाढ करता है श्रीरामचंद्र को श्रीहरी विष्णु के अवतार मान भगवान का उच्चपद दे भक्तिभाव मे आसक्त है। किंतु श्रीरामचंद्र को आराध्य मान उनकी पुजा करने वाले भारत के बहुसंख्यक सनातनधर्म समुदाय क्यो श्रीरामायण के ज्ञान सनातनधर्म संविधान को महत्वहिन् समज भुला कर श्री रामचंद्र का मंदिर तक नही बचा पाए?


    यह गुढ बात जानने के लीये श्रीरामायण के तत्वज्ञान एवं श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र को समजना होगा और अपने जीवन मे भी उतारना होगा।


श्रीरामचन्द्र नवचरीत्र पठन


     श्रीरामायण में श्रीराम का जीवन चरीत्र निरूपण शुद्र से अपने धर्मज्ञान से ब्राहमणत्व को पा देवरुषी बने श्रीवाल्मीकी जी ने कीया है। श्रीरामायण संस्कृत महाकाव्य के स्वरूप मे सनातनधर्म के शुद्ध संस्कार का सिंचन है। इस विश्व का कोई भी मनुष्य या उनके समुदाय श्रीरामायण के ज्ञान एवं श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र को अपने जीवन में उतार लेता है, श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र के अनुरूप जीवन जीवनी अपना ने वाले सभ्य समुदाय को कभी कीसी प्रकार की मानहानि, पीड़ा, लाचारी, यातना एवं दूसरी सभ्यता की दासता सहन करने का समय नही आता है।


     श्रीरामायण का ज्ञान इस विश्व के सभी मनुष्य समूह अपनी जीवन जीवनी में अपना ले तो इस विश्व में सभ्यता, संस्कार, धर्म का राज्य स्थापीत हो जाये जो सच्चे अर्थ में रामराज्य यानी सनातनधर्म की स्थापना हो। हमे समजना होगा क्या है श्रीरामायण के नव मुख्य जीवन आदर्श सुत्र जीन्हे अपने जीवन मे उतारने से सर्व दु:खो, यातना, लघुता से मुक्ति मीलती है।

    

१। माता-पिता एवं गुरुजनों के आज्ञाकिंत – श्रीरामचंद्र।

     श्रीरामचंद्र के राज्यभिषेक की तैयारी पुरजोश से चल रही थी श्रीरामचंद्र के राज्याभिषेक का सभी प्रजाजन आतुरता पुर्वक राह देख रहे थे। श्रीरामचंद्र का राज्यभिषेक होने ही वाला था की अपने माता-पिता की आज्ञा मीलते ही एक पल के विलंब कीये बिना राजगादी का त्याग कर श्रीरामचंद्र ने चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार कर लीया। श्रीरामचंद्र ने सुखवैभव से युक्त राजपाट को माता-पिता के वचन के आगे तुच्छ समजा एक पल भी नही सोचा और माता-पिता की आज्ञा को प्रधानता दे चौदह वर्ष वन मे जाने को तैयार हो गये श्रीरामचंद्र धन्य है।


     श्रीरामचंद्र अपने गुरु श्री वशिष्ठजी एवं श्रीविश्वामित्र जी की आज्ञा से कृतज्ञ हो उनसे शस्त्रविध्या का ज्ञान ले गुरुआज्ञा से असुरो का संहार कीया। गुरुआज्ञा से तड़का स्त्री को मार धर्मरक्षा हेतु स्त्रीहत्या का पाप कीया एवं गुरु आज्ञा से शिवधनुष को दो टुकडो मे विभाजीत कर जनकपुत्री देवीसीता का परीग्रहण स्वीकार कीया।


     श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र से सभी सनातनधर्म में विश्वास करने वाले मनुष्य को बोध लेना चाहीए की माता-पिता के पूण्य प्रताप से यह जीवन है। माता-पिता का मान सन्मान कर उनकी मनोभावना ओ का आदर कर हमे अपने जीवनकर्म करने चाहीये। माता-पिता की सभी सुख-सुविधा का ध्यान रख उनकी सेवा कर उनकी आज्ञा मान उन्हे प्रसन्न करना ही धर्म है। माता-पिता ही हमारा पालन पोषण कर हमे बडा करते है हमे अच्छे से जीवन जीना सिखाते है। वो माता-पिता ही है जो जीवन मे संधर्ष कर दु:ख यातना सहन करके भी अपने संतानो को सर्व सुख सुविधा देने का प्रयत्न करते है। माता-पिता अपना पुरा जीवन अपने संतानो के लीये ही जीते है इस संसार मे माता-पिता से बडा शुभचिंतक कोइ नही है। अपने माता-पिता की आज्ञा मान जो अपने जीवनकर्म करता है वह जीवन मे कभी दु:खी नही होता।


     भारतीय संस्कृति मे गुरु का एक उच्च स्थान है श्रीरामचंद्र ने हमेशा अपने गुरुजनो का आदर कर उनकी आज्ञा मान धर्मरक्षा को प्राथमीकता दे असुरोका संहार कर धर्म की रक्षा कर धर्मरक्षक बने है। सनातन भारतीय परंपरा मे प्रमुख रुप से पांच प्रकार के गुरु को प्रधानता दे उन्हे आराध्य मान उनका रुण चुकाना है।


1, प्रथम गुरु माता-पिता है जिनके कारण हमारा अस्तीत्व है। माता-पिता से ही हमे सामाजीक जीवन का बोध मीलता है।

2, दुसरे गुरु समाज जीवन के उच्च आदर्शो वाले चरीत्रवान कर्तव्य परायण मनुष्य है। उच्च आदर्शो वाले मनुष्यो के जीवन संदेश से हमे बहुत कुछ सिखने को मीलता है।

3, तीसरे गुरु धर्मज्ञान देने वाले महापुरुष है। उच्च धर्मज्ञान का बोध से ही हम कर्तव्य परायण होते है। सत्य असत्य का बोध कराए वही धर्मज्ञान है।   

4, चौथे गुरु जो धर्मरक्षा के पाठ पढा हमे धर्मरक्षा को प्रवृत करे वो महापुरुष है। जो हमे निडर बनाए हमारे धर्म भाइओ की सहाय के लीये अपने धर्म की बहनो के शिलरक्षा के लीये हमे कर्तव्य बोध कराए। जो धर्मरक्षा को आगे आ आक्रामण करी बन आसुरात्व पर विजय प्राप्त करे एव हमें भी धर्म विजय के पथ पर चलने को प्रेरीत करे। 

5, पांचवे गुरुह हमे अर्थ आजीवीका के उपार्जन का ज्ञान दे वो सभी मनुष्य है। जीनके दिये ज्ञान -कला –कारीगरी के ज्ञानबोध से हम अर्थ आजीविका कमाते है अपने कुटुंब का जीवन-निर्वाह कर कुछ धर्मदान करने को सक्षम बनते है।


     एक अज्ञानी को ज्ञानी बना जीवन उपयोगी ज्ञान से ज्ञानी बनाय वह गुरु है ज्ञानदाता सर्व गुरुजनो को आदर मान-सम्मान दे गुरुआज्ञा का पालन करना ही धर्म है। गुरुदेव से जो ज्ञान मीला उसका रुण चुका गुरुको गुरुदक्षीणा देना सभी मनुष्यमात्र की पवित्र धार्मीक कर्तव्य  है।


     एक ज्ञानी ही निर्भय होता है, एक ज्ञानी ही अपने गुरु की आज्ञा मान संकट समय एक हो धर्मविजय के लीये आक्रामणकारी बनता है, एक ज्ञानी ही कीसी के प्रभाव में नहीं आता ज्ञानी तो दुसरो पर अपना प्रभाव डाल सब पर राज करता है।


     एक अज्ञानी ही संकट समय आपस में लड़ जगड अपने अहं से अपने धर्मबंधु से शत्रुता कर शत्रुसे मित्रता करता है। एक अज्ञानी ही अपने धर्मसमुदाय को मात्रुभूमी को पराधीन बनाने में निमित्त बन अपने कर्मो को दोष देता अपने समुदाय के अपने धर्मसंस्कारो के सर्वनाश का कारण बनता है। एक अज्ञानी कभी चिरकाल तक स्वतंत्र नहीं रह सकता अज्ञानी हमेशा बहुमत में होते हुए भी लघुमत के प्रभाव में ही होता है। एक सच्चागुरु ही एक अज्ञानी को ज्ञानी बना सच्चा सनातनी वीर बना शकता है।


२। एक पत्नी व्रतधारी चरीत्र शील एवं धर्मकर्म करते –  श्रीरामचंद्र।

     श्रीरामचंद्र ने जीवन भर एक पत्नीव्रत धारण कर  दुसरा विवाह नहीं करा था अपनी धर्मपत्नी श्रीसीता से प्रमाणीक रहे थे। श्रीरामचंद्र ने अपनी धर्मपत्नी श्रीसीता के रक्षण के लीये रावण जैसे समर्थ शक्तिशाली से  युद्धकर विजयी हो अपनी धर्मपत्नी श्रीसीता की रक्ष कर अपना धर्मदाइत्व निभाया था। श्रीरामचंद्र एक समर्थ राजकुवर होने के साथ विवेक-विनय से शालीनताका परिचय देते हुए कभी कीसी छोटे से छोटे मनुष्य, सेवक, भाई, मित्र सबकी भावना का ख्याल रखते हुए कीसी के रद्य को ठेस पहुचे ऐसा वर्तन नहीं कीया था। सनातनधर्म में विश्वास करने वाले मनुष्य को धर्म की मर्यादा रख सभी मनुष्य का सम्मान करना चाहिये। कभी भी असभ्यता से वर्तन नहीं करना चाहीए सभी दुसरे मनुष्य की बाते, सवेंदना, मान, सम्मान का ध्यान रखकर ही कोई भी कार्य करना चाहीए। जो वाणी वर्तन स्वयं को पसंद नहीं हो वह असभ्य वाणी वर्तन दुसरे मनुष्य से नहीं करना चाहीए।


      श्री सनातन धर्म में आस्था रखने वाले सभी मनुष्य को श्रीरामचंद्र के इस जीवन चरीत्र से बोध लेना चाहीए की सभी मनुष्य को हमेशा पवित्रता से जीवन जीना चाहीए। और पति-पत्नी को सम्पूर्ण वफ़ादारी से एक दुसरे को समर्पण से प्रेम करना चाहीए। सभी पति की कर्तव्य  है वह श्रीरामचंद्र बोध ले हर संकट से अपनी पत्नी की सम्पूर्ण रक्षा करे। अपनी पत्नी के स्वामान का रक्षण करे और उसे हर प्रकार से प्रसन्न और खुश रखे। पत्नी को चाहीए की वह अपने पती की ख़ुशी में ही खुश रहे पती जो अर्थ-आजीविका उपार्जन करे उसमे सुख सांती से गुजरा कर अपने परीवार को एक सूत्रता में बांध कर रखे। कभी भी अपनी मर्यादा रेखा का उलंघन न करे, सनातनधर्म संस्कार अनुसार जीवन चरीत्र राख अपने पती के साथ धर्म कर्म में सहभागी बने।


     एक पत्नी अपने पती से अपने लीये सुवर्ण मुर्ग सामान अमर्याद मांगे शरु कर दे तब स्त्री हठ से विवश हो उस स्त्री का पती श्रीरामचंद्र ने जैसे सुवर्ण मुर्ग के पीछे दौड़ लगाई थी उस प्रकार अपनी पत्नी की खुशी के लीये सुवर्ण मुर्ग सामान धन-सम्पदा के पीछे दौड़ लगायगा। किंतु श्रीरामचंद्र की तरह एक पती अपनी पत्नी से दूर हो जायगा तब साधूरुषी के स्वरुप में आसुरी वृत्ती के मनुष्य उस अकेली स्त्री को विविध प्रयोजन से ललचाए गे। जबतक एक पतीव्रता स्त्री अपने मर्यादा– लक्षमन रेखा के अन्दर रहेगी तब तक कोई भी आसुरी वृत्ती के मनुष्य पतीव्रता स्त्री का कुछ भी अहीत नहीं कर पाएंगे या पथभ्रष्ट नहीं कर पायेगे।


     किंतु यदी पतीव्रता स्त्री ने जैसे ही अपनी मर्यादा लक्षमन रेखा का उलंघन करा उस साधूरुषी स्वरुप मनुष्य अपना आसुरी स्वरुप प्रकट कर वह स्त्री का चरीत्र भंग कर पथभ्रष्ट करने का प्रयास करेगा ही। आसुरी वृत्ती का मनुष्य अपनी मर्यादा लाँघ चुकी स्त्रीका अपहरण कर ले जायगा किंतु एक पती अपने स्वाभीमान के लीये अपनी पत्नी को उस आसुरी वृती के मनुष्य से लड़ाई लड़ अपनी पत्नी को वापस अवश्य लायागा। किंतु एक बार अपनी मर्यादा लाँघ चुकी अपनी पत्नी को एक स्वमानी पती कभी अपना नहीं सकेगा स्वमान भंग हुवा पती अपनी पत्नी का परित्याग ही करेगा। श्रीरामायण के इस मार्मिक  प्रकरण से बोध ले सभी पतीव्रता स्त्रीओ को अपने पती से पूर्णरूप से समर्पीत रहना चाहीए स्त्री का अपने पती के धर्म कर्म में सहयोग करना एवं धर्मकर्म में सम्मलीत होना सबसे बड़ा धर्म है।


     श्रीरामचंद्र सदा धर्मकर्म को प्रधानता देते थे श्रीरामचंद्र रावण वध के लीये माँ जगदंबा की पूजा कर मा भवानी वैष्णवी से शक्ति बाण लीया था जीस से रावण  का वध कीया था। श्रीरामचंद्र शिवलींग की पूजा कर धर्मयुध्ध विजय का शिव से आशीर्वाद लीया था। श्रीरामचंद्र ने अपनी प्रजा की सुखकारी एवं रामराज्य के प्रभाव को बढ़ाने अश्वमेघ यज्ञ कीया था जीसमें धर्म की मर्यादा रखने को अपनी पत्नीसीता की पंचधातु की मूर्ती  संग यज्ञ में आहुती देने बैठे थे। श्रीरामचंद्र सनातन धर्म कर्म पूजापाठ करते थे हम सब सनातन धर्मीओ को भी अपने आराध्य श्रीरामचंद्र से बोध ले हमेसा सनातनधर्म कर्म में अपनी पत्नी संग प्रवृत रहना चाहीए।


३। भाईबांधव, सखा मित्रो से प्रमाणीक एवं अपने धर्मसंस्कार मातृभूमी से समर्पीत – श्रीरामचंद्र।

     श्रीरामचंद्र अपने सरल शालीन स्वभाव से अपने छोटे भाइयो से बहोत ही प्रामाणीक थे। श्रीरामचंद्र ने कभी भी अपने छोटे भाइयो से अन्याय नहीं कीया था। श्रीरामचंद्र अपने मित्रो संग मान-सन्मान सहित आदर पूर्वक सामान वर्तन करते थे। श्रीरामचंद्र ने अपने मित्रो को जो वचन दिए थे वह सर्ववचन का पालन कर दिखाया और श्रीरामचंद्र सभी परीक्षा जो भाई के भाई साथ सबंधो की परीक्षा हो या मित्र के मित्र साथ सबंधो की परीक्षा हो श्रीरामचंद्र सभी परीक्षा  में पार उतरे है।


     सनातन धर्म में विश्वास करने वाले सभी मनुष्य को भी अपने जीवन में सभी व्यवहार में प्रमाणीकता से वर्तन करना चाहीए। घर में कुटुंब में एक भाई को दुसरे भाई से हमेशा प्रमाणीकता से वर्तन करना चाहीए जैसे श्रीरामचंद्र अपने भाईसे प्रामाणीक थे। जीवन में अच्छे मित्र बहोत ही कठीनाई से मीलते है श्रीरामचंद्र जीस प्रकार से अपने मित्र विभाषण, निषादराज, सुग्रीवजी के साथ प्रामाणीक और समान व्यवहार कीया उसी प्रकार से सभी सनातनधर्मी मनुष्य को अपने मित्रो से समान और प्रामाणीक वर्तन करना चाहीए। जैसे श्रीरामचंद्र अपने धर्मसंस्कार एवं मातृभूमी को पूर्ण समर्पीत थे हम सनातन धर्मीओ को भी अपने भारतवर्ष एवं सनातन धर्मसंस्कार को पूर्ण समर्पीत होना है।


     श्रीरामचंद्र अपने मातृभूमी एवं सनातनधर्म को पूर्ण प्रामाणीक एवं समर्पीत थे श्रीरामचंद्र अपने जीवन काल में हर हमेश अपने मातृभूमी एवं धर्म के रक्षण को ही प्रधानता दी है। अपने राष्ट्र के सभी नीती-नियम का प्रजा पालन करता बने एवं प्रमाणीकता से राष्ट्र के कर का भुगतान करे तब ही रामराज्य की स्थापना हो सकती है। न्याय व्यवस्था सुद्रढ़ हो, उदंड को उचित दंड मीलता हो, अधर्मी ओ का सर्वनाश होता हो, राष्ट्र के सभी प्रजाजन निर्भय हो, प्रजा को सामान विकाश की तक मीलती हो, राष्ट्र में चुस्तता से सनातन धर्म का पालन होता हो, प्रजाजन उत्साह उमंग से राष्ट्र एवं सनातन धर्म के सभी उत्सव त्यौहार आपस में मील -जुल कर सार्वजानिक रूप से मानते हो, जहा राष्ट्रविरोधी ओ को अधर्मी ओ को निर्ममता से कुचला जाता हो वाही आदर्श रामराज्य कहा जायगा।


      आज हम सभी सनातन धर्मी मातृभूमी भारतमाता के जयकारे लगा रहे है किंतु क्या हम सनातनधर्मी मातृभूमी भारतमाता को पूर्ण प्रमाणीक है? क्या हम सनातनधर्मी हमारे भारतवर्ष के सभी नीती-नियम का पूर्णता से पालन करते है? क्या हम सनातनधर्मी हमारे भारतवर्ष के मूल सनातनधर्म संस्कार को पूर्ण समर्पीत है? जो हम सनातनधर्मी भारतमाता मातृभूमी भारतवर्ष के प्रती पूर्ण प्रमाणीक है तो इतने भ्रष्टाचार में लिप्त क्यों है? 


४। उंच-नीच के भेद का खंडन करते – श्रीरामचंद्र।

     श्रीरामायण में श्रीरामचंद्र का जीवन चरीत्र का भव्य निरूपण करा वह रुषी वल्मिकीजी अपने पूर्वकर्म में शुद्र ही थे जो अपने सद्कर्मो से शुद्र से ब्राह्मण बने थे। श्रीरामायण काल मे जो धर्म से विमुख हो, जो बिन जिम्मेदार हे, जो धर्म को तन-मन-धन से उपलब्ध नहीं, जो धर्म को हीन समज अधर्म का आचरण करता हो, जो व्यभिचारी व्यसनी कुसंगती हो, जो चोरी लूटके कार्यो में लिप्त हो उसे शुद्र कहा जाता था।


     श्रीरामचंद्र सामाजीक एकता के प्रखर हिमायती थे श्रीरामचंद्र वनवास काल में अपने से निषाद राज के अतिथी बन उनको मान-सन्मान दे अपने मित्र का दरज्जा दे निषादराज को अपने समकक्ष माना था। श्रीरामचंद्र ने भील जाती के वृध्धा शबरीजी को माता का दरज्जा दिया एवं उनके जूठे बेर खाए थे। सनातन धर्म में विश्वास करने वाले सभी धर्मीक मनुष्य को एक बात गंभीरता से सोचनी चाहीए की यदी श्रीरामचंद्र को सामाजीक उंच-नीच के कोई भेद भाव नहीं थे तो श्रीराम को आराध्य मानने वाले सनातनधर्म के धार्मीक मनुष्य क्यों सामाजीक उंच-नीच के भेद भाव को मानते है? यदी श्रीरामचंद्र अपने से निम्न कुल के निषादराज को मित्र मान सकते हो आदीवासी वृध्धा शबरी भील जाती के होने के बावजूत उनके जूठे बेर खा सकते है तो फिर श्रीरामचंद्र को आराध्य मानने वाले सनातन धार्मीक समुदाय क्या श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र को जुठलाकर छुआ-छूत उंच-नीच पर अभी भी विश्वास करेंगे?


     भारतवर्ष के सनातन धार्मीक लोग इतना तो सोचिये जीस को हम सभी आराध्य पूज्य मानते है वह श्रीरामचंद्र को कोई छुआ-छूत कोइ भेद-भाव कोइ उंच-निच नहीं है तो श्रीरामचंद्र को आराध्य मान भक्ति भाव से उन्हे पूजने वाला धर्मीक समुदाय क्यो सामाजीक उंच-निच छुआ-छूत भेद-भाव के विषचक्र में फसा हुआ है? प्राचीन धर्मशास्त्रो में शुद्र की व्याख्या का आज गलत अर्थघट्न कर जो कर्म महनत करते कर्मशील सनातनधर्मी है, जो धर्मशास्त्रो की व्याख्या में अपने कर्मो से ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वैश्य की श्रेणी में आते है, उन अपने ही सनातनधर्म के भाईओ से सनातनधर्म संस्कार मे आस्था रखने वाले जन्म से उच्च सनातनधर्मी सामाजीक छुआ-छूत उंचनिच में विश्वास रखे वह श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र का अपमान है। जब श्रीरामचंद्र का श्री राममंदिर खंडीत हुआ तब भारतवर्ष मे अधर्मी प्रबल नहीं थे किंतु इस छुआ-छूत एवं उंच-निच के भेदभाव पुर्ण सामाजीक बंधारण से सनातनधर्म समुदाय अस्त-व्यस्त विखंडित था सनातनधर्मी अलग अलग समाज पंथ संप्रदाय मे विभाजीत हो एक दुसरे के विरोधी थे। अधर्मीओ ने इस निर्बलता का बहुत लाभ उठाया यहा के सनातन धर्मीओ मे फूट डाल आपस मे लडा वो आक्रमकता से आगे बड हमारे धर्म धरोहरो का नाष कीया। उस समय जो सामाजीक एवं धार्मीक बंधारण था उस अनुसार आधे धर्मसमुदाय को तो शुद्र दलीत और निचा समज कर उनको लड़ाई लड़ने का अधीकार नहीं था उनको श्रीरामचंद्र के मंदिर में प्रवेश कर दर्शन करने का भी अधीकार नहीं था। शास्त्र आधारीत शुद्र की अयोग्य परिभाषा कर अप्ने हि धर्मबंधु ओ को शुद्र समज उन से दूर रहेना छूआ-छूत का पालन करना वह छु ले तो अपवित्र हो जाये ऐसी भावना के साथ उनसे सामाजीक भेद-भाव रख कर उन्हे अपमानित कीया जाता था। वैश्य से जो व्यपारी या कीसान जैसे वर्ग उनको भी लड़ाई लड़ने का कोई अधीकार नहीं था। रक्षा का भार क्षत्रियो पर था उनको लड़ाई लड़ने का अधीकार था किंतु आपसी अहं के टकराव से क्षत्रियो मे एकता नहीं थी क्षत्रिय परस्पर वैमनष्य से अपने निजी छोटे-छोटे समुदाय में बट गए थे। ब्राह्मण मर जाना पसंद करता था किंतु उसको कोई छु ले वह उनके लीये पाप था ब्राह्मण भी बहुत लडे किंतु अकेले अपना अलग दल बना क्षत्रियो के साथ मील कर नहीं लडे थे। क्युकी यदी क्षत्रियो के साथ मील कर लड़ेतो उनको छूना पड़े और ब्राहमण को कोई छू जाये तो उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता था। अपना कौन सा धर्म बचाने ब्राह्मणो ने सनातन धर्म को दांव पर लगा दिया? इस विषम स्थिति का सम्पूर्ण लाभ जोकोई अधर्मी आक्रमणकारी आये उन सबने लीया। भारतीय समाज व्यवस्था ही इस प्रकार की है सब अलग अलग इस लीये भारतीय इतहास का अध्ययन करे भारतवर्ष के बहुसंख्यक सनातन हिन्दुसमुदाय पर मुट्ठीभर अल्पसंख्यक अधर्मी  ही राज करते आये है। भव्य प्राचीन धर्म धरोहर वाले सनातन धर्मसमुदाय ने हमेशा लाचार बन गुलामी की यातना भोगी है किंतु अपनी भुल स्वीकार आपस मे एक नही हुए है।


     एक ही धर्म का अनुसरण करते मनुष्य अपने धर्मबंधु से उंच-नीच के भेद रखेंगे तो वह धर्म नहीं अधर्म है। सनातनधर्मी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को पूज्य मानकर पूजा अर्चना करते है वह मां कोई कोई भेद नहीं करते है तो उसको मानने वाले क्यों एक दुसरे से भेद करते है? हमारा प्राचीन सनातन धर्म कर्म को महत्व देता है अपने कर्म से मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र गीना जायगा। इस लीये जो यह “एकात्मसत्य” पढ़ रहे है उन सर्व सनातनधर्म में विश्वास करने वाले धार्मीक “एकात्मसत्य” के पाठ के बाद कोई भी सनातनधर्म में मानने वाले मनुष्य अपने हि धर्मबंधु से भेद-भाव या उंच-नीच में मानकर उसका अपमान करता है कोई भी सनातनधर्मी दुसरे कोई भी सनातनधर्मी को उनके धार्मीक मंदिर में प्रवेश के लीये रोके गाया भेद-भाव या उंच-नीच में विस्वास करेगा वह सनातनधर्मी नरक की यातना सहन करेंगे उनका अस्तित्व वह सनातनधर्मी स्वयं ही संकट में डालेंगे। सनातनधर्म समुदाय वर्षो से गोऊ माता का चमड़ा कूट नगारा बनाने वाले अपने ही धर्मबंधू से छुआ-छुट रखते है तो गायमाता को मार  कर खाने वाले समुदाय से छुआ-छुट क्यों नहीं रखते? जब गायमाता के चमड़े से बना नगारा मंदिर में स्थान प्राप्त करता है तो नगारा बनाने वाले सनातनधर्मी क्यों मंदिर में नहीं आ सकते है?


     आज से ही जो सनातनधर्मी मनुष्य या उसका समुदाय सामुहीक रीत से समाज में कोई भी उंच-नीच के भेदभाव को भूलकर सर्व समाज समानता से वर्तन करेगा उस मनुष्य पर उसके समाज पर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा आशीर्वाद उतरेगा वह बहोत ही सुख-समृद्धि प्राप्त करेगा। जब धर्म के लीये भालू, वानर, गिध्ध, गिलहरी, सब एक हो सकते है तो भारतवर्ष के सनातनधर्मी समुदाय श्रीरामायण के ज्ञान पर रामराज्य को क्यों एक नहीं हो सकते? आओ हम सनातन धर्मी श्रीरामचंद्र के नाम श्रीरामायण के नाम भारतवर्ष के नाम ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के नाम एक हो एकात्म हो जाय।


५। धर्म पालन के लीये युध्धनिती का त्याग करते – श्रीरामचंद्र।

     विश्व के सभी मनुष्यों के लीये प्रथम प्रथामीकता है अपना एवं अपने समुदायका धर्मसंस्कार यदी मूल मातृभूमी का धर्मसंस्कार ही नष्ट  हो जायगा तो स्वयं मनुष्य एवं उसके धर्मसमुदाय का अस्तित्व ही कहा रहेगा? इस लीये श्रीरामायण में स्पष्ट संदेश है की धर्मसंस्कार की स्थापना हेतु यदी युध्धनिती का त्याग करना पड़ेतो करो किंतु धर्म का पालन करो। इसीलीये धर्मसंस्कार के पालन हेतु श्रीरामचंद्र ने तड़का वध कर के स्त्रीहत्या का पाप कीया, बाली को पीठ पर वार कर के पिठ्घात का पाप कीया एवं रावण ब्राह्मण था उसका वध करके ब्राह्मणहत्या का पाप कीया।


     तड़का स्त्री थी किंतु वह अधर्म का आचरण करती थी सभ्य समाज को ताड़का से संकट था धार्मीक लोगो के धर्म कार्य में रुषिमुनी ओ के यज्ञ होम हवन में तड़का बाधा उत्पन्न कराती थी। ताड़का को स्त्री समजकर श्रीरामचंद्र ने क्षमा कर दिया होता तो ताड़का से अधर्म की प्रेरणा ले दूसरी स्त्रिया भी अधर्म का आचरण करने का कारन बनता था। श्रीराम ने ताड़का स्त्री होते हुए भी ताड़कावध कर युध्धनिती का त्याग कर हमको संदेश दिया की धर्माचरण ही सर्वोपरि है, धर्म है तो सभ्यता है धर्म है तो सुशासन है धर्म के लीये युध्धनिती का त्याग करना पड़े तो करो पर धर्म के पालनकर्ता बनो। 


     बाली भी अधर्म के रस्ते था अपने छोटे भाई सुग्रीवजी के साथ विश्वासघात कर सुग्रीवजी की पत्नी से व्यभिचार करता था। श्रीराम ने बाली को इसके जधन्य अपराध के लीये क्षमा करते तो सभ्य समाज में नितीमत्ता का पतन हो व्यभिचार को प्रोत्साहन मीलता। श्रीरामचंद्र ने बाली का पीठघात से वध कर सर्व सनातन धार्मिको को एक संदेश दिया की सभ्य समाज में एक भाई अपने भाई से द्रोह करे या कुटुंब में व्यभिचार करे तो वह अधर्म है और ऐसे अधर्म का नाष करने को युध्धनियम के विपरीत जा युध्धनिती का त्याग करके भी धर्म के पालन कर्ता बनो। 


     रावण जन्म से ब्राह्मण था चारवेद का ज्ञाता प्रकांड पंडित था फिर भी वह धर्म विरुध्ध असभ्य आसुरी राक्षसो का संरक्षक बना हुवा था इस से सामान्य धार्मीक लोग दुखी एवं प्रताड़ित थे। श्रीरामचंद्र जो रावन को ब्राह्मण समज क्षमा कर देते तो सभ्य समाज का अस्तित्व ही संकट में आ जाता जो सभ्य समाज ही नहीं तो धर्म कहा से? श्री रामचंद्र ने ब्राह्मण होते हुए आसुरी राक्षसो के संरक्षक बने रावण का वध कर सभ्य सनातनधर्मी मो को एक संदेश दिया की कोई कीतना ही समर्थ हो ज्ञानी हो किंतु वह जो अधर्म का साथ दे अधर्मी आसुरी प्रवृती का संरक्षक बने तो धर्म के लीए युध्धनिती का त्याग करके भी धर्म पालनकर्ता बनो।


     श्रीरामचंद्र ने सभ्य समाज को संदेश देने के लीये अपने जीवन काल मे तीनबार युध्धनिती के विरुध्ध जा धर्म की स्थापना की है । सभ्य समाज में जो सभ्यता कायम रखनी हो धर्म का आचरण कायम रखना हो तो निती का त्याग करना पड़े तो करो किंतु धर्म का पालनकरो। ताड़का, बाली, रावण यह तीनो का वध धर्म अनुसार निती विरुध्ध कहलाता है किंतु धर्मस्थापन के लीये अधर्म के सर्वनाष के लीये ही श्रीरामचंद्र ने युध्धनिती विरुध्ध कर्म करके भी इन तीनो अधर्मीओ का वध कीया है। श्री सनातनधर्म में विश्वाष करने वाले सभी मनुष्य को भी इस बात का ध्यान रखना चाहीए की धर्म ही सर्वोपरी है। यदी धर्मका आचरण सभ्य समाज जीवन में होगा तो ही सभी सामाजीक व्यवहार सुखरूप चलेंगे धार्मीक लोग शांति से बिना भय रह सकेंगे। किंतु यदी धर्म का पतन हो गया तो अधर्म का आचरण होगा जो कभी भी स्वीकृत नहीं कीया जा सकता है।


     धर्म के पालन के लीये सभ्य लोगो को निती का भंग करना पड़े तो करो किंतु धर्म संस्कार का पालन करना यह सभी सनातनधर्मी की अनिवार्य पवित्र धर्म कर्तव्य  है। यदी धर्म का आस्तित्व होगा तो ही उसमे मानने वाले सभ्य समाज का अस्तित्व होगा धर्म ही नहीं होगा तो सभ्य समाज एवं सनातन धार्मीक मनुष्यों का भी अस्तित्व कहा से होगा? इस लीये सनातन धर्म में विश्वास करने वाले सभी मनुष्यो को समाज में जहा असभ्यता हो, अधर्म का आचरण होता हो, धार्मीक मनुष्य का मानभंग होता हो, सनातन धार्मीक कार्य में कोई आसुरी तत्व बाधा उत्पन्न करता हो, सनातन धार्मीक लोगो को अन्याय होता हो तो सभी सनातन धर्मीओ को एक हो एकात्म हो सयुक्त हो सभी मनुष्य को अधर्म के विरोध में आवाज उठानी चाहीए। चाहे कोई भी हो जो अधर्म का आचरण करता हो उसको यथा योग्य दंड देना चाहीये। सभ्य समाज मे धर्म का पालन ही श्री सनातन धर्म में मानने वाले सभी सभ्य समाज के मनुष्य की पवित्र धर्म कर्तव्य  है।


६। रामराज्य स्थापना का जीवनध्येय एक कुशल नेतृत्वशक्ति– श्रीरामचंद्र।

     श्री रामचंद्र का जीवन में एक ही जीवन ध्येय  लक्ष्य था सभ्यता का धर्म का पालन और असभ्यता का अधर्म का सर्वनाष। श्री रामचंद्र का लक्ष्य रावण नहीं था किंतु उस से भी ऊँचा सर्व असभ्य राक्षस जाती का सर्वनाश कर धर्म एवं सभ्य समाज की रक्षा कर रामराज्य की स्थापना। श्री रामचंद्र के इतने ऊँचे रामराज्य के ध्येय लक्ष्य के सामने रावण तो बहोत ही छोटा था इस लीये रावण का सर्वनाष निच्चीत था।


     सभी सनातन धर्म में विश्वास करने वाले मनुष्य को  स्वयं का जीवन ध्येय रामराज्य को समर्पीत ऊँचा रखना चाहीए उसे प्राप्त करने के लीये परिश्रम करना चाहीए। जीस प्रकार श्री रामचंद्र ने असभ्यता और अधर्म विरुद्ध लड़ाई लड़ रामराज्य स्थापीत कीया तो श्री रामचंद्र को अपना आराध्य मानने वाले सभी सनातन धर्मी मनुष्यों की  पवित्र धार्मीक कर्तव्य बनती है की समाज में कुटुंब में, राष्ट्रमें, सभी जगह पर असभ्यता और आसुरत्व का नाश हो ऊसके लीये सामूहीक प्रयत्न हो।


     जीवन मे जितना लक्ष्य जीवन ध्येय ऊँचा रखोगे उतनी ही अडचने ज्यादा आएँगी। एक बार ऊँचा ध्येय रखो फिर छोटी-छोटी बाते कभी भी जीवन पर गहरी असर नहीं करेंगी और छोटी-छोटी बातो के आभाव में निकट के पारीवारीक  कलेश या सामाजीक मन मुटाव कभी नहीं रहेंगे। घर मे कुटुंब में सभ्यता की धर्मसंस्कारो की रामराज्य की स्थापना होगी जीस की सकारात्मक असर घर से कुटुंब से समाज में हो कर समग्र राष्ट्र में फैलेगी और सभी जगह रामराज्य की स्थापना होगी। जीवन में एक निच्चित ऊँचा जीवन ध्येय लक्ष्य वह प्राप्त करने का संकल्प कठोर संघर्ष महेनत ही सभी सनातन धर्मी का जीवन धोरण ऊँचा लायेगा सर्व सनातन समाज सुखी होगा।


     श्री रामचंद्र के जीवन चरीत्र से हम सब सनातन धर्मी ओ को बोध लेना चाहीए की धर्माचरण ही सर्वोपरी है धर्मसंस्कारो की स्थापना का ही जीवन ध्येय होना चाहीए। भारतवर्ष की पुन्य धरा पर अधर्म असभ्यता का सर्वनाष कर धर्म का रामराज्य स्थापीत करना ही हम सनातन धार्मीक लोगो का एक मात्र जीवन ध्येय होना चाहीए। श्री रामचंद्र एक कुशल जन्म जात नेता है जो अपने सभी योद्धा जो श्रीरामचंद्र के रामराज्य स्थापना के अभियान में सहभागी है वह सभी धर्मयोध्धा रामभक्तो को उनकी योग्यता अनुसार श्रीरामचंद्र महत्व देते है। श्रीरामचंद्र सब अच्छे से जानते है की हनुमानजी का सामर्थ्य कीतना है? सुग्रीवजी, विभीषण का कीतना महत्व है? नल-नील का समर्पण कीतना है? अंगद धर्म के प्रति कीतना अडग है? जामवंतजी का ज्ञान कहा काम आ सकता है? अपने छोटे भाई लक्षमन को कीतनी न्जिम्मेदारी देनी है? वानर, भालू एवं छोटे से छोटी एक गिलहरी  का कीतना महत्व है? 


     श्रीरामचंद्र ने धर्म के लीये सर्व प्रथम केसरिया करने वाले महान धर्मयोध्धा गिध्धराज श्री जटायुजी को उचित मान सम्मान दीया था।  वीरगती को प्राप श्री जटायुजी को अश्रूभीनी आखो से अपने रद्य से लगा अपने हाथो श्री जटायुजी के पार्थीव शरीर को अग्नि संस्कार दे आखरी विदाइ दी थी।


     सभी धर्मयोद्धा अपना अपना नीजी  मतभेद भुला श्री रामचंद्र के नेतृत्व में रामराज्य की स्थापना के महाकार्य में योगदान देते है उन सभी धर्मयोध्धा ओ को श्री रामचंद्र यथा योग्य मान सम्मान महत्व देते है। सभी धर्म को समर्पीत  योद्धा वह लक्ष्मण हो या नल-नील, श्री हनुमानजी हो या विभिषणजी, वीर अंगद हो या ज्ञानी जामवंतजी, राजासुग्रीवजी हो या जटायूजी सभी को श्रीराम का प्रेम मीलता ही है। युद्ध मैदान में भी सभी योद्धा को उचित तक श्रीरामचंद्र ही देते है और जरुरत लगे तो उस योद्धा को पूर्ण मदद भी करते है किंतु श्रीरामचंद्र अपने कीसी भी योद्धा की हार नहीं होने देते जो एक सबल नेतृत्व का गुण ही है। श्रीरामचंद्र के नेतृत्व में सभी समुदाय एक होकर एकात्म हो धर्मयुध्ध लड़ते है श्रीरामचंद्र के नेतृत्व और सबका साथ सबको समानता की रणनीती का एक भाग ही है की भालू, वानर भी सनातनधर्म के लीये एक हो गए थे।


     भारतवर्ष के सनातन धर्म में विश्वास करने वाले सभी धार्मीक मनुष्य को श्रीरामचंद्र की नेतृत्व कला और सब का साथ लेकर धर्मकार्य करने की निती अपने जीवन में अपनानी चाहीए। श्रीरामचंद्र के जीवन से प्रेणना लेकर जो सामुहीक धर्मकार्य में जो नेतृत्व करते हो वह सभी धर्मरक्षक सभी योध्धा ओ को एक रख कर सबका साथ ले आगे बढे और जो सनातनधर्मी एक सैनिक की तरह धर्मरक्षक है वह श्रीरामचंद्र के जीवन का आदर्श स्वयं के जीवन में उतार कर पूर्ण लगनी से धर्मस्थापन का कार्य पूर्ण लगन और निष्ठा से करे।


     आज भारत मे एक हजार से ज्यादा हींदुत्व के संगठन है जो अपने से धर्म लीये बनते प्रयास करते है। किंतु सभी हींदुत्व के संगठन एव् पुर्ण समर्पित कार्यकर्ता ओ को ना तो अपने सनातन धर्म का ज्ञान है ना ही विजय संकल्प है। भारत में हींदुत्व के संगठन ही अपनी पराजय का स्विकार कर अपने ही समुदाय को भयभीत कर रहे है। क्या भय से एकत्रीत हुआ समुदाय कभी धर्मयुध्ध मे विजय प्राप्त करता है? संकल्प ही पराजय का ले लडने की बात करते है कैसे सम्भव है? सनातन धर्म के ज्ञान अभाव मे आज परीस्थीती यह है की भारत मे हींदुत्व के संगठन आपस मे ही लड रहे है। आज भारत के सनातन धर्मी को संगठन से ज्यादा सनातन धर्म के ज्ञान की आवश्यकता है श्रीरामायण के नव सुत्रो की आवश्यकता है। 


     भारतवर्ष के सभी सनातन धर्मबंधू सनातन धर्म के ज्ञान एव श्रीरामायण के नव सुत्रोसे आपस में एक हो एक सूत्रता से एक अजेय रणनीती का गठन करे। सभी सनातन धर्मी भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना का जीवन ध्येय बना अपनी आने वाली नयी पीढ़ी को सुसंस्कृत धार्मिक सभ्य समाज की भेट देना ही सबसे बड़ा रामकाज है।


७। श्रीरामचंद्र के नेतृत्व में आपना धर्मकार्य करते रामभक्त– श्रीरामचंद्र।

     श्रीरामचंद्र के नेतृत्व में रामराज्य की स्थापना में अपना अमूल्य योगदान दे अजर अमर होने वाले महावीरो की वीरगाथा ओ का श्रवण एवं मनन करना सनातन धर्म संस्कार का पवित्र धर्मकर्म है। रामकाज को–केसरीयावीर गिध्धराज जटायूजी, कीसकीन्धा नरेश वानरराज सुग्रीवजी, धर्मचारी विभीषणजी, वीर बंधू नल-नील, अडग एकलवीर अंगद, रिंछराज महाज्ञानी जामवंतजी, भात्रु आज्ञाकारी लक्ष्मण-भरत-सत्रुज्ञ, महावीर महाज्ञानी रामभक्त शिरोमणी श्री हनुमानजी, धर्मप्रिय नन्ही गिलहरी, धर्म एकता सूत्र से बंधी राम आज्ञा कारी विराट वीर वानर सेना सहित सभी रामभक्तो ने एक हो धर्मयुध्ध में अपना अपना पराक्रम दिखा रामराज्य की स्थापना में निमित्त बन अजर अमर हो गये है।


केसरीया वीर गिध्धराज जटायूजी–

     जब रावण माँ सीता का हरण कर वायुमार्ग से लंका जा रहा था तब माँसीता मदत के लीये पुकार लगा रहे थे। श्री जटायूजी ने माँसीता की पुकार सुन एक क्षण का भी विलंब न करते हुए एक अबला नारी की एक दुष्ट असुर से रक्षा कर केसरीया करना ही अपना धर्मकर्तव्य मान रावण को युध्ध के लीये ललकारा। श्री जटायूजी माँसीता को नहीं जानते थे, श्री जटायूजी रावण की शक्ति सामर्थ्य से पूर्ण अवगत थे, श्री जटायूजी अकेले थे वह जानते थे की रावण को युध्ध के लीये ललकारने का अर्थ मौत है। श्रीजटायूजी ने अपने जीवन से धर्मकर्तव्य को ज्यादा महत्त्व दीया, श्री जटायूजी ने संकल्प लीया की जब तक शरीर में प्राण है तब तक इस असुर रावण को इस अबला नारी को ले आगे नहीं जाने दूंगा। श्री जटायूजी अपना धर्मकर्तव्य भली भांती जानते थे की जब कोई लाचार, असहाय, स्व धर्मबंधु, अबलानारी संकट में है और वह आँखों से दिखाइ दे –उनकी मदत की पुकार कानो को सुने दे तब तुरंत उन लाचार, असहाय, स्वधर्मबंधु, अबलानारी की रक्षा करना ही धर्म है।


     केसरीया वीर गिध्धराज श्री जटायूजी ने यह नहीं सोचा था की में अकेला हु, में कहा इस अबलानरी को जानता हु? मै कीसी के मामले में क्यों हस्तक्षेप करू? इस असुर रावण को इस के कर्मो की सजा भगवन देगा, रावण मुझे मार देगा तो? किंतु केसरीया वीर गिध्धराज जटायूजी अपने धर्म कर्तव्य को अपने प्राणों से ज्यादा महत्व दिया और धर्म के पथ पर चल वीरगती को प्राप्त हो अजर अमर हो गए। धन्य है धन्य है केसरीया वीर गिध्धराज जटायूजी जो हम सनातन धर्म धारण करने वालो को अपने धर्म कर्तव्य की प्रेरणा दे गये की –“ मै तो एक गीध्ध होते हुए अपना धर्म कर्तव्य निभा गया तो आप सब तो रामभक्त सनातन वीर हो आपके आँखों के सामने यदी कोई लाचार, असहाय, स्व धर्मबंधु, अबलानारी आसुरी संकट में हो तब श्रीरामचंद्र का नाम ले कूद जाना धर्मयुध्ध में विजय हुवे तो केशरिया राजा बन यश के भागी बनोगे और वीरगती को प्राप हुए तो वैकुंठ वासी बन अजर अमर बनोगे।


कीसकीन्धा नरेश वानरराज सुग्रीवजी –

     वानर राज सुग्रीवजी समस्त विराट वीर वानर सेना के अधीपती थे, वानर राज सुग्रीवजी ने धर्म के लीये –सनातन संस्कार के लीये- रामराज्य की स्थापना के लीये अपने आप एवं अपनी विराट वीर वानर सेना को श्री रामचंद्र को समर्पीत कर दिया था। न भूतो न भविष्य तो आज तक वानर राज सुग्रीवजी जैसा वीर पुरुष इस पृथ्वी पर पैदा नहीं हुवा जीसने अपने धर्मसंस्कार के लीये – रामराज्य के लीये अपना निजी अहं- अपना पद-त्याग कर अपने आप एवं अपनी सेना को दुसरे धर्मयोध्धा को समर्पित कीये हो? वानरराज सुग्रीवजी समस्त सनातन वीरो के प्रेरणाश्रोत है। सनातन धर्म के लीये, भारतवर्ष मातृभूमी के लीये, रामराज्य के लीये संघर्ष रत सनातन वीरो को वानरराज सुग्रीवजी से प्रेरणा ले अपना अहं, अपना पद को भूल कर एक हो एकात्म हो अपने सनातन हित संगठनों – समर्थको सहीत एक छत्र सनातन धर्म के नेतृत्व में समर्पीत होना है।


धर्मचारी विभीषणजी–

     धर्मचारी विभीषण जी ने अपनी मातृभूमी को आसुरी शक्ति ओ से मुक्त करने को, लंका के असहाय प्रजाजानो को आसुरी शक्तिओ से मुक्ति दिलाने लंका में धर्म की स्थापना हेतु भात्रुद्रोही बनने का कलंक स्वीकार कीया किंतु धर्म का साथ नहीं छोडा। धर्मचारी विभीषणजी के लीये अपने कुटूम्ब के, अपने भाई ओ के आसुरी कर्मो से अपना धर्म कर्तव्य ज्यादा महत्व का था। धर्मचारी विभीषणजी से समस्त सनातन धर्मी ओ को प्रेरणा लेनी चाहीए के जब भी अपने कुटुंब अपने भाईके धर्म विरोधी आचरण और अपना सनातन धर्म संस्कार दोनों में से अपने सनातन धर्म संस्कार को पहली प्राथमिकता दे धर्म का आचरण करना चाहीए।


वीरबंधू नल-नील–

     वीरबंधू नल-नील ने रामराज्य के लीये धर्म के लीये अपने आपको पूर्ण रूप से श्रीरामचंद्र को समर्पीत कर दिया। जो रामचंद्र की आज्ञा जो रामचंद्र का कार्य – श्रीरामचंद्र के नाम मात्र से पानी में पथ्थर तैरते है वह वीरबंधू नल-नील ने सिध्ध कर दिखाया। अपना कार्य रामकाज को अर्पण अपना निजी कोई रणनीती नहीं बस जो हो राम रणनीती – वीरबंधू नल-नील महा पराक्रमी थे वास्तु निर्माण के ज्ञाता थे, जब अपना पराक्रम दिखने का समय आया दोनों वीरबंधू लग गये समुद्र पर सेतु निर्माण करने। समुद्र पर सेतु बनाने से ही विराट वीर वानर सेना समुद्र पार कर लंका पहुच सकती थी समुद्र पर सेतु निर्माण का महाकार्य कीया वीरबंधू नल-नील ने किंतु अपना यह महाकार्य अर्पण कीया श्रीरामचंद्र को धन्य है वीरबंधू नल-नील का धर्म समर्पण। आज भी वीरबंधू नल-नील द्वारा निर्मित समुद्रसेतु रामसेतु के नाम से जाना जाता है वीरबंधू नल-नील सभी सनातन वीरो के प्रेरणाश्रोत है धर्मकार्य करना प्रथम कर्तव्य है धर्म के लीये जो भी करो वह धर्म को समर्पीत करो। “मै” भूल जाओ धर्मआज्ञा को समर्पीत हो जाओ जैसे वीरबंधू नल-नील समुद्र सेतु निर्माण का अपना महापराक्रम श्रीरामचंद्र को समर्पीत कर अजर अमर हो गए सभी सनातन वीरो को रामराज्य के स्थापना में अपना अपना पराक्रम दिखा श्रीरामचंद्र को समर्पीत होना है।


अडग एकल वीरअंगद–

     अडग एकल वीर अंगद महाबली बाली के पुत्र थे अडग एकलवीर अंगद सौम्य शांत से अपने में विराटता समेटे हुए अडग मनोबल के स्वामी थे। जहा वीर अंगद डट जाय वहा से वीर अंगद को पीछेहठ करवाना असंभव था, रावण की भरी राज्यसभा में वीरअंगद रामनाम के लीये धर्म के लीये डट गए रावण समेत रावण के बड़े बड़े सुरमा भी वीरअंगद को पीछेहठ नहीं करवा पाए थे। वीर अंगद ने अपने अडग मक्कम मनोबल का परीचय देते हुए रावण समेत पूरी रावण सेना के रद्य में वानरवीरो का भय पैदा कर धर्मयुध्ध पहले ही आधा युध्ध जीत लीया था। अडग एकलवीर अंगद से सभी सनातन वीरो को प्रेरणा मील   ती है की धर्म के प्रती अडगता एवं धर्मयुध्ध में मकक ममनोबल ही विरोधी ओ के युध्धउन्माद को तोड़कर उनके रद्य में भय पैदा कर कर देता है। श्रीरामचंद्र ने वीर अंगद के पिता महाबली बाली का वध कीया था फिर भी वीरअंगद ने धर्म के लीये मातृभूमी के लीये अपने पिता का वध करने वाले श्रीरामचंद्र का साथ देना ज्यादा उचीत समजा था। वीरअंगद से प्रेरणा ले सनातन धर्म के लीये संधर्ष रत सभी सनातन वीरो को अपना नीजी विरोध अहं को भूल कर धर्मके लीये एकात्म हो एक हो अडगता से विरोधी असुरी शक्ति ओ से डट जाना है, पीछेहठ का प्रश्न ही नहीं निरंतर आगे बढ़ भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना करना है।


रिंछराज महाज्ञानी जामवंतजी–

     रिंछराज जामवंत जी महाज्ञानी थे उचित समय पर क्या रणनीती होनी चाहीए यह जमवंतजी से जायदा कौन जान सकता है? रणभूमी में समय समय पर जामवंतजी के सलाह सुचन एवं रणनीती से ही धर्मयुध्ध में विजय आसन हुवा था। धर्मयुध्ध में लड़ रहे वीरयोध्धा ओ में धर्मज्ञान से शोर्यगाथा ओ से आत्मगौरव जगा युध्ध में प्रराक्रम दिखाने को उत्साहित करने का महाकार्य जामवंतजी ने संभाल रखा था। जब लक्ष्मणजी रणभूमी में मेघनाद के नागपाश से मूर्छित हो गये थे तब जामवंतजी ही थे जो रामचंद्र को सांत्वना दे वैद राज को ले आय थे एवं हिमालय संजीवनी बुट्टी लेने महावीर हनुमानजी को वायुमार्ग से भेजे थे। सीतामाता को खोजते हुए जब वीर वानर सेना सहित महाबली हनुमानजी एवं महाज्ञानी जामवंतजी समुद्र कीनारे पहुंचे आगे का मार्ग न मीलने पर महावीर हनुमानजी सहित वीर वानर सेना हताश एवं दुखी हो गई थी। तब अपना भव्य गौरव मय भूतकाल याद करा महावीर हनुमानजी में सोया आत्मगौरव जगा रामकाज को पराक्रम दिखाने को उत्साहीत करने वाले जामवंतजी ही थे। महाज्ञानी जामवंतजी ने सोये हुए हनुमानजी को भव्य गौरव मय भूतकाल याद करा धर्मज्ञान दे हनुमानजी का आत्मगौरव जागृत कर हनुमानजी से समुद्र लाघंने का महा पराक्रम करवा दिया। भारतवर्ष को आज एक नहीं हजारो महाज्ञानी जामवंतजी की जरुरत है,, जो अपने धर्मज्ञान से सोये हुए सौ करोड़ सनातनी ओ को अपना भव्य गौरवमय भूतकाल याद करा सच्चा सनातन शाक्य धर्मज्ञान दे भारतवर्ष के सौ करोड़ सनातनी ओ का आत्मगौरव जागृत कर धर्मकार्य में प्रवृत कर भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना में निमित्त बने।


भात्रु आज्ञाकारी लक्ष्मण-भरत-सत्रुज्ञ

     भात्रु आज्ञाकारी लक्ष्मण-भरत-सत्रुज्ञ श्रीरामचंद्र के छोटे अनुज थे। लक्ष्मणजी हमेसा अपने बड़े भाई श्रीरामचंद्र के साथसाथ रह धर्मकार्य में सहयोगी बने धर्मकार्य को प्राथमिकता दे लक्ष्मण अपनी प्रिय पत्नी से दूर रहे थे। लक्ष्मणजी से सभी सनातन धर्मीओ को प्रेरणा लेनी चाहीए की धर्म के लीये धर्मसंस्कार के लीये अपने प्रियपात्र से दूर रहना पड़े तो रहो किंतु धर्म रक्षक बनो अपने भाड़ेभाई का मान सम्मान राखो।

     भरतजी ने धर्म का आचरण करते हुए रामकाज को अयोध्धा का राजसिंहासन का त्याग कर अपने बड़े भाई श्रीरामचंद्र के चरण पादुका को राजसिंहासन पर राख श्रीरामचंद्र के आदेश अनुसार शत्रुज्ञ की सहायता से अयोध्धा का राजकाज संभाला था। हम सब सनातन धर्मीओ को भरतजी एवं शत्रुज्ञजी से प्रेरणाले श्रीरामायण नव सूत्र के दिव्य सनातन धर्म आदेश को सर्वोपरी मान रामराज्य की स्थापना में अपना योगदान देना है। भरतजी ने बड़े से बड़े लालच को ठोकर मार अपने धर्म कर्तव्य को प्राथमीकता दे रामकाज कीया हमें भी भरतजी के सामान धर्म को समर्पीत हो बड़े से बड़े लालच को ठोकर मार भारत वर्ष में रामराज्य की स्थापना में तन-मन-धन से समर्पीत होना है।


महावीर महाज्ञानी रामभक्त शिरोमणी श्री हनुमानजी।



जय हनुमान ज्ञानगुण सागर। जय कपि: तीनोलोक उजागर।।

रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनी पुत्र पवन सूत नामा ।।


    महावीर श्री हनुमानजी के विषय में जितना लिखे उतना कम है, सनातन धर्म को धारण करने वाले धर्म योध्धा ओ के लीये महावीर हनुमान जी प्रात वन्दनीय परम शक्ति है। महाबली श्री हनुमानजी के नाम मात्र के स्मरण से ही वीरत्व का भाव जागृत होता है रोम-रोम में रामकाज की लगन लग जाती है। महाबली हनुमानजी से ज्ञान समर्पण एव धैर्य, साहस का गुण सनातन सभी वीरो को आत्मसात करना चाहीए – 


ज्ञान समर्पण :- ज्ञान से ही आत्मगौरव जागृत होता है जिसका आत्मगौरव जागृत है वह कभी कीसी के प्रभाव में नहीं आता ज्ञानी को डर एवं लालच पथभ्रष्ट नहीं कर सकते है। महाज्ञानी महाबली श्री हनुमानजी को न सुवर्ण से बना मैनार्कपर्वत ललचा पाया ना संकीनी राक्षसी का प्रचंड रूप डरा पाया वीरहनुमान जी अपने रामकाज को समर्पीत रहे। महावीर हनुमानजी से प्रेरणा ले हम सनातनधर्मी अपने सनातनधर्म के पूर्ण ज्ञाता बन रामकाज को समर्पीत हो डर लालच से ऊपर उठ भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना में सहभागी बने।


धैर्य साहस :- धैर्य साहस से ही एक सामान्य मनुष्य भी असंभव कार्य को भी संभव कर सकता है। महाबली हनुमानजी अपने धैर्य साहस के गुण से ही धर्म के लीये श्रीरामचंद्र एवं वानरराज सुग्रीवजी की मित्रता करवाई थी, समुद्र पारकर  सर्व संकटो का सामना कर लंका प्रवेश कर गये, लंका में घूम फिर विभिषणजी को अपने पक्ष में कर लीया, अशोक वाटिका में पहुच माँसीता को श्रीरामचंद्र का संदेश पहुचाया, अशोक वाटिका में हुडदंग मचा लंका में आग लगा लंकाको भाष्मिभुत कर सर्व असुरो के मन में अपने एवं वानरसेना के बारे में भ्रम और भय पैदा कीया, संजीवनी बुट्टी लेने गये हनुमानजी लक्ष्मणजी के साथ पूरी वीर वानर सेना की सुरक्षा एवं दीर्धायु के लीये संजीवनी बुट्टी का पूरा पर्वत उठा लाय, हनुमानजी एक से एक पराक्रम करके भी विनम्रसे श्रीरामचंद्र को समर्पीत बने रहे। महाबली हनुमानजी से प्रेरणाले सर्व सनातन धर्मीओ को धर्म के लीये आपसी विवादों को सक्रियता से सुलाजना चाहीए, असुरो के भीतर घुस कर उनको एक एक कर अपने प्रभाव में लाना चाहीए, अपने धर्म समर्पण एवं धर्मकर्म से असुरो के मन में अपने लीये भ्रम एवं भय पैदा करना चाहीए, सभी सनातन धर्मबंधू ओ  का हित देख सनातन धर्मज्ञान की जड़ीबुट्टी से सभी सनातनवीरो को धर्मयुध्ध को समर्थ एवं ससक्त रखना चाहीए। महावीर हनुमानजी से आशीर्वाद एवं प्रेरणा ले हम सनातन धर्मी रामकाज को सदा आतुर रह समय समय पर निरंतर धर्म के लीये अपना पराक्रम दिखाते रहे एवं डर लालच से दूर रह रामराज्य की स्थापना का कार्य करते रहे।


धर्मप्रिय नन्ही गिलहरी।

धर्मप्रिय नन्ही गिलहरी जो अपने रामकाज के नन्हे सहयोग से श्रीरामचंद्र की प्रीती पात्र बन अजर अमर हो गई। रामकाज बड़ा विराट था बड़े बड़े वीर अपना सहयोग दे रहे थे तो नन्ही गिलहरी के मन आया मै भी अपना थोडा सहयोग दे राम के काम आ जाऊ मेरा भी उद्धार हो जाय। जब एक नन्ही गिलहरी को अपने धर्म कर्तव्य का ज्ञान है तो हम सनातन धर्मी क्यों पीछे रहे हमें भी धर्मकार्य में रामकाज में बढ़चढ़ कर आगे आना चाहीए। जब एक नन्ही गिलहरी अपने से थोडा सहयोग दे श्रीरामचंद्र की दुलारी बन सकती है तो हम सनातन धर्मीओ को रामराज्य की स्थापना के महाकार्य में तन मन धन से अपने से जो हो सके वह सहयोग करे।


धर्मयुध्ध से तन की शुध्धी होती है।

धर्मज्ञान से मन की शुध्धी होती है।

धर्मदान से धन की शुध्धी होती है|


विराट वीर वानरसेना।

      एक सूत्रता रामनाम से बंधी वीर वानर सेना विराट थी वीर वानर सेना के बिना रामराज्य की स्थापना असंभव कार्य था। वीर वानर सेना के एक एक वानर सैनिक का योगदान अमूल्य था, एक एक वानर वीर आपस में मील रामनाम के बंधन में बांध एक विराट शक्ति बन गये थे। एक अकेला वानर की शक्ति मर्यादीत होती है किंतु आपस में एक सूत्रता में रामनाम के बंधनमें बंधे समस्त वानर वीरो की शक्ति प्रचंड सैन्य शक्ति में बदल गई थी। वीर वानर सेना से प्रेरणा ले हम सनातन वीरो को अपनी अपनी अलग अलग रणनीती को त्याग कर रामनाम की श्रीरामायण की रणनीती के बंधनमें बांध कर प्रचंड सनातन शक्ति के रूप में उभरना होगा, सनातन वीर रामनाम के सूत्र में बंधकर अपने समूह सामर्थय से भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना कर निकट भविष्य में ही भारतवर्ष को विश्वगुरु का सम्मान दिला समस्त विश्व में सनातन धर्मध्वजा का विजय परचम लहराने में निमित्त बन भारतवर्ष मातृभूमी का रुण चुकाने का पुण्य प्राप्त करना चाहीए।


८।  सुर-असुर का स्वभाव भेद समजाते – श्रीरामचंद्र।

      सभ्यता से शांती पूर्वक अपना जीवन जीते सभी मनुष्य को, धर्म संस्कारो को, मातृभूमी के रामराज्य के बंधारण को आसुरी वृती वाले असुरो से एवं असुर समुदाय से हमेशा संकट होता है।  धर्म पर संकटहो वह सर्व असभ्य आसुरी वृति वाले असुर या उनके समूह को श्रीरामचंद्र ने कभी भी क्षमा नहीं कीया था । धर्मस्थापना के लीए, सभ्यता के लीए श्रीरामचंद्र ने आसुरी साम्राज्य पर आक्रमण कर सर्व असुरो का सर्वनाष कीया है। श्रीरामचंद्र की व्याख्या में मातृभूमी पर आसुरी असभ्यता के आक्रमण का संकट मंडराता हो तब आगे बढ़ आसुरी असभ्यता के मूलश्रोत पर ही आक्रमण कर सर्व असुरो का सर्वनाश करना ही धर्म है। श्रीरामचंद्र के जीवन कर्म अनुसार धर्म संस्कार पर घात करने वाले असभ्य आसुरीवृती वाले असुर एवं आसुरी समुदाय को क्षमा देना बहुत बड़ा पाप है। भारतवर्ष पर आक्रमण कर भारतमाता का आँचल रक्तरंजीत करने वाले आसुरी समुदाय को बारबार क्षमादान दे भारतवर्ष के एक समर्थ राजा भी भूलकर बैठे थे। आसुरी समुदाय को क्षमादान के पाप से ही भारतवर्ष के बहुमत सनातनधर्मी अपनी आधी मातृभूमी गवाकर बाकी बची अपनी मातृभूमी पर भी लाचार से बस अपने कर्मो को दोष देते सनातनधर्म संस्कार के लीये चिंतित है।


     श्रीरामचंद्र की धर्म व्याख्या स्पष्ट है — जो मनुष्य या उसका समुदाय असभ्य और आसुरी वृती वाले हो, जो सभ्य समाज के धर्मकार्य में बाधा उत्पन्न करते हो ,जो सभ्य समाज को अपने आसुरी संस्कारो से निरंतर प्रताड़ित करते हो, जो सभ्य समाज की स्त्रियों का शीलभंग करते हो वह सर्व असुर है। ऐसे असभ्य असुर एवं आसुरीवृती वाले असभ्य मनुष्य समूह को शरण देने वाले कोई भी मनुष्य या आसुरी विचारधारा वाले मनुष्य समूह का सर्वनाश करना वही धर्म है। सभ्यता और असभ्यता कभी भी साथ साथ रह नहीं सकते, देव और दानव कभी भी एक नहीं हो सकते जीस मे देवत्व है वह हमेशा दानव पर भरोषा करता है किंतु दानव हमेशा उसके स्वभावगत लक्षण से देवत्व के नाष के लीये ही तत्पर होता है। श्रीरामचंद्र अपने विचार में स्पष्ट है श्रीरामचंद्र ने सभ्यता, धर्म की रक्षा के लीये कभी भी कोई समजोता नहीं कीया था। धर्मसंस्कार के लीये हर अड़चन का सामना कर, मुसीबत यातना सहन कर कठोर संघर्ष कर आक्रमणकारी बन पापकर्म करके भी अधर्म एवं असभ्यता का सर्वनाश कीया है।


     हम सब सनातन धर्म में आस्था रखने वाले धार्मीक मनुष्यों को श्रीरामचंद्र से बोध लेना चाहीए की जो आसुरी समुदाय सभ्य सनातन धर्मसमाज को अपना दुश्मन मानता हो, जो असुरी समुदाय सभ्य सनातन धर्मसमाज के धर्मकार्य को हीन भावना से देखता हो, जो आसुरी समुदाय निरंतर सभ्य सनातन धर्मसमाज के धर्म कार्य में बाधा उत्पन्न करता हो, जो आसुरी समुदाय सभ्य सनातन धर्मसमाज के धार्मीक स्थलों को खंडित करता हो ऐसे असुरी असभ्य समुदाय के साथ कभी भी सभ्य सनातन धर्मसमाज को मित्रता नहीं करनी चाहीए। जो आसुरी समुदाय हरक्षण यदी सभ्य सनातन धर्मसमाज के धार्मीक मनुष्यों को अपना शत्रु समज कर उनको हानि पहोचाने को निरंतर प्रयास रत हो। जो आसुरी असभ्य समुदाय सभ्य सनातन धर्मसमाज के विरुद्ध द्वेश भाव से निरंतर कावादावा करते हो। एसे सभ्य सनातन धर्मसमाज के घोरविरोधी सत्रु असभ्य आसुरी समुदाय से कीसी भी प्रकार के सामाजीक आर्थिक सबंध रखना मुर्खता है, इस मुर्खता की सजा आसुरी समुदाय से प्रताड़ना सहन कर या अपनी मातृभूमी गवाकर चुकानी पड़ती है।


श्रीरामचंद्र के जीवन आदर्श अपने जीवन मे उतार धर्मकर्म अनुसार जीवन जीने से रामराज्य स्थापीत होगा श्रीरामचंद्र के जयकारे लगा श्रीरामचंद्र के जीवनचरीत्र विपरीत कर्म आचरण कर सनातनधर्मी अपना एवं अपने धर्मसंस्कार का ही सर्वनाश करेगा भारतवर्ष के सनातनधर्मी श्रीरामचंद्र को आराध्य पूज्य मान श्रीरामचंद्र के जीवनचरीत्र से दुलक्ष्य रखेगा तो भारतवर्ष से सभ्यता और सनातन धर्म नामशेष होने में देर नहीं लगेगी। श्रीरामचंद्र के जीवनचरीत्र आदर्श अनुसार जो सभ्य सनातन धर्म समाज एकता से धर्म संगत कर्म करेगा तो अवश्य भारतवर्ष में श्रीरामराज्य की स्थापना होगी।


९। एक आक्रमणकारी कूटनीतज्ञ राजनैतिक – श्रीरामचंद्र।

     श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र से स्पष्ट होता है की श्रीरामचंद्र धर्मपालक आक्रमणकारी कूटनीतज्ञ राजनैतिक महामानव थे। श्रीरामचंद्र ने अपने जीवन ध्येय रामराज्य की स्थापना हेतु आसुरी समुदाय पर आक्रमण कर आगे बढ़ते बढ़ते ऐसे कीतने ही धर्मउत्थान के कार्य कीये जो एक प्रखर कूटनीतज्ञ एवं बहूत धैर्यवान महामानव ही कर सकता है।


      श्रीरामचंद्र अपने धर्म समर्पण संस्कार से अपने मातापिता एवं गुरुजनों के प्रियपात्र हुए। श्रीरामचंद्र अपने मर्यादापूर्ण सरल स्वभाव से विवेकशील वर्तन कर अपने राज्य के लोगो के प्रियपात्र बने। श्रीरामचंद्र अपने भाइयो से प्रमाणीक व्यवहार राख सामाजीक कर्तव्य  निभा अपने बड़े भाई का हर कर्तव्य निभा अपने छोटे भाईओ का प्रेम जीतकर भात्रुप्रेमी बने। श्रीरामचंद्र ने अपना हर वचन निभा अपने अड़ग व्यक्तित्व का परिचय देते हुए अपने निकट के सभी लोगो के रद्य में अपने लीये एक अटूट विश्वाश उत्पन कीया। श्रीरामचंद्र अपने कुल से निम्नकुलीन निषादराज को अपने परममित्र का उच्च दरज्जा दे, आदीवासी शबरीमाता के जूठे बेर खा समस्त वनवासी समुदाय के प्रियपात्र बने। श्रीरामचंद्र ने शिवधनुष तोड़कर भारतवर्ष के समस्त राजा-महाराजा ओ में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करी, वन में ताड़का, मारीच-सुबाहू जैसे दुष्ट असुर राक्षसों का वध कर असभ्य असुर समुदाय में अपना भय पैदा कर रामराज्य की स्थापना के अपने महाकार्य की शुभ शरुआत की। श्रीरामचंद्र ने कीष्किन्धा नरेश वानरराज सुग्रीवजी के साथ संधि कर उन्हें अपना मित्र बनाकर समग्र वानर जाती को अपने आधीन कीया। श्रीरामचंद्र ने वीर हनुमानजी को खास अपने निकट के विश्वाश पात्र सहयोगी के स्वरुप में स्थान दे अपने निकट के अंगत लोगो का संख्याबल बढाया। श्रीरामचंद्र ने सर्व प्रथम केसरियावीर श्री जटायुजी को उनकी वीरगती पर योग्य मान सम्मान दे श्रीजटायूजी को अपने हाथो अग्नि संस्कार कर के वो समस्त वीर योध्धा जो श्रीरामचंद्र के समर्थक थे उन सब धर्मयोध्धा ओ का विश्वास जीता। श्रीरामचंद्र ने हनुमानजी को लंका भेज कर लंका में उत्पात मचा, लंका में आग लगाकर जलाकर सर्व असुर और रावण में भी श्रीरामचंद्र एवं वानरसेना के लीये भ्रम और भय पैदा कीया। श्रीरामचंद्र ने हनुमानजी द्वारा रावण के अंगत लोगो में फुट डलवा कर विभीषण को अपने पक्ष में कर युद्ध पहले ही आधा युध्ध जीत लीया। श्रीरामचंद्र ने युध्ध से पहले ही विभीषण को लंकाका राजा घोषित करके अपने आत्मविश्वास का परिचय दे दुश्मन रावण को हताष कर लंका के धार्मीक जन समुदाय का विस्वास जीत लीया। श्रीरामने युध्ध से पहले आखरी समाधान के लीये अंगद को भेज रावण की सभा में अपना डर पैदा कर रावण के योध्धाओ का आत्मविश्वाश तोड़ अपनी वानरसेना का मनोबल बढाया। श्रीरामने अपने सभी धर्मयोद्धाओ में पूर्ण विश्वास रख रणसंग्राम में महत्व की कर्तव्य  दे युध्ध लड़ने भेजा, जब धर्मयोद्धा को युध्ध में पीछेहट का सामना करना पड़े तब वह योध्धा की मदत को स्वयं श्रीरामचंद्र आगे आ उस धर्मयोध्धा को विजय दिलाने में महत्व की भूमिका निभाई। श्रीरामचंद्र अयोध्या वापस आ राज्यगादी संभाली तब अपने सभी मित्रगण एवं अपने राज्य के सभी पडोशी राजा-महाराजा को मान-सम्मान दे अपने राज्य से संबंध सुद्रढ़ करे।


     श्रीरामचंद्र ने अश्वमेघ यज्ञ करके समग्र भारतवर्ष में अपनी सर्वश्रेष्ठता साबित करके पूर्ण रामराज्य की स्थापना की। श्रीरामचंद्र ने अपने जीवन काल में कभी कीसी उदंड असभ्य असुर को क्षमा नहीं दी, समस्त असुर समुदाय पर आक्रमण कर उनका सर्वनाष कर रामराज्य की स्थापना की।


     श्रीरामचंद्र ने धर्मसंस्कार की स्थापना के लीये मातृभूमी के रुण के लीये आक्रमणकी रणनीती अपनाइ थी, स्पष्ट है रक्षारणनीती का हमेशा पराभव होता है आक्रामण रणनीती का ही विजय होता है। धर्मस्थापना के लीये श्रीरामचंद्र आक्रमण रणनीती पर थे और आसुरी समुदाय एवं रावण अपने अस्तित्व के लीये बचाव में रक्षारणनीती पर थे। विजय श्रीरामचंद्र की आक्रमण रणनीती का हुआ है और पराजय रावण की रक्षारणनीती का हुवा है रक्षारणनीती हमेसा घुटने टेक देती है आक्रमण रणनीती ही अपना विजय ध्वज लहराती है।


     श्री सनातन धर्म में विश्वास करने वाले भारतवर्ष के सभी सनातन धर्मी श्रीराम चरीत्र को अपने  जीवन में उतारे श्रीरामचंद्र के जीवन के एक एक छोटे से छोटे प्रसंग का मर्म जान ले तो सनातनधर्म का विजयध्वज दसो दिशाओ में लहराय भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना हो जाय। आज अयोध्या में सनातन धर्मीओ के आराध्य श्री रामचंद्र का मंदिर खंडित है उसका एक मात्र कारण यही है की भारतवर्ष के सभी सनातनधर्मी श्रीरामचंद्र के जीवन आदर्श को भूल गए है और केवल श्रीरामचंद्र के जयकारे लगा उन की पूजाप्राथना करते है। यह तो ऐसी बात है की भारतवर्ष के सनातनधर्मी ओ ने श्रीरामचंद्र को अपना आराध्य माना हो किंतु अपने कर्मो से श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र की एक भी बात का अपने जीवन में पालन न कर श्रीरामचंद्र का अपमान करना। श्रीरामायण  श्रीरामचंद्र के जीवन चरीत्र के अनुसार मानव सभ्यता के शिखर मापदंड स्वरुप धर्म नियमो का निरूपण है। श्रीरामायण के मर्म स्वरुप श्रीरामचंद्र के नव सूत्र के अनुसार भारतवर्ष के सनातन धर्मसमुदाय का जीवन धोरण और समाज व्यवस्था होती तो क्या आज अयोध्या में श्रीरामचंद्र का मंदिर खंडित होता? क्या आज सनातन धर्म खंड-खंड होकर विखंडित होता? आज जो तकलीफ यातना दुःख दासता भारतवर्ष के सनातन धर्मीयो को सहन करनी पड़ती है वह कभी भी सहन करनी पड़ती?


     श्रीरामचंद्र को आदर्श मानकर भारतवर्ष के सनातन धर्मी अपना धर्म अनुसार जीवन जीते होते तो आज भारतवर्ष का आधिपत्य पूरा विश्व स्वीकारता होता। भारतवर्ष के सनातन धर्मीओ का विश्व में सभी जगह राज्य होता। सनातन धर्मी समुदाय स्वर्ग जैसा सुख प्राप्त करते होते किंतु श्रीरामचंद्र के आदर्श भूले हुए सनातन धर्मी आज धर्मनाम विवीध पंथसम्प्रदायो के प्रभाव मे एक पंगु और मिथ्या वैराग्यक विचारधारा के वाहक बनकर सभी जगह अपमान और दुःख प्राप्त कर रहे है। अभी भी देर नहीं हुई अभी भी समय है भारत वर्ष के सनातन धर्मी श्री रामायण को अपना सनातन धर्मसविधान स्वीकार कर श्रीरामचंद्र के नवसूत्र को आज से ही अपने जीवन में उतार सनातन धर्म अनुसार जीवन जीवनी बना ले तो निकट भविष्य में ही भारतवर्ष विश्वगुरु का स्थान प्राप्त कर लेगा।


     श्रीरामचंद्र ने सनातनधर्म अनुसार सक्य मत का अनुसरण करते हुए रावण का वध करने ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के शक्तिपीठ पर पूजा आर्चना कर शक्तिबाण प्राप्त कीया था उसी शक्ति बाण से रावण का वध हुवा था। श्रीरामचंद्र ने संकट समय शक्यमत सनातन अनुसार शिवलींग की स्थापना कर समस्त आसुरी समुदाय का सर्वनाश कर अपने रामराज्य स्थापना के संकल्प को प्रबल कीया था। श्रीरामचंद्र ने पुन अयोध्या आ राजगादी पर बिराजमान होने से पहले शक्यामत सनातन धर्म अनुसार ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के त्रिगुणी शक्ति स्वरुप माँ वैष्णवी की त्रिदिवसीय पूजा की थी। श्रीरामचंद्र ने अपने रामराज्य की प्रजा के सर्वांग सुखाकारी के लीये माँ वैष्णवी की शक्ति पूजा कर राजगादी संभाली इस पावन अवसर की याद में आज भी भारतवर्ष में सनातनधर्म समुदाय प्रकाश पर्व दीपावली का त्यौहार बड़े उत्साह उमंग से मानते है।


    श्री रामचंद्र ने त्रिगुणी शक्ति माँ वैष्णवी की त्रिदिवसीय पूजा के प्रथम दिन ज्ञान विध्या संस्कार की अधिस्ठाता देवी श्री विध्या विणा ब्रह्माणि माँ महासरस्वती का पूजन कर अपने राज्य की प्रजा के लीये – विध्या, ज्ञान, संस्कार, कला, संगीत, नृत्य, संप, अनुसासन, वाणी , विवेक , सदमती के लीये आशीर्वाद लीया था। आज हम सनातनधर्मी प्रकाश पर्व दीपावली के इस प्रथम दिन के पर्व विध्या विणा बारस को अपभ्रष स्वरुप से वाघबारस के नाम से जानते है।


     श्रीरामचंद्र ने त्रिगुणी शक्ति माँ वैष्णवी की त्रिदिवसीय पूजा के द्वितीय दिन धन धान्य सुख समृध्धि कर्मफल की अधिस्ठाता देवी श्री वैभव कामिनी माँ महालक्षमी का पूजन कर अपने राज्य की प्रजा के लीये महेनत –कर्म –कर्मफल व्यापर -धन –धान्य –सुख समृध्धि के लीये आशीर्वाद लीया था। आज हम सनातनधर्मी प्रकाश पर्व दिपवाली के इस द्वितीय दिन वैभव कामिनी तेरस को अपभ्रष स्वरुप से धनतेरस के नाम से जानते है।


श्रीरामचंद्र ने त्रिगुणी शक्ति माँ वैष्णवी की त्रिदिवसीय पूजा के तृतीय दिन आक्रामक क्रोधाग्नि की अधिस्ठाता देवी श्री कालरूद्राणी माँ महाकाली का पूजन कर अपने राज्य की प्रजा के लीये शोर्य –पराक्रम –आक्रामकता –विजय –के लीये आशीर्वाद माँगा था। श्री कालरूद्राणी माँ महाकाली ने श्रीरामचंद्र से अपना आशीर्वाद प्राप करने रक्त की मांग करते हुए आकाशवाणी द्वारा कहा था की ,,, हे राजारामचंद्र तुम अपने रामराज्य को अनंत काल तक स्थाई रखना चाहते हो तो मुझे निरंतर रक्त का चढ़ावा मीलना चाहीए। श्रीरामचंद्र ने माँ महाकाली से याचना की ,,, हे कालरूद्राणी देवी महामाया यह कैसे संभव है ? सुसंस्कृत सनातन धर्मसमुदाय रक्त का चढावा कैसे कर पाएगा ? तब पुनह आकाशवाणी हुई ,,, हे राजा रामचंद्र तुम्हारे रामराज्य के सनातन धर्मी समुदाय के लोग देवी माँ महासरस्वती की अनुकंपा से -विध्या, ज्ञान, संस्कार, कला, संगीत, नृत्य, संप, अनुसासन, वाणी, विवेक , सदमती प्राप्त कर लेंगे। देवी माँ महालक्षमी की अनुकंपा से -महेनत – कर्म –कर्मफल –व्यपार -धन –धान्य – सुख समृध्धि प्राप्त कर लेंगे। किंतु हे राजारामचंद्र तुम्हारे रामराज्य के सुसंस्कृत सनातन धर्म समुदाय देवी माँ महाकाली को प्रसन्न नहीं करेंगे तो- शोर्य –पराक्रम –आक्रामकता –विजय – का क्या होगा? शोर्य –पराक्रम –आक्रामकता –विजय – के बिना रामराज्य कीतना समय तक सुरक्षीत रह सकेगा ? जब सुसंस्कृत सनातन धर्म समुदाय कभी रक्त देखेगा ही नहीं तो भविष्य में जब आसुरी शक्तिया प्रबल होगी तब –सुसंस्कृत सनातन धर्मी रक्त देखने मात्र से डर जायेगे और आसुरी शक्ति का सामना नहीं कर पाएगे। यदी सुसंस्कृत सनातन धर्म समुदाय के लोग देवी माँ महाकाली को बली द्वारा रक्त का चढ़ावा चढ़ा प्रसन्न कर शोर्य –पराक्रम –आक्रामकता –विजय – का आशीर्वाद प्राप करेंगे तो ही आसुरी असभ्य समुदाय का सर्वनाश कर अपने रामराज्य को चिरकाल स्थाई राख पाएँगे। आज हम सनातनधर्मी प्रकाश पर्व दिपवाली के इस तृतीय दिन कालरूद्राणी चौदस को अपभ्रष स्वरुप से कालीचौदस के नाम से जानते है। श्रीरामचंद्र ने ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का कृतग्य भाव से पूजन कर आशीर्वाद ले अयोध्या की राजगादी संभाली इस रामराज्य की स्थापना के उपलक्ष रामराज्य की प्रजा ने घरघर में दीप जले थे एवं मिठाईया बनी थी। आज भी भारतवर्ष में हम सनातन धर्म के लोग हर वर्ष रामराज्य के स्थपना की याद में हरवर्ष प्रकाशपर्व दीपावली का त्यौहार मनाते है, नए वस्त्र परिधान कर घरघर दीप प्रगट कर, मिठाई बाँट खुशिया मनाते हे।


      श्री रामराज्य स्थापना का दीपावली पर्व ही हम सनातनधर्मी ओ का मुख्य धर्म उत्सव है यही हमारी सनातनधर्म धरोहर है।