प्रस्तावना

।। श्री एकात्म सत्य ।।

।। श्री सत्य सनातन धर्म की जय ।।

     वैश्विक परिपेक्ष में प्रकृति के विविध रंग है, कही बर्फीले साइबेरीयन मैदान है तो कही विशुवृत्रिय वर्षावनों का साम्राज्य है, कही अरब एवं सहारा के महा मरुस्थल है तो कही हिमालय एवं एंडिज़ की गगनचुंबी पर्वत सृखलाए है। कही यूरोप के हरे भरे मैदान है तो कही ऑस्ट्रेलिया के सुखे मैदान है, कही भारतवर्ष के मोसमी आबोहवा का प्रदेश है तो कही वर्षभर एक सामान आबोहवा के शुष्क प्रदेश है। सात भूखंड सातो भूखंडो की विविध प्रकृतीक आबोहवा और उस प्रकृतीक आबोहवा के अनुरूप विकशीत विविध मनुष्य सभ्यता है। सभी मानव सभ्यता ओ की विविध मान्यताए, धार्मीक पंथ-संप्रदाय, भाषा, खानपान, वस्त्र-परिधान रहन-सहन एवं आचार-विचार सब अलग अलग है। विश्व में जो भूभाग की जैसी प्रकृतीक आबोहवा है उस आनुरूप वहा बसते मनुष्य समूहों का रहन सहन, नीती नियम, धार्मीक विचारधाराए हो। जीससे वह पुर्ण मानव सभ्यता का स्वरुप ले वही विश्वमें फैला सर्व व्यापक सनातन सत्य है। आदी काल से मनुष्य सभ्यता के विकाश से निरंतर परीवर्तीत होते मानव मूल्य ही सत्य सनातन धर्म है। विश्व के परिपेक्ष में विविध भूभाग पर प्रकृति के अनुकूल जो मानव सभ्यता के अलग अलग रंगबीरंगी रंग है वही समस्त विश्व में फैला सर्वव्यापक सत्य सनातन धर्म है। इन सभी मानव सभ्यता ओ का जो मनुष्य समूह आदर करे एवं अपनी धर्म सभ्यता पर गर्व कर कृतज्ञ बन सामुहीक नितीमत्ता से कर्मशील बन सुख समृध्धि के शिखर पर पहुच समस्त विश्व का मार्गदर्शन करे वही सच्ची सनातन धर्म सभ्यता है।

 

     मानव सभ्यता के क्रमीक विकाश पथ पर मनुष्य ने कई उतार चढाव देखे है कीतनी ही मानव सभ्यता का सर्जन एवं विनाष हुवा है। इतहास कहता है जब भी मानव सभ्यता का विकाश एवं विनाष हुवा है उस मे विविध पंथ साप्रदायीक धर्म मान्यताए प्रमुख कारण रहा है। विश्व के मानव सभ्यता इतहास में कई तत्वचिंतक महापुरुष हुए जिन्होंने धर्म नाम कई अलग-अलग पंथ साप्रदायीक विचारधाराओ को जन्म दिया है। इन में सकारात्मक धर्म विचारधाराओ से समृध्ध मानव सभ्यता ओ का सर्जन हुवा है। तो दुसरी और नकारात्मक पंथ साप्रदायीक विचारधाराओ से समृध्ध मानव सभ्यताए भी धर्म नाम धर्मज़नुनी हिंसक मनोविकृती का शिकार बन मानव सभ्यता पर ही संकट बन गयी है। तो कुछ समृध्ध मानव सभ्यता धर्म के नाम पंथ साप्रदायीक विचारधाराओ से वैराग्यक मनोपंगुता का शिकार हो लुप्त हो रही है तो कही नामशेष हो चुकी है।

 

     मूल रूप से भारत मै जो मानव सभ्यता है वह सनातन धर्म सभ्यता है जो हजारो वर्षो के क्रमीक विकाश से आज के स्वरुप में है। भारतवर्ष के पौराणीक काल में कई ज्ञानी ऋषिमुनी हुए जिन्होंने अपने ज्ञान से सकारात्मक धर्म विचारधारा का सर्जन कीया जीसका आधार शाक्यमत है। दैवीशक्ति को सर्वोच्च मान ब्रह्मा-विष्णु-महेश के त्रिदेव सिध्धांत अनुसार मानव मूल्यों को प्राथमिकता दे, प्रकृति तत्व एवं कर्म के विज्ञान को महत्व देता शाक्यमत ही भारतवर्ष के मूलनिवासी ओ का मातृ धर्मसंस्कार है। ऋषिमुनियों के सकारात्मक धर्म विचारधारा द्वारा विकशीत मानव सभ्यता ने ही ब्राह्मी, प्राकृत एवं पूर्ण भाषा संस्कृत का सर्जन कीया है। भारतवर्ष के ज्ञानी महापुरुषों ने दिव्य वेदज्ञान दीया, सनातन मुर्तीपूजा का विज्ञान दीया, आगम-निगम का ज्ञान दीया, आयुर्वेद चिकीत्सा का आविष्कार कीया खगोल– गणित –रसायन –नितीन्याय के विषय में अमूल्य योगदान दिया है। ध्यान आध्यात्म योग का ज्ञान दीया, मानव सभ्यता के शिखर मापदंड श्री रामायण धर्मग्रंथ का सर्जन कीया हमें हमारा प्राचीन श्रीसत्य सनातन धर्म दीया है। जिसे हम शाक्य सनातन धर्म कहते है इस शाक्य सनातन धर्म मान्यता में सर्वोच्च शक्ति है “ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा“ एवं वैदिक धर्म मान्यता में सर्वोच्च शक्ति है “वेदमाता श्री गायत्री“ इस सनातन एवं वैदिक धर्म मान्यता में “र्धर्मज्ञान, धर्मकर्म, धर्मयुध्ध“ का त्रिगुणी सिध्धांत ही सर्वोपरी है।

 

      समय कालचक्र के चलते भारतवर्ष एवं विश्व में कई प्रकृतीक उथलपुथल हुई होगी, कई मानव सभ्यता ओ का स्थलांतर हुवा होगा, कीतनी ही पंथ सम्प्रदायिक विचारधारा ओ का सर्जन एवं विनाष हुवा होगा। भारत के मूलनिवासी सनातन धर्म समुदाय कीतने ही नकारात्मक बर्बर विचारधारा वाले असभ्य समुदाय के सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आक्रमण के शिकार हुए है। भारतवर्ष के मूल निवासी ओ ने पिछले हजार वर्ष सांस्कृतिक राजनैतिक दासता सही फिर भी हम भाग्यशाली है की भारतवर्ष में रुषिमुनीओ द्वारा स्थापीत भव्य सनातन धर्म अपने खंड-खंड स्वरुप में भी अपना अस्तित्व बनाय रखा है। भारतवर्ष का मूल सनातन धर्म बहुत ही गूढ़ एवं विशाल ज्ञान का भंडार है एक मनुष्य जन्म में पूर्ण सनातन धर्म को समजना असंभव है।

 

      प्रकृति के सानिध्य में बने भव्य देवमंदिर, शिवालय –पर्वत पर स्थापीत श्री शक्तिपीठ के दैवीपिंड – मंदिरों में गूंजता सत्य सनातन धर्म का जयकारा –योग ध्यान आधयात्म, वेदज्ञान, पूराण, जैन आगम-निगम, केशरिया धर्मध्वजा- श्री रामायण एवं श्री रामचंद्र का धर्म प्रभाव – भजन-सत्संग, धर्म-उत्सव एवं धर्म शोभायात्राए- ब्राहमणों का संस्कृत श्लोको से पूजापाठ कर्मकांड- साधू- संत- सन्यासी, जैन मुनि- आचार्यो का ज्ञानसत्संग, अद्वैतमत, जैनमत, शैवमत, वैष्णवमत, शाक्यमत के प्रखर भक्त समुदाय का एक सनातन धर्म बंधन यह सब भारतवर्ष का एक औलोकीक आध्यात्मिक सत्य सनातन धर्म है।

 

      भारतवर्ष में सनातन, जैन एवं वैदिक ज्ञान के श्रोत सामान बहुत से धर्मग्रंथ है, बहुत से संत महात्मा मुनी आचार्य –मठ आश्रम –धर्म संस्थाए विविध मतो को आगे रख धर्मज्ञान के प्रचार प्रसार के भागीरथ महाकार्य में लगे हुए है। भारतवर्ष में बहुत से सनातन धर्म हीत संगठन और सनातन धर्म को समर्पित लाखो कर्मशील धर्मयोध्धा सनातन धर्म के उत्थान में लगे हुए है किंतु फिर भी आज सनातन धर्म संस्कार पर नकारात्मक धर्म विचारधारा ओ का संकट है। भारतवर्ष के मूलनिवासी ही अपने मूल धर्म सनातन साक्यमत को नहीं जानते है भारतवर्ष के मूलनिवासी ही अपने मूल धर्म संस्कार के विरोधी है। जो सनातन शाक्यमत हमारे धर्मसंस्कार की रीढ़ है उस शाक्य सनातन धर्म से भारतवर्ष के मूलनिवासीओ को विमुख करने का षड़यंत्र रचा जा रहा है। जीस सनातन साक्यमत में वर्ण व्यवस्था कर्म प्रधान थी वह वर्ण व्यवस्था आज विकृत स्वरुप से जन्म प्रधान हो गयी है हम सब अपने सनातन धर्म संस्कार के लीये चिंतित है। सनातन शाक्यमत आज भारतवर्ष में खंड-खंड हो चूका है इस भव्य सनातन धर्म धरोहर साक्यमत के खंडित स्वरुप को पूर्ण स्वरुप देना हम सब भारतवर्ष के सनातन मूलनिवासीओ का धर्मकर्तव्य है। मेरा प्रयास है “एकात्मसत्य“ में शक्यमत को प्रामाणीकता से न्याय दे सनातन धर्म के इस ज्ञान को पूर्णरूप से उजागर कर भारतवर्ष के मूलनिवासी ओ के आत्म गौरव को जागृत कर भारतवर्ष में रामराज्य स्थापीत करना। मैंने बचपन से जो सनातन धर्म को जाना, समजा, अनुभव कीया वह मेरे मौलीक सनातन धर्म विचार एवं सनातन मूर्तीपूजा विज्ञान के संकलन को “एकात्मसत्य“ में सकारात्मक शाक्यमत के स्वरुप में लीखने का मात्र प्रयास कीया है। “एकात्मसत्य“ में सनातन-वैदिक-जैन एवं अद्वैत-हिंदुत्व की कई ठोस धर्म मान्यता ओ का विवरण नहीं है। किंतु मैंने जो सनातन शक्यामत का धर्मज्ञान भारतवर्ष के मूलनिवासी सनातन धर्म समुदाय में सुलभ नहीं है वही सनातन शाक्यमत के धर्मज्ञान का संकलन करने का प्रयास कीया है।

 

     साथ मे “एकात्मसत्य“ में श्री रामायण के ज्ञान का मेरे अनुभवो से मेरा मौलीक अर्थघट्न है जो मानव सभ्यता में विश्वास करने वाले सनातन धार्मीक लोगो के लीये एक नया गहन आत्मचिंतन का विषय होगा। अंतिम प्रक्रण मे हाइकू श्लोक है ( हाइकू का 5+7+5=17 अक्षर का बंधारण होता है एवं प्रत्येक हाइकू का अपने आप मे एक स्वतंत्र गूढ़ अर्थ होता है। ) धर्म प्रशस्ति मे सनातन धर्म आधारित 155 हाइकू एवं भारत प्रशस्ति मे भारत क़े गौरवमय इतिहास संबधीत 156 हाइकू है। दोनो प्रशस्ति मे 155+156 = 311 हाइकू है। जो सनातन धर्म एव भारत के गौरवमय इतिहास मे रसरुचि रखने वाले धार्मीक एव बौधिक लोगो के लिये गहन ज्ञानगोष्टि का विषय होगा।  

 

     “एकात्मसत्य“ मेरी वर्षो की अघोर तपस्या का फल है जो मुझे अघोर अवस्था के तप के कारण मीला अनमोल धर्मज्ञान है। इस अनमोल धर्मज्ञान को मै सनातन धर्म के उन नामी अनामी धर्मयोध्धा ओ को समर्पित करता हु जिन्होंने सनातन धर्म संस्कार के लीये कोई समाधान न करते हुए संघर्ष कीया, धर्मयुध्ध कीया, यातनाए सही, अपमान सहे, हजारो वर्ष की दासता का सामना कीया, निम्नकर्म स्वीकार कीया किंतु अपना मूल सनातन धर्म का साथ नहीं छोडा है। “एकात्मसत्य“ के सनातन शाक्यमत के धर्मज्ञान से भारत वर्ष के सभी मूलनिवासी सनातनधर्मी आत्मगौरव से गर्वित हो आपसमें “एकात्म“ हो संगठित हो भारतवर्ष में रामराज्य की स्थापना करे। सभी सनातन धर्मी भारतवर्ष को विश्वगुरु का उच्चपद दिला समृध्धी के सुवर्ण शिखर पर पहुचाए यही आभिलाषा है।

 

दिपकजी किशनजी