मनुष्य स्वभाव - प्रकृती नियम

       मनुष्य का स्वभाव ऐसा क्यों होता है? क्यो सभी मनुष्य अलग अलग स्वभाव संस्कार के होते है? इस पृथ्वी पर अलग अलग संस्कृतिक विकाश मुल आबोहवा के अनुरुप अलग अलग पंथ सम्प्रदाय या मत मतांतर के रुप मे होता है ईस का कारण क्या है? क्यु सभी स्थानो पर अलग अलग रहन सहन एवं खान पान होता है? 

 

      लाखो वर्ष के उक्रांती काल के संघर्ष का मनुष्य के स्वभाव संस्कार एवं उस की पसंद-नापसंद पर बहुत ही गहरी छाप है जीस को मनोचित्त पर प्रभावक अनुवांशिक छाप कह सकते है। लाखो वर्ष का मानव सभ्यता संघर्ष कीस प्रकार का था ? मनुष्य यह समज ने का प्रयास करे तो बहुत सरलता से एक मनुष्य दुसरे मनुष्य की मनोस्थिती समज सकता है एवं मनुष्य के जीवन का मूल्य क्या है वह जान सकता है।

 

     मनुष्य को हजारो लाखो वर्ष पहले आज है इतनी विवेक बुध्धी एवं समज नहीं थी वह प्रकृतीक अवस्था में आदीमानव जैसा जीवन जीता था। मनुष्य के छोटे-छोटे समुदाय थे जिसे हम कबीले कहते है वो हर हमेश एक दुसरे से लडते रहते थे। हरेक क्षण मनुष्य मृत्यु को मात दे जीवन को आगे धकेलता आया है। उक्रांती काल में मनुष्य जो जीवन संघर्ष करता आया है वह उसके स्वभावगत लक्षण में आनुवंशिक रीत से दाखिल हुआ है। 

 

       किंतु पीछले कुछ हजारो वर्षो से जो सामाजीक सभ्यता का जन्म हुआ है उस कारण मनुष्य धार्मीक मतमतान्तर का विकाश हुआ है। आज का मनुष्य कुदरती नियम भंग करके विचित्र पापपूण्य की धाराधारणा को अपने जीवन मे उतार सभी मनुष्य एक पंगु विचारश्रेणी के वाहक बनके जीवन मे संघर्ष करना बहुत ही कम कर दिया है। आज सभी मनुष्य पंथ संप्रदाय के विचारो, धाराधोरण का मनोशिकार हो संधर्षमय कुदरती जीवन जीने की लय का त्याग कर कर्मप्रधान जीवन व्यवस्था के बदले प्रारब्ध वैराग्य प्रधान जीवन पद्धतिको ज्यादा महत्व देने लगा है।

 

        लाखो वर्ष पहले मनुष्य का जन्म ही कीतना विकट था कीसी भी प्रकार की प्राथमिक सुविधा के बिना जन्म धारण कर पोषण प्राप्त कर संघर्ष कर जीवीत रहना यही एक महप्रश्न था। उस समय में कीतने ही जन्म लेने वाले मनुष्य शिशुओ को युवा होने तक का सोभाग्य प्राप्त होता होगा? यह एक बड़ा प्रश्न है हर समय हर क्षण मृत्यु के साथ संधर्ष था जंगली जानवर के शिकार होने का भय, विषैले जीव जंतु के काटने का भय, भोजन प्राप्त करने का संघर्ष कुपोषण से मृत्यु का भय, दुसरे समुदाय के कबीले से हिंसक लड़ाई का भय  चारो ओर मृत्यु का भय था।

 

        आज मनुष्य को दिन में चार बार भोजन की सुविधा है किंतु उस आदीम समय मे भोजन ही एक बडी समश्या थी। मनुष्य को संधर्ष महेनत से शिकार कर या दूसरे कीसी भी उपाय से भोजन प्राप्त करके शारीरिक पोषण प्राप्त करना पड़ता था। जो मनुष्य भोजन प्राप्त करने मे असमर्थ हो उस पर कुपोषण का शिकार हो मृत्यु भय था। आज मनुष्य निर्भय हो आराम से नींद ले सकता है उस आदीम समय मे पहाड़ो में गुफा में अपने आपको सुरक्षीत करने के बाद भी निरंतर भय से सतर्क रह निंद्रा आराम करना पड़ता था। आदीम मनुष्य को निरंतर सतर्कता रखनी पड़ती थी कब कीस समय कोई शिकारी हिंसक पशु का शिकार हो जाये? उस आदीम मनुष्य के लीये प्राथमीकता हर समय मृत्यु से झुज कर जीवीत रहने की थी। आज के मनुष्य की तरह निर्लज बनकर नशे की लत लगा बीन जवाबदार जीवन जीना या पंथ संप्रदाय के नाम अलग अलग पंगुविचार श्रैणी के वाहक बन एक दुसरे मनुष्य समुह से द्वेष करना वह हमारे पुर्वजो के लाखो वर्ष की संघर्ष जीवनयात्रा का धोर अपमान है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा से मनुष्य को विवेक बुद्धि मीला है किंतु मिथ्या तर्को द्वारा पाखंड कर के पंथ संप्रदाय के नाम पर वैराग्य को प्रधानता दे संधर्ष करना छोड देना वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का धोर अपराध है।

 

         आदीम समय मे मनुष्य को बाल्य अवस्था से कठोर जीवन संधर्ष कर हर क्षण मृत्यु को मात दे युवान बने तो उसे पुरुष हो तो एक स्त्री और एक स्त्री को एक सशक्त पुरुष के साथ जोड़ी बना कर संतान उत्पन्न कर कुदरत के नियमानुशार अपना वंश वारसा आगे बढ़ाना पड़ता था। आदी मसमय मे पुरुष पुरुष के बिच में स्त्री के लीये तीव्र स्पर्धा होती होगी। सोचीये वह कीतनी खूंखार आपशी लड़ाई होती होगी? कल्पना कीजिये वह समय कैसा होगा? जो पुरुष संधर्ष करता हो जो शसक्त हो वही स्त्री के साथ जोड़ी बनाकर संतान पैदा करके अपना वंश वारसा आगे बढ़ाने को भाग्यशाली बनता था। आज के समय जैसा नहीं था की सामाजीक परम्परा के नाम पर एक दुर्बल पुरुष जीसका वर्तन समाज से, धर्म से, राष्ट्रसे बिनजवाबदार हो वह भी समाज व्यवस्था के नाम पर ब्याह कर पत्नी के रुप मे एक स्त्री प्राप्त करके संतान पैदा करके उसका वंश आगे बढाने को भाग्यशाली बन जाता है।

 

          मनुष्य अपने उत्सुक स्वभाव के कारण उक्रांती में आगे ही आगे बढ़ाते हुए शब्दो का उच्चारण कर बोलना सिखा। मनुष्य अपने उत्सुक स्वभाव से नया नया शिखते लड़ते जगडते ज्ञान प्राप्त करते आज की भौतीक, सामाजीक, धार्मीक सुख सहूलीयत भरे जीवन जीने को भाग्यशाली बना है। आज का मनुष्य जो कुछ सुख सुवीधाए प्राप्त करता है मृत्यु भय के बिना आराम से निर्भय हो मुक्त जीवन जीता है वह मनुष्यो के आदीम पूर्वजो के संघर्षमय जीवन समर्पण के आभारी है। आज का सभ्य मनुष्य अपने जीवन का मूल्य ना समजे एवं कोटुम्बिक-सामाजीक या राष्ट्रिय हित न देख बिनजवाबदारी से वर्ताव करे तो वह आदीम पूर्वजो के लाखो वर्षो के संघर्ष मय जीवन समर्पण का अपमान है। जो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा से हमारा जीवन है जो सुख सुवीधा है उसकी हम कदर न करे तो वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अपराध ही है।

 

        लाखो वर्ष के उक्रांती काल दरमियान मनुष्य हमेशा पानी जहा सुलभ हो वहा पानी के स्त्रोत के पास ही रहता आ रहा है। वर्षो से मनुष्य की पहली जरूरियात पानी ही है पानी के लीये ही मनुष्य नदी कीनारे भूमिगत पानी के स्त्रोत के पास तालाब या सरोवर के पास रहता आया है। समुद्र कीनारे भी हमेशा मनुष्य अपनी जरुरत के लीये रहता आया है और इस पानी के पास रहने का अनुवंसिक गुण आज के मनुष्य में भी देखने को मीलता है। आज का मनुष्य भी नदी तालाब भूमिगत पानी के प्रकृतीक स्त्रोत पहाड़ी झरने समुद्र कीनारा आदी देख कर बहोत प्रसन्न हो जाता है। मनुष्य निरंतर नदी सरोवर झरना या समुद्र कीनारे के पास जाना वहा समय पसर करना बहोत ही पसंद करता है जो उसको आनुवांशिक गुण है। मनुष्य को उसके उक्रांती काल में पानी के सिवा उसकी दूसरी महत्व की जरूरियात पोषण प्राप्त करने केली ये भोजन की रही है। इस लीये वर्षो से मनुष्य अपने भोजन में क्या खाता आया है वह जानना भी रसप्रद होगा। मनुष्य पानी के लीये जहा पानी की सहूलियत हो वैसे विस्तार के आसपास ही रहने का पसंद करता आया है। इसलीये उसका खानपान भी इसिके ही अनुरूप ही था जैसे की मीठे पानी की मछलीया, पानी के केकड़े, नदी तालाब के कीनारे घास के मैदान पर रहते खरगोस जैसे छोटे प्राणी, तेतर या मुर्गी जैसे पक्षी। पेड़ पर होते विविध फल, सब्जीया एव जमीन में होते विविध प्रकार के कंदमूल यह वर्षो से मनुष्य का भोजन है। और इन सब का मनुष्य अपने भोजन मे उपयोग करता आया है।

 

         आज का मनुष्य भी रंगबेरंगी मछलीया, पानी में करचले देख कर रोमांचित होता है क्युकी वर्षो से वह मनुष्य का भोजन है। खरगोश जैसे छोटे प्राणी, वैसे ही कोई भी त्रुनाहरी बड़े प्राणी के छोटे बच्चो की और कुदरती रुप से मनुष्य का आकषर्ण होता है। क्युकी यह छोटे जीव भी वर्षो से मनुष्य के भोजन का ही एक भाग है मुर्गी तेतर जैसे पक्षी भी मनुष्य का आकर्षण का केंद्र होता है। अंडे देखकर उसकी और भी प्रकृतीक रीत से मनुष्य का आकर्षण होता है क्योकी वर्षो से यह भी मनुष्य का भोजन ही है। मनुष्य कही यात्रा पर हो रस्ते में या कही भी कोई पेड़ पर फल लगे हुए हो वह बेर हो चीकू हो जाम्बुन हो आम या कोई भी फल हो वह स्वम अपने हाथो ही पेड़ पर से फल तोड़कर उस फल को खाने की लालच कभी भी नहीं रोक सकेगा।

 

         बाज़ार से मनुष्य कच्चे या आधे सड़े हुए फल कभी नहीं खरीदेगा किंतु प्रकृतीक रुप से पेड़ से तोड़कर कच्चे फल भी तोड़कर खा लेगा क्योकी लाखो वर्षो से मनुष्य का भोजन के लीये यह स्वभावगत लक्ष्मण है। पैसो से खरीदी करके कोई भी फल या फ्रूट खाने में उसे काट करखाने में जो आनद होता है उस से कही अधीक आनंद मनुष्य को प्रकृतीक रुप से पेड़ से फल तोड़कर खाने में आता है जो उसके लाखो वर्षो के उक्रांती स्वभाव का परीणाम है।

 

         जमीन में होते कंदमूल भी मनुष्य स्वम ही खोज कर जमीन में से खीच मिटटी साफ कर खाने का पसंद करते है। बहुत बार ऐसा भी होता है की घर पर कोई मनुष्य प्याज या मुली खाने का पसंद नहीं करता हो किंतु कोई खेत में या प्रकृतीक रीत से उगे हुए बही प्याज या मुली स्वयं ही खीच कर उसे खाने की लालच कभी नहीं रोक सकेगा क्योकी मनुष्य का वर्षो से सोया पुराना स्वभाव जागृत होने से रुकता नहीं है।

 

         उक्रांती के क्रमीक विकास से मनुष्य पिछले कुछ वर्षो में ज्यादा समजदार होने से सुनियोजीत कृषी करके पशुपालन कर दूध या मास का उत्पादन करके अपनी वसाहते स्थापीत करके वसहतो में से संस्कृति विकाश और उससे भी आगे आज जो देख रहे है वह समृद्ध समाज व्यवस्था पर पंहुचा है। इसी समज से वह अपने अलग दल बना पंथ संप्रदाय के नाम पर मत-मतांतर सामाजीक नितीनियम से जीवन जीने लगा है और इसी धर्म नाम पंथ संप्रदाय की समज के प्रभाव में विवेक करने लगा की यह खाना चाहिय और वह नहीं खाना चाहीए। किंतु मनुष्य जहा रहता हो वहा उस भूभाग की जो आबोहवा हो वहा जीस प्रकार के भोजन की विविधता हो भोजन सहूलियत हो वह भोजन करने में मनुष्य को कोई रूकावट नहीं होनी चाहीए।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का नियम है की जीव ही जीव का भक्षण करता है। मनुष्य या कीसी भी प्रकार के सजीव पत्थर कंकर को भोजन में नहीं लेते है। पेड़ वनस्पति आनाज बीज त्रुनाहरी प्राणी सभी में जीव है और मनुष्य उसके रस रूचि के अनुसार उस जीव को निर्जीव कर उसका भोजन में उपयोग करता है वह कुदरती है। किंतु जरूरियात के प्रमाण में ज्यादा भोजन बनाकर उसका बिगाड़ करना ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा जीनकी कृपा से इस जगत के सभी जिवो को भोजन मीलता है वह उनका अपमान है। इसी लीये कभी भी भोजन का व्यय नहीं करना चाहीए।

 

         लाखो वर्षो से मनुष्य को समतल भूमी या मैदानी जंगलो में रहते रानी पशुओ के शिकार से मृत्यु का भय रहा हुआ है। मनुष्य कृषी करता हुआ इस लीये धीरे धीरे मैदानों में बसने लगा और बड़ेबड़े भूभाग पर कबजा करने लगा उस वृति से  ही छोटे छोटे राज्य और बाद मे विशाल साम्राज्य अस्तित्व में आये है। भूमी के लीये मनुष्य दुसरे मनुष्य से ज्यादा हिंसक रुप से लड़ता झगड़ता हुआ अपने इस हिंसक वृत्ती से मनुष्य और ज्यादा ही ज्यादा आधुनिक हथियार और शस्त्रों का आविष्कार कीया है। पहले शिकार के लीये मनुष्य के पास छोटे हथियार जैसे की भाले थे और मनुष्य उसका ही उपयोग करता था। कालकर्म अनुसार ज्यादा विकशीत मनुष्य ही मनुष्य का भूमि के लीये दुश्मन बना और आधुनिक हथियारों का अविष्कार करने लगा जो आज मनुष्य महाविनाष के अणुबोम्ब तक पहोच चुके है।

 

          किंतु वर्षो पहले प्राथमिक अवस्था मे मनुष्य पहाड़ो पर्वतो में खुद को सुरक्षित अनुभव करता आया है। शिकारी पशु के भय से ही पर्वतो में कुदरती गुफा मे ही रहता आया है। जो कर्म लाखो वर्षो तक चला इस लीये पर्वतीय गुफा की और आकर्शित होना मनुष्य का आनुवंशिक गुण बन गया है। आज के मनुष्य को पर्वतो पहाड़ो का एक आकर्षण है मनुष्य पर्वतो पहाड़ो को देख कर आनंदित और प्रसन्न हो जाता है। क्युकी मनुष्य लाखो वर्षो से पहाड़ो पर्वतो से जुड़ा हुआ है मनुष्य वर्षो से पर्वतीय गुफा में रहता आया है इस लीये मनुष्य आज भी कोई भी प्रवतीय गुफा के और खिचता चला जाता है। मनुष्य प्रवतीय गुफा में जाने से अपने आपको कभी भी नहीं रोक शकता जो मनुष्य का कुदरती स्वभाव है। विश्वकी सभी संस्कृति में मनुष्य को जीस पर अपनी धर्म आस्था है वह उसके धर्मस्थान भी पर्वत पर और प्रवतीय गुफा में ही है। उस का कारण भी मनुष्य का पर्वत एवं गुफा का चुम्बकीय आकर्षण है। आज का मनुष्य भी शहरी कसबे में अपने रहेठान के लीये वर्षो से गुफा जेसे मकान फ्लेट रूम बनाता आया है।

 

         बहूत बार छोटे बालक छोटे छोटे कीटक, कीड़ी, मकोडो को मारकर आनंदित होते है। मनुष्य भी साप छिपकली या जहरीले जीव जंतु देखकर वह कीतना भी छोटा हो फिर भी डरने लगता है। और तुरंत उसे दूर भागने का या मार डालने का प्रयत्न करता है जो स्वभाविक है। क्योकी छोटे छोटे कीटक या कीड़ी मकोडो से बच्चो को काटन का भय रहता है। इसी लीये ऐसे कीटक या कीड़ी मकोड़े बालक के पास आये तब वह उसे मार डालने का प्रयास करता है जो प्रकृतीक रीत से घड़ा हुआ बालक का स्वभाव है। मनुष्य साप बिच्छु या छोटे छिपकली, घो जैसे जहरीले जंतु सरीसृप को दूर भागता है या मार देते है एवं उसके पास ही नहीं जाते है। आज भी कही साप दिखे तो बहोत मनुष्य इकटठे होते है क्यो की लाखो वर्षो से मनुष्य ने यह सब जहरीले जीव जन्तु से सरीसृप से मृत्यु का भय रहा हुआ है। इस लीये जहरीले जीव जंतु से दूर रहने का उनको मार डालने का स्वभाव उक्रांती काल में मनुष्य स्वभाव में ढल गया है वह मनुष्य की स्वभावगत आनुवंशीक गुण बन चुका है।

 

         इस प्रकार से कुत्ते, भालू या बड़े बाघ शेर चिता जैसे हिंसक प्राणियों से वर्षो से मृत्यु भय रहा होने से मनुष्य आज भी इन हिंसक पशु से स्वभाविक रीत से डरता है मनुष्य कुत्ते जैसे प्राणियों को पालने लगा किंतु लाखो वर्षो से आनुवंशीक घर कर गए कुत्ते का डर अभी भी मनुष्य स्वभाव से निकलता नहीं है।

 

        लाखो वर्षो से मनुष्य का एक समूह दुसरे समुंह से लड़ते झगड़ते आये है झगडा लड़ाई वह मनुष्य का आनुवंशिक लक्ष्ण है। पहले एक मनुष्य समूह दुसरे मनुष्य समूह पर आक्रमण कर के विरोधी समूह की स्त्रिया और बच्चो का अपहरण कर के उन्हें दास बनाते थे। और वह वर्षो तक यह क्रम चला है इसलीये आज भी स्त्रीया बच्चे अंजान मनुष्य को देखकर डर अनुभव करती है एवं अंजान मनुष्य से दूर रहने का प्रयत्न करते है।

 

        वर्षा, बिजली, मेघगर्जना, भूकंप जैसे कुदरती गतीविधि हमेशा मनुष्य के लीये कुतूहल जिज्ञासा वृति के प्रसंग रहे है और इस प्रकृतीक गतीविधी का मनुष्य के स्वभाव में आनुवंशिक प्रभाव देख सकते है। बारीश में भीगने का आज के मनुष्य को अच्छा लगता है किंतु लाखो वर्षो पहले बारीश बिजली मेघगर्जना से मनुष्य डर अनुभव करता था वह आज के मनुष्य में देख शकते है। आजभी मनुष्य अचानक वर्षा शुरू हो पहले प्रतिक्रिया के अनुसार सलामत जगह का रुख करके सुरक्षित होने का पसंद करता है बाद में ही बारिस में भीगने के लीये बहार निकलता है।

 

       मनुष्य वर्षो से अपने पोषण के लीये शिकार करता आया है जब भी कोई मनुष्य समूह को बड़ा शिकार हाथ लगे तब वह आनंदीत हो चिचियारी एवं बड़े आवाज लगा कूदने उछलने लगाना आदी क्रिया करके जोश और आनद व्यक्त करते थे। इसी प्रकार लड़ाई या झगड़े के बाद विजय प्राप्त करके आनंद व्यक्त करता था यह स्वभाव भी मनुष्य के आनुवंशिक लक्ष्मण की तरह आज भी देखा जाता है। आज भी कोई मनुष्य शिकार के बाद या कोई भी खेल कूद जीसमे मनुष्य जीस का समर्थक है वह पक्ष जीते या युद्ध में विजय हो तब आज का मनुष्य भी चिचियारी कर के बड़े जोर से आवाज करके आनद व्यक्त करता है। जो लाखो वर्षो से उसके संस्कार में जुड़ गया मानव सहज स्वभाव है।

 

          मनुष्य अपने पोषण के लीये छोटे मोटे पशु –पक्षी का शिकार समुह मे या अकेले करता था। जब कोइ बड़ा शिकार हाथ लगता तब मनुष्य समुह मे नृत्य कर आनंद उत्सव मनाता था। वह संस्कार आज भी विश्वके सभी समुदाय में सामाजीक एवं धार्मीक उत्सव मे समूह नृत्य प्रसंग मनाते मनुष्य समुहो मे देखने को मीलता है।

 

         मनुष्य बोलने लगा वह उनकी कुछ नया नया जान दुसरो को बताने की प्रबल इच्छा एवं कुछ नया जानने की प्रबल जीग्याषा वृत्ती के आभारी था। मनुष्य को कुछ नया जानने जैसा हो तब वह देखने की प्रबल उत्सुकता एवं दुसरे मनुष्य के पास कुछ नया हाथ में आये तब ज़पट मरकर छीन अपने हाथो मे ले उसका निरक्षण करने का स्वभाव मनुष्य में आज का नही है। यदी मनुष्य में नया नया जानने की उत्सुकता ही न होती तो इतना बोद्धिक विकाष संभव ही न होता। मनुष्य को जो नया नया जानने को मीलता है वह जल्द से जल्द दुसरे मनुष्यो को बताने की प्रबल वृत्ती से ही मनुष्य ने धीरे धीरे शब्दो को जोड बोलना शिखा है। सोचिये कीतने लाख वर्ष मनुष्य इशारे या बोलने का प्रयत्न कर के अपनी बात दुसरे मनुष्यो को समाजाने का प्रयत्न कीया होगा बोलने के निरंतर प्रयास से धीरे धीरे मनुष्य कुछ शब्दो को जोड प्रारंभीक वार्तालाप करने को शक्षम हुआ होगा। नइ जानी हुई बात दुसरे मनुष्य को करने की वृत्ती आज के मनुष्य में भी आनुवंशीक तौर पर देखी जा सकती है। एक दुसरे को बताने की इस वृत्ती से ही मनुष्य लाखो वर्षो का उक्रांति विकाष कर के आज की उच्च समृद्धि प्राप्त हो यह संभव हो सका है। मनुष्य मे नया नया जानने की जीज्ञाषा वृत्ती उत्सुकता एवं जानी हुई बात दुसरे मनुष्यो को करने की वृत्ती न होती तो मनुष्य आज भी कुदरती प्रकृतिक अवस्था मे जीवन जीता होता। इसलीये मनुष्य को निरंतर नया नया जानने का उत्सुकता जिज्ञासा वृती एवं जानी हुई नइ बात दुसरे मनुष्य को करने की वृत्ती वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने मनुष्य को दीहु ईअनमोल भेट है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के आशिर्वाद से सभी जिवो को  सृष्टि के सुरुप संचालन एवं एक दुसरे के उपयोग के लीये अलग अलग प्रजाति के बनाये गये है। सभी जीव एक दुसरे जीव की पूरक जीवन कड़ी है एक कड़ी टुटने से उसके आसपास की कड़ी वाले जीवो को बहुत ही दुखद परिणाम भुगतने पड़ते है। मनुष्य में बुद्धि विवेक है मनुष्य को समजना पड़ता है की जरूरत से ज्यादा प्राकृतिक कुदरती सम्पदा को अपने हीत के लीये हानी पहुचाना ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का महा अपराध है। जीसके बुरे फल भुगत ने के लीये सभी मनुष्य को तैयार रहना पडता है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही इस विश्व के सभी जीवो का पालन पोषण करती है यहा केवल मनुष्य ही नहीं है दुसरे करोडो प्रकार के जीवो का अस्तित्व है। यह आदीअनादी अगोचर शक्ति के नियम सभी जीवो के लीये एक सामान है कोई भेद नहीं है। 

 

       इस पृथ्वी पर एक जीव खोज निकालो जो प्रकृति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के सानिध्य में दुखी हो ? जंगल में हिरन, नीलगाय, भैष सब पूर्ण तंदुरस्त है – मनुष्य ने पाले हुए गाय, भैष आदी पशु ओ की हालत ख़राब है। जंगल में कुत्ते, वानर, पक्षी सब मस्त है – मनुष्य ने पाले हुए कुत्ते, वानर, पक्षी ओ की हालत दुखी है। जो प्रकृति के आधीन है व सब तंदुरस्त मस्त आनंद मंगल में सुखी है। और जहा मनुष्य ने हस्तक्षेप कीया वहा सब सत्यानाश है दुखी है आखिर एसा क्यों है कभी चोचा है? धर्म  के नाम प्रकृति से खिलवाड़ कब तक करोगे? धर्म के नाम प्राकृति क नियमो का भंग करने से ही मनुष्य दुखी है यही सनातन सत्य है। 

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के अनुकंपा से समस्त विश्व के सभी जीव को मीली पांच अनिवार्य पवित्र कर्तव्य का पालन करने से ही मनुष्य सुखी बन सकता है। 

 

     सनातन धर्म में आस्था रखने वाले मनुष्य समुदाय की पांच पवित्र कर्तव्य ।

 

1. भोजन-

     भोजन ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अनुकंपा से मीला हुआ सभी जीव का अधीकार है। इस पृथ्वी पर सभी जीव, कीटक, बेक्टेरिया, पक्षी, प्राणी, जलचर, वृक्षों, मनुष्य सभी जीव भोजन ग्रहण करके उसमे में पोषण प्राप्त करते है ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का ही नियम है।

 

“जीव ही जीव का भक्षण करता है यही सनातन सत्य है’’।

 

         पृथ्वी पर सभी जीव की दिनचर्या रात्रिचर्या वह भोजन शृंखला के अनुसार भोजन के आसपास ही केन्द्रीत रहती है। सृष्टी के सभी जीव एक भोजन शृंखला की कड़ी मात्र ही है और यह भोजन शृंखला की कड़ी मात्र से ही यह रंगबिरंगी जीव स्रुष्टि का सुन्दर समन्वय है। भोजन की शृंखला के कारण ही हमे पकृति का एक सुहावना पहलू देखने को मीलता है। घास के मैदानों में हिरन के चरने का मनमोहक द्रश्य या चपलता से अपने शिकार पर लपकते बाघ का द्रश्य कभी भुलाया जा सकता है? कबूतरों के जुंड का समूह में दाना चुगने का द्रश्य या पिराना मछली के जुंड का जनुनता से अपने शिकार को चटकर जाना प्रकृति का विराट खेल भोजन पर ही टिका है। जलचर से उभयचर, उभयचर से स्थलचर, स्थलचर से गगनचर पशु – पक्षी – कीटक – सरीसृप जहा द्रष्टि करो सभी जगह जीवन है और जीवन का आधार भोजन है। भोजन और भक्षक दोनों जीवो का अपना अपना अस्तित्व बचाने का जो प्राकृतिक खेल है वह बहूत ही जटिल और अदभूत है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने मनुष्य मात्र को विवेक बुद्धि दी है इसलीए मनुष्य प्रकृति की इस लीला का आनंद ले सकता है। पृथ्वी के सभी जीव की भोजनलीला प्रकृति का एक निराला रूप है किंतु मनुष्य को समाज विवेक बुध्धि है तो भोजन के लीए मनुष्य की एक विशेष कर्तव्य बनता  है।

 

       मनुष्य के लीए विशेष कर्तव्य है की वह पृथ्वी पर के जीस भू-भाग पर रहता हो उस भू-भाग की प्रकृतिक आबोहवा के अनुसार से वनस्पति, खेती, पशुपालन, कीटक, पशुपक्षी, जलचर की जो जीव विविधता है एवं भोजन शृंखला की जो विपुलता है उस कड़ी से अपने लीए भोजन प्राप्त करे। मनुष्य पृथ्वी के जीस भू-भाग पर रहता हो उस भू-भाग की आबोहव और प्रकृति के अनुसार से भोजन की उपलब्द्धता होती है जीस भोजन से मनुष्य को पोषण मीलता है जो भोजन मनुष्य के रस रूचि के अनुसार हो वह भोजन ग्रहण कर मनुष्य को पोषण प्राप्त करने का पूर्ण अधीकार है।

 

       मनुष्य को विवेक बुद्धि मीली है इस लीए मनुष्य ने विविध प्रकार के भोजन पकवान बनाना सिख लीया है और भोजन को पोषण से भी विशेष रूप से आनंद देते एक आयाम के रूप स्वीकार कीया है। पृथ्वी पर के सभी भू-भाग की संस्कृति के अनुसार जो भोजन प्रणाली है वह सभी प्रकार के भोजन का आनंद आज मनुष्य प्राप्त कर रहा है। मनुष्य उसके सामाजीक जीवन में जितने ही उत्सव मनाता है उस के केंद्र में भी विविध प्रकार के भोजन का रसथाल होता ही है। मनुष्य को यह पृथ्वी पर भोजन के लीए इतनी विविधता मील ती है वह पृथ्वी पर के दुसरे कीसी भी जीव को नहीं मीलती। यह विविध प्रकार का भोजन ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा से ही मनुष्य को मीला हुआ है इस लीए सभी मनुष्य को अंत:करण से भोजन के लीए ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का आभार व्यक्त करना चाहीए।

 

       मनुष्य एक कौटूम्बिक एवं सामाजीक प्राणी है और मनुष्य समाज के सभी प्रसंग के केंद्र में भोजन रहता है। मनुष्य की तो कर्तव्य  है की भोजन का सम्पूर्ण मान सन्मान रखे कभी भी भोजन का बिगाड़ न करे। मनुष्य उसके कुटुंब में उस के घर पर अतीथी मित्र- सगे-स्नेही आए या कौटुम्बिक उत्सव मनाया जाता हो तब सभी अतीथी को रस-रूचि के अनुसार भोजन करा तृप्त करना ही धर्म है। भोजन समय पर यदी कोई अतीथी घर पर आये तो वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का आभार मानकर अथीती को भोजन करा कर तृप्त करना चाहीए यह सभी मनुष्य की प्रथम कर्तव्य  है। मनुष्य अपने सगे-स्नेही मित्रो के वहा अतीथी बनकर जाये या कोई सामाजीक उत्सव में अतीथी बन कर जाये तब भोजन का सन्मान करे ।कभी भी भोजन का बिगाड़ ना करे जीतनी आवश्यकता हो उतना भोजन ही अपनी थाली में ग्रहण करे और भोजन के बारे में कभी भी कोई भी अरुचिकर अभिप्राय न दे। सभी मनुष्य को विविध प्रकार के भोजन का रसथाल देने के लीए ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का आभार प्रगट करना चाहीए।

      

2. प्रणय-

   पृथ्वी पर जोड़ी बनाकर रहते सभी नर (पुरुष) और मादा (स्त्री) को प्रणय का अधीकार ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अनुकंपा से मीला हुआ सबसे पवित्र कर्तव्य है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का पृथ्वी पर रहते सभी प्राणी मात्र को आदेश है की सबको जोड़ी बनाकर प्रणय करना चाहीए प्रेम करना चाहिये पृथ्वी पर प्रेम से बडा कोई कर्तव्य नहीं है।

 

        पृथ्वी पर सभी जीव की प्रणय जोड़ी होती है। वृक्षों में और फूलो में भी स्त्री और पुरुषत्व का विभाजन होता है उन दोनों के पवित्र मीलन प्रणय से ही सृष्टि का सर्जन संभव बनताहै। चारो और द्रष्टिपात करो कुत्ता-कुत्ती, चूहा-चुहीया, गाय-नंदी, हाथी-हाथनी, ऊंट-ऊंटडी, कबूतर-कबूतरी, शेर- शेरनी सभी जोड़ी बना प्रणय में लींन है। वृक्षों में भी नीम-निमडी, पीपल-पिपली, फूलो में भी सभी जगह पर स्त्री केशर-पुकेशर – हम एक नरमादा की प्रणय जोड़ी के बिना की सृष्टि की कल्पना भी नहीं कर शकते है।

 

        जीव सृष्टि में एक जोड़ी बना ने केलीए कीतना संघर्ष होता है? कीसी भी प्रजाति के जीव सुष्टि में दो नर एक मादा के लीए खूखार लड़ाई संघर्ष करते है। जीवन मरण का अंतर होता है जो समर्थ नर होता है वही मादा के साथ जोड़ी बनाकर अपनी प्रणय कर्तव्य पूर्ण कर शकता है। पृथ्वी पर कीसी भी प्रजाती के निर्बल नर को जोड़ी बनाने का अधीकार नहीं मीलता है। इस सृष्टि में चारो ओर नजर करो तो जहा देखो वहा सभी प्रजाती के जीवो की नर-मादा की जोड़ी प्रणय मग्न ही है। शिकार के बाद आराम करते शेर-शेरनी के द्रश्य को देखो ,सारस बेलड़ी की चोंच से चोंच लड़ाती प्रेमलीला देखो, कबूतर-कबूतरी का गुटुर-गू देखो बस चारो और प्रणय के सिवा है क्या कुछ?

 

       ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा से मनुष्य बुद्धिशाली है संस्कारी एवं सभ्य है इस लीए सभी स्त्री-पुरुष को जोड़ी बनाकर अपना संसार बसाना वह पवित्र में पवित्र प्राकृतिक कर्तव्य है। विश्व के सभी सभ्य समाज को अपने रित-रिवाज के अनुसार जोड़ी बना विवाह सूत्र में बंधने वाले स्त्री-पुरुष को बहूत ही आदर मान सन्मान देने चाहीए। विश्व की सभी मानव सभ्यता में  सबसे बड़ा स्थान पति-पत्नी की जोड़ी का होता है स्त्री-पुरुष की विवाह बंधन से बंधी जोड़ी से ज्यादा पवित्र बंधन दूसरा कुछ भी नहीं हो शकता। जो स्त्री और पुरुष पूर्ण समर्पण से एक दुसरे को वफ़ादारी पूर्वक एक दुसरे की भावनाओ का मान-सन्मान का ख्याल रखकर प्रेम पूर्वक जीवन जीते हो वहा स्वयम ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का वास होता है। जहा एक स्त्री और एक पुरुष सम्पूर्ण प्रेममय जीवन जीते हो वहा सुख-समृद्धि और पवित्रता का वास होता है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का वचन है सभी सभ्य मनुष्य समुदाय का विवाह्सुत्र में बंधे स्त्री या पुरुष का जोड़ा पूर्ण समर्पण से एक दूसरे को वफादार हो सम्पूर्ण क्लेश के बिना प्रेममय जीवन जीते होगे वह जोड़ी को कोई भी प्रकार की पीड़ा-तकलीफ नहीं होगी और वह जोड़ी इस पृथ्वी पर स्वर्ग जैसा सुख प्राप्त करेगी। जीस स्त्री-पुरुष की जोड़ी को परस्पर एक दुसरे पर विश्वास ना हो ,हमेशा कलेश हो, प्रेम ना हो, प्रणय ना हो, उस स्त्री पुरुष की जोड़ी को नर्क जैसी यातना सहन करनी होगी एवं ढलती उम्र  में बहूत ही परेशानी तकलीफे उठानी पड़ेगी।

 

         कीसी भी स्त्री पुरुष की विवाह सूत्र में बंधी जोड़ी के प्रणय जीवन में हस्तक्षेप करना वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अपराध है। सभी मनुष्य अपनी एक जोड़ी बना सके उसके लीए प्रणय प्रेमभावना देने के लीए ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का बहूत आभार प्रकट करना चाहीए।

      

 3. संतान-

    पृथ्वी पर रहते सभी प्रकार के जीव को संतान उत्पन्न कर के अपना वंश वारसा आगे बढ़ाना वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अनुकंपा से मीला पवित्र कर्तव्य है।

 

     सृष्टि में सभी जीव अपने वंश को आगे बढ़ा ने के लीए संतान उत्पन्न करता है कीतनी ही प्रजाति के जीव तो ऐसे है जो वंश उत्पन्न कर के तुरंत मृत्यु को प्राप्त होते है इन जीवो के जीवन का ध्येय ही अपने वंश को आगे बढ़ने का होता है। वृक्ष-पौधे लताए आदी अपने बिज द्वारा अपने वंश का फेलावा करते है।

 

        वर्तमान में जो जीवसृष्टि जीवित है वह सभी जीव क्या सो-दोसो वर्ष पहले जीवित थे? वंश-वारसा उत्पत्ति से ही यह सृष्टि लाखो करोडो वर्षो से फलती फूलती आई है जो सृष्टि के विवि रंग है वह वंश वृद्धि के कारण है। एक पक्षी भी अपना अंडा दे उसकी देखभाल करता है अंडे से चूजा बहार आता है तब उस चूजे को दूरदूर से दाने या छोटे कीटक जीव जन्तु ला कर चूजे की चोंच में डाल खिला कर अपने चूजे का पालन पोषण करता है। एक प्राणी भी अपने बच्चो को शिकार करते- हरते-फिरते जो उसके जीवन में उपयोगी हो वह सभी गुण शिखाता होता है।

 

        मनुष्य को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से विवेक बुद्धि प्राप्त है इस लीए सभी मनुष्य को अपने संतान की ओर बहूत ही संवेदनशील एवं प्रामाणीक रहना चाहीए। सभी मनुष्य को अपने संतान के जन्म के बाद उसका धर्म-संस्कार कर ना चाहीए, नाम करण करना चाहीए अपने संतान के पालन पोषण का ख्याल रख कर प्रामाणीकता से उछेर करना चाहीए। संतान के विध्या-अभ्यास के लायक होते ही उसका विध्या-संस्कार कर के गुरुकुल में विध्या-अभ्यास के लीए भेजना चाहीए। अपने संतान को योग्य समय दे अपने संतान को बचपन से अच्छी समज देनी चाहीए उसे बोलना-चलना-अच्छी सभ्य रीत खाने पीने की कपडे पहनने की रीत-भात शिखानी चाहीए।

 

         छोटे बालक पर कीसी भी प्रसंग की गंभीर असर होती है इस लीए कोई भी माता-पिता को अपनी संतान के देखते कोई भी नशा या असभ्य वर्तन नहीं करना चाहीए। पति-पत्नी के पूर्ण समर्पण प्रेम की असर बाल मानस में सबसे ज्यादा होती है जो पति-पत्नी बहूत ही प्रेममय जीवन जीते हो अपने संतान को बहूत ही सभ्यता से पाला हो वह सुसभ्य संतान कभी भी ढलती उम्र में अपने माता पिता को दूर नहीं करते है।

 

          विश्व में सभ्यता से अपना जीवन जीते सभी मानव समुदाय में जो बहूत ही जरुरी जीवन उपयोगी आचरण पद्धति सनातन संस्कार है। सनातन धर्म की विचारधारा ही सबसे श्रेष्ठ प्रकृति अनुरूप जीवन सैली है। सनातन संस्कार के आभाव में संतान बड़ा हो जाय उसको अपना अच्छा बुरा क्या है? उसका भेद नहीं होता है। क्या प्रमाणीकता होती है? क्या अपने जीवन की कर्तव्य  होती है? इन प्राथमीक कर्तव्य ओ का ज्ञान नहीं होता है।

 

 

        सुसंस्कृत मनुष्यों को अपनी संतान को विध्या अभ्यास पूर्ण करेक विवाह संस्कार या अर्थ आजीविका संस्कार के लायक बने तब उसने जो विध्या अभ्यास कीया हो उसके साथ सनातन संस्कार एवं धर्म जनता समजता बने वह बहूत ही जरुरी है।

 

         विध्या अभ्यास से सभी बालक बड़ा हो अपनी अर्थ आजीविका तो कमा शकेगा किंतु यदी संथ संथ सनातन समज सनातन संस्कार सनातन धर्म का अभ्यास कीया होगा, अपना धर्म जानता होगा तो वह जीवन की सभी घटमाल का आनंद ले पायेगा। संतान जो सभी स्त्री-पुरुष की जोड़ी को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की तरफ से मीली हुई अनमोल भेट है। इस अनमोल भेट का जतन करना चाहीए अपने संतान की योग्य देख रेख करनी चाहीए। अपने संतान को सनातन संस्कार देने चाहीए यह सभी स्त्री-पुरुष की एक माता-पिता की पवित्र कर्तव्य है। सभी स्त्री-पुरुष को मीली यह संतान रूपी अनमोल भेट के लीए ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का बहूत ही आभार मानना चाहीए।

       

 4. रक्षा – आक्रमण

   सृष्टी के सभी जीवो का प्राकृतिक स्वभावगत लक्ष्मण रक्षा एव आक्रामण का है, अपने शरीर की रक्षा, अपनी मादा की रक्षा, अपने भोजन की रक्षा, अपने संतान की रक्षा, अपनी भूमी की रक्षा, अपने रहेठान की रक्षा, अपने समुदाय की रक्षा। रक्षा का स्वभाव ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने दिया हुआ सृष्टी के सभी जीव मात्र का अधीकार है उसकी कर्तव्य है। 

 

     एक हिरन अपने बच्चे के लीए शिकारी प्राणी के साथ भी संघर्ष करता है सृष्टी के सभी जीवो ने अपने ण जीवन की रक्षा के लीए अनेको प्रकार के विविध प्रती उक्ती का विकास कीया है। कीसी भी हिंसक रानी पशु के पास आक्रामकता है तो उस से उसका शिकार खुराक क्या कोई छीन शकता है? रानी पशु अपने शिकार की रक्षा दुसरे मुर्देखोर प्राणियो से अपने जीवन के भोग पर भी करता है। जंगल में रहते त्रुनाहारी जीव भी अपनी मादा के रक्षा के लीए अपने हरीफ से जीवन मरण का युद्ध खेलते है। अपने बचाव में जंगली भेंसो के जुंड भी इक्कथा हो शेर जैसे हिंसक रानी पशु को दूरकर देती है। एक कुत्ते के क्षेत्र में दूसरा कुत्ता प्रवेश कर जय तो कुत्ते के झुंड भी अपने क्षेत्र की रक्षा के लीए आपस में खूंखार लड़ाई कर लेते है। इसी प्रकार से बंदर के झुंड भी अपने क्षेत्र की अपनी मादा की रक्षा के लीए बहूत ही जनूनता से आपस में लड़ लेते है।

 

        सभी मनुष्य को अपने शरीर की रक्षा, अपने जीवनसाथी की रक्षा, अपने संतान की रक्षा, अपने कुटुंब की रक्षा, कर्म महेनत से बसाई हुई अपनी जमापूंजी की रक्षा, अपने समाज की रक्षा, अपने सनातन धर्म संस्कार-रीती-रीवाज की रक्षा, अपने राष्ट्र की रक्षा करने की पवित्र कर्तव्य  निभानी ही पड़ती है। मनुष्य को जरुरत पड़ने पर आक्रामक हो आक्रामण कर अपने धर्म मातृभूमी के विरोधी ओ का सर्वनाश करना चाहीये।  

 

       एक स्त्री भी एक रक्षक हो ऐसे श्रेष्ठ पुरुष का साथ पसंद करती है एक संतान भी ऐसे माता-पिता को ज्यादा महत्व देता है जो संतान का रक्षा करने में समर्थ है। समाज में भी वीर पुरुष का महत्व होता है जीस में समाज के हित का रक्षा करने को समर्थ हो जो आक्रामक हो। धर्म में भी जो धर्मरक्षक वीर पुरुष का ज्यादा महत्व होता है जन समुदाय धर्म रक्षक वीरो को दैवी पुरुष मानकर चिरकाल तक वीरो को याद रख कर पूजापाठ कर मान-सन्मान देते है। धर्मरक्षक वीरो के ही मेले लगते है वीरो की याद में ही शोर्य गीत गाय जाते है। श्री रामचंद्र ने हजारो वर्ष पहले आक्रामण कर असभ्यता एवं असुरो का सर्वनाश करके रामराज्य की स्थापना कर धर्मरक्षा कीया था इस लीये धर्मरक्षा के लीए विश्वमें श्री रामचंद्र का नाम आदर और सन्मान के साथ लीया जाता है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अनुकंपा से सभी मनुष्य को विवेक बुद्धि मीली  है सभ्यता, धर्मसंस्कार की समज मीली है इस लीए सभी मनुष्य मात्र की कर्तव्य है श्री रामचंद्र के नवसुत्र जीवन में उतार कर एक धर्मरक्षक बने। धर्म के लीए हमेशा आक्रमण करने वाला रक्षक ही जनमानस में चिर काल तक अजर-अमर रहता है।

        


5. कृतज्ञता –

      ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने सृष्टि के सभी जीव को चार पवित्र प्राकृतिक कर्तव्य दीया है भोजन, प्रणय, संतान, रक्षा सृष्टी के सभी जीव मे केवल मनुष्य को विवेक- बुद्धि- समज दिए है। मनुष्य को जीव मात्र के चार कर्तव्य तो अनिवार्य रूप से निभाने ही है किंतु सबसे विशेष पांचवा कर्तव्य है ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का पूजापाठ, स्तुति, ध्यान, प्रकृति का आदर कर कृतज्ञ होना।  


      ॐ महाचेतना के अंश से सृष्टी के सभी जीव में चेतना है वह जीवित है मृत्यु के बाद निर्जीव शारीर पंच महाभूतो में विलीन होगा या शिकारी जीव का भोजन बनेगा और चेतना वापस ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की महाचेतना में धूमील होगी। इस सृष्टी में सभी जीव में चेतना है वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के पास से आया है प्रकृति अनुसार अपनी जीवन की कर्तव्य प्रामाणीकता से निभा वापस ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के पास उनकी शरण में चले जाना है। इस सृष्टि में जो कुछ है वह सब कुछ ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा से ही है ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृपा से ही मनुष्य बुध्धिक विकशीत है। विविध प्रकार की सुख-सुविधा- आराम दायक घर- होटले हरने-फिरने का विविध मनोरंजक स्थल विविध सुख-सुविधा सज्ज गाड़िया, विमान, अलग अलग भोजन, पकवान, अच्छे-अच्छे कपडे कीमती जर-जवेरात जितना मनुष्य सोचे उतना कम है यह सब कीस के लीए है? क्या कोई मनुष्य सिवा सृष्टी के दुसरे कोई भी जीव या प्राणी इन भौतिक सुख सुविधा भोगने को शक्तिमान है? जो मनुष्य अपना जीवन धोरण का बंधन कर मन में ऐसा भाव लाये की यह सब भौतिक सुख सुविधा मेरे लीए नहीं वह मनुष्य यह सब भौतिक सुख सुविधा जीसकी कृपा से है वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अपमान कर रहा है। सारी सृष्टि का सर्जन यह भौतिक सुख सुविधा सब कुछ ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अनुकंपा से मनुष्य को मीला हुआ है। सभी मनुष्य को इस बात ख्याल रखना चाहीए की कोई भी सुख-सुविधा- मोज-शोख का अतिरेक भोग विकृति को जन्म देता है। और एक मनुष्य अपने भोग-विलाष में निजानंद में हो और उस मनुष्य के पत्नी- संतान- माता-पिता- सगे-सनेही सभी की मनोभावना को ठेस पहोचती हो तो एसे कोई भी भोग-विलाष मोज-शोख करने वह अपराध है पाप है अधर्म है। 


     मनुष्य को अपने जीवन में विवेक बुध्धि, स्वास्थ, भौतिक सुख-सुविधा के भोग के साथ प्रकृति के विविध रंग एवं सृष्टी के सभी जीवो की जीवनलीला देखने का जो परमानंद मीला है इस के लीये ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की सरनागत में कृतज्ञ होना चाहीए। हे ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा आपके कारण ही मेरा यह अनमोल जीवन है, आपके कारण ही सरीर एवं मन से स्वस्थ हु, आपके कारण ही हमारी जोड़ी अखंड है, आपके कारण ही मुझे संतान का सुख है, आपके कारण ही मुझे यह सभी भौतिक सुख सुविधा सुलभ है, आपके कारन ही में निंद्रा एवं विविध भोजन का सुख भोग सकता हु –हे ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ऐसी कृपा सदा आप मरे और मेरे शुभचिंतक मेरे कुटुंब पर हमेशा बरसाते रहना।


     सभी मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ मीला है उस के लीए ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का आभार प्रकट करे। मनुष्य को अपने जीवन में आगे जो सुख सुविधा या उच्चपद प्राप्त करने की इच्छा हो उसके लीए अपना एक निच्चित जीवनध्येय बनाकर शुभसंकल्प ले पूर्ण समर्पण से महेनत करना चाहीए। जीवन रंगमंच में मनुष्य को जो पात्र निभाने को मीला है वह सभी पात्र में अपना पात्र जो भी हो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा में पूर्ण आस्था रख कर पूर्ण समर्पण रख  प्रमाणीकता से अपनी श्रेष्ठता से निभाना है। मनुष्य को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने सनातनधर्म संस्कार द्वारा जो परमानंद अर्पण करा है उसका रुण चुकाना हम सभी मनुष्य की पवित्र धार्मिक कर्तव्य है। सनातन धर्मसंस्कार और सभ्यता भारतवर्ष में चिरकाल तक अखंड रहे सनातन सभ्यता धर्म अखंड रहे उस के लीये हमे सदा प्रयत्नशील रहना है।


    एक बात याद रखो हम मानव स्वभाव एव प्रक्रुति के नियम समज कर इस दिव्य ग्यान को अप्ने जिवन मे उतार स्वम एव अपने कुटुम्ब, समाज एव धर्म को सुख सम्रुध्धि तक पहुंचा शकते है। इस के लीये हमे ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के महाचेतना स्वरुप के द्वारा आत्म संकल्प सिध्धि का रहश्य जनना पडेगा।  


    ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा सर्वचेतन-अचेतन से जुड़े हुए ही है ओर सभी चेतन अचेतन सब ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा द्वारा ही संचालीत है। इस प्रकरण में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को ॐ महाचेतना के नाम संबोधीत करेंगे एवं मनुष्य की अंदर की आत्मा को चेतना के नाम संबोधीत करेंगे। आगे के प्रकरण में हमने जाना की आत्मा (चेतना) का स्वरुप एवं पांच शरीर एवं सोलह शक्ति चक्र होते है।

१।  स्थूल शरीर का रंग लाल है जीस मे चेताचक्र एवं बुद्धिचक्र है।

२। कारण शरीर का रंग नीला है जीसमे मनोमयचक्र दिव्यंद्रियचक्र एवं कर्मेन्द्रियचक्र होता है।

३। महाज्ञान शरीर का रंग पिला होता है जीसमे ज्ञानचक्र एवं मणिपुरचक्र होता है।

४। शुक्ष्म शरीर का रंग हरा होता है जीसमे विचारचक्र –लोकीकचक्र –प्रभाचक्र एवं मूलाधारचक्र – आज्ञाचक्र – अनाहतचक्र होते है।

५। दिव्यशरीर का रंग सफ़ेद है जीसमे स्वाधिस्थान चक्र- विशुध्ध चक्र एवं सहत्रार्थ चक्र होते है।


       ॐ महाचेतना सभी जीव से जुड़े हुए है आपकी याद में जीतने मनुष्य ५५ वर्ष से ज्यादा उम्र के है वह सभी मनुष्य का एक यादी तैयार करे और उसमे सुखीमनुष्य एवं दुखीमनुष्य का विभाजन करे।


       दुखी मनुष्य ने अपने जीवन में क्या कर्म कीये है उसका मनोमंथन करे।


1। फरियादी स्वभाव कृतज्ञता का अभाव ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अपराध।

2। पति-पत्नी के बिच तनाव भरे सबंध।

3। युवानी में संघर्ष के बदले नशे की लत गैरजीम्मेदाराना स्वभाव।

4। सभी सगे –स्नेही एवं कुटुंब से तनाव भरे सबंध।

5। जीवन में धार्मीक आध्यात्मिकता का अभाव।

6। जीवन में नीच्चित जीवन ध्येय या लक्ष्य को पाने को संकल्प का अभाव।



    सुखी मनुष्य ने अपने जीवन में क्या कर्म कीये है उसका मनोमंथन करे।


1। जीवन में कृतज्ञता का भाव जो मीला उसका आदर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का प्रिय।

2। पति-पत्नी के बिच मीठे आत्मीय सबंध।

3। युवानी में कठोर संधर्ष प्रामाणीक जीवन।

4। सभी सगे-स्नेही एवं कुटुंब से आत्मीयता भरे मीठे सबंध।

5। जीवन में धार्मीकता एवं आध्यात्मिकता का समन्वय।

6। जीवन का नीच्चित ध्येय लक्ष्य को पाने का संकल्प होना।


       अब सबको यह सोचना की यदी बुढ़ापा सुधारना हो तो कोनसे कर्म करने चाहीए एवं कोनसे कर्म नहीं करने चाहीए। सभी मनुष्य द्वारा कीये गए कीतने ही कार्य वह मनुष्य की चेतना द्वारा ॐ महाचेतना पूर्ण करते है। एक नियम है जो कार्य मनुष्य पहली बार करे वह उसके मनोमय चक्र द्वारा संचालीत होता है जो एकदम सुधड़ कभी भी नहीं होता। किंतु एक का एक कार्य निरंतर करने से वह स्वधिस्ठानचक्र से संचालीत होता है जो चेतना का केन्द्र बिंदु है। और कोई भी कार्य स्वधिस्ठान द्वारा संचालीत हो तब वह ॐ महाचेतना के मार्गदर्शन द्वारा बिना भूल का और एकदम सुघड़ तरीके से होता है। जब मनुष्य पहली बार साइकल चलता हे तब साइकल आड़ी-सीधी होती है किंतु एक की एक क्रिया निनिरंतर चलाने से उस कार्य की गहरी छाप चेतना पर पड़ती है और जब साइकल चेतना द्वारा संचालीत हो जाय तब साइकल व्यवस्थित चलने लगती है। ऐसा ही मोटर गाड़ी-मोटरसाइकल के लीये भी होता है शुरू में अव्यवस्थित किंतु एक बार चेतना द्वारा संचालीत होने लगे उसके बाद मोटर गाड़ी-मोटर साइकल व्यवस्थित चलता है। बाते चालू है किंतु गाड़ी या मोटरसाइकल चेतना द्वारा संचालीत है कीतनी बार ब्रेक लगी कीतने वाहन सामने मिले कुछ भी याद रहता है? और अचानक कोई सामने आ जाये तब पहले ब्रेक लगती है फिर चलाने वाले मनुष्य को पता चलता है की कीस कारण से ब्रेक लगाई गई है यही है चेतना एवं महाचेतना के गठबंधन का चमत्कार।


        जब कोई मनुष्य उसके नियमीत दिनचर्या के क्रम से घर से नोकरी, कार्यालय, कारखाने के स्थल या वहासे घर ऐसेही जाता हो और अचानक कोई दुसरे काम पर उसे जाना हो किंतु विचार में ध्यान दुसरी जगह पर हो तो नियमीत दिनचर्या के क्रम अनुसार चेतना उस मनुष्य को घर से कामकाज के स्थान पर ही पहोचाएगी। वहा पहूचकर मनुष्य अचंबित होगा वह सोचेगा मुझे तो आज दुसरे स्थान पर जाना था विचार विचार में यहाँ आ गया किंतु जब चेतना द्वारा सब कार्य होता है तब ऐसे छोटे छोटे चमत्कार तो मीलते ही रहते है। सोचिये सुबह से शाम तक मनुष्य के कीतने कार्य अपने आप चेतना द्वारा ही पूर्ण होते है। यदी यह कार्यपद्धति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा दवारा हमें नहीं मीली  होती तो मनुष्य को कीतनी परेशानी उठानी पड़ती?


        अचानक मनुष्य के शरीर पर संकट आये तब त्वरित निर्णय ले बचने का कार्य कोन करता है? जब जान पर संकट हो तब जन बचाने को कांटे की बाड हो या ६ फुट ऊँची दीवार उसे पार करने का बल कोन देता है? हाथ अग्नी में पड़े या पैर में शूल लगे तब तुरंत बचाव निर्णय लेकर हाथ वापिस खीचना या पैर मे से अपने आप हाथ पहुंचा कर शूल निकल ने की क्रिया कोण कराता है? कोई भी कंकर या जीव जंतु तेज गती से आँख से टकराए तब आँख की पलकें हमेशा बंद होती है किंत उस वस्तु या जीवको कभी कीसी मनुष्य ने देखा नहीं होता है तब आँख की पलकें अचानक बंद कोन कर देता है? ऐसे तो न जाने कीतने ही चमत्कार होते रहते है।


        चेतना में पड़े मनोभाव की गहरी छाप द्वारा ॐ महाचेतना कीस प्रकार से सभी मनुष्य के जीवन निर्माण का कार्य करते है वह समजते है।


        उससे पहले एक छोटी सी वार्ता-

        एकबार श्री रामचंद्र एवं मातासीता पृथ्वी लोक पर भ्रमण करने आये तब एक भक्त श्री रामचंद्र के मंदिर में माथा पटक रहा था। वह बहोत ही दुखी था और श्री रामसे उसके दुःख दूर करके उसको सुखी करे इस के लीये प्राथना करता था। माता सीता उस दुखी मनुष्य के दुःख से मनोविचलित हुए और श्री राम को कहा की हे आर्य इस मनुष्य के दुःख दूर करो उसे स्न्तुस्ठ करो। श्री रामचंद्र ने कहा हे प्रिय हम शिवलोक देव है हम मनुष्य के धर्ममात्र मर्यादा का उलंघन नहीं कर शकते किंतु ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के महाचेतना के नियम अनुसार “तथास्तु” को बलवंत कर सकते है। जीससे ॐ महाचेतना की अनुकंपा से यह मनुष्य जो फल का अधिकारी हो उस फल से इस मनुष्य को दुगना फल मिले। मातासीता ने कहा तो आर्य आप तुरंत ऐसा करो श्री रामचंद्र ने कहा की प्रिय आप इस मनुष्य के चेतना पर रहे भाव देखे और में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की प्राथना कर के तथास्तु बोलना सुरु करता हु। ॐ महाचेतना की कृपा से यह मनुष्य जो फल प्राप्त करने का अधीकार हे उस से दूगुना फल प्राप्त करने का अधिकारी होगा। माता सीता ने उस दुखी मनुष्य की चेतना पर अंकीत हुए मनोभाव पढ़ने शरु कीये और श्री रामचंद्र ने भाव को तथास्तु बोलना शुरू कीया।


१। में बहोत ही दुखी हु मेरे विरोधी व्यापारी का वेपार बहूत अच्छा चलता है मेरे वहा पर कोई ग्राहक नहीं आता। -श्री रामचंद्र बोले  “तथास्तु “

२। मै बहोत ही दुखी हु मुज पर बहोत ही कर्जा हो गया है लेनदार कभी मुझे नुकसान पहुचाएंगे।  -श्री रामचंद्र बोले “तथास्तु “

३। मेरे सभी सगे-स्नेही बहोत ही स्वार्थी है मुझे कोई मदद नहीं करते।      -श्री रामचंद्र बोले “तथास्तु “

४। मेरी पत्नी एवं बच्चे निरंतर मुझ से झगड़े करते है मेरा कहा कोई मानता नहीं है।   -श्री रामचंद्र बोले “तथास्तु “

५। अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं है मै कभी भी मेरे प्राण त्यागकर आत्महत्या कर लूँगा।   -श्री रामचंद्र बोले “तथास्तु “


     माता सीता बोले हे आर्य यह मनुष्य दुखी तो था ही हमने तो इस मनुष्य को ज्यादा दुखी कर दीया। तब श्री रामचंद्र बोले देखो प्रिय जो कृतज्ञ है जीस मनुष्य की चेतना में अच्छे मनोभाव है जीस मनुष्य को अपना निच्चित जीवन ध्येय है जो मनुष्य कर्म महेनत में विश्वास करता है उस मनुष्य को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा तथास्तु से आशीर्वाद देते है। जीस से मनुष्य को कभी भी कीसी के सामने हाथ फेलाने की जरुरत नहीं होती सभी मनुष्य को जो चाहीए वह चेतना द्वारा जानकर ॐ महाचेतना द्व्रारा सभी मनोरथ पूर्ण होते है। यदी मनुष्य के जीवन में निच्चित जीवनध्येय और शुभ संकल्प होगा साथ कृतज्ञता का भाव होगा तो ॐ महाचेतना की कृपा से जो है उससे भी कई गुना प्राप्त करने का अधिकारी होगा। 


         मनुष्य फरियादी बनगा तो जो है वह भी छीन लीया जायेगा और तब पृथ्वीलोक के अवगती प्राप्त कोई भी देव या देवी इस मनुष्य की कोई भी मदद नहीं कर पायेगा क्युकी ॐ महाचेतना की शक्ति के आगे कीसी भी देवशक्ति की नहीं चलती है। यदी कीसी मनुष्य को अन्याय हो गोचर अगोचर शक्ति से प्रताड़ित हो तो श्री महामाया श्री शक्तिपीठ एवं उनके रक्षक भेरव की कृपा प्राप्त करनी होगी किंतु फरियादी बनान वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अपराध है।

         कीसी मनुष्य के चेतना में मनोभाव पर एक निच्चित जीवनध्येय अंकीत हो और उस निच्चित जीवनध्येय को पूर्ण करने को अटूट संकल्प हो तो ॐ महाचेतना क्या करते है? कीसी मनुष्य के चेतना में मनोभाव पर एक निच्चित जीवनध्येय न हो तो ॐ महाचेतना क्या करते है? 


    एक मनुष्य जंगल में रास्ता भटक गया है और उस का ध्येय है कैसे भी करके जंगल की भूल भुलैया से बहार निकलना और उस के लीये सामने जो पर्वत शिखर है उस पर चढ़ रास्ता खोजना। अब ध्येय निच्चित है जंगल की भूलभुलैया से बहार निकलना और उसके लीये सामने जो पर्वत शिखर है उस पर पहचना। मनुष्य के ध्येय की छाप उसकी चेतना मनोभाव पर द्र्ठ होगी तो वहा से ॐ महाचेतना उस मनुष्य को जंगल से निकल ने को मदद करना सुरु कर देते है। उस मनुष्य को अब मात्र पर्वत शिखर ही दिखाई देगा बाकी सब वह मनुष्य भूल जायेगा। उस मनुष्य को पर्वत शिखर पर चढ़ते समय पेर में कांटे लगेंगे फिर भी वह सहन कर लेगा। रस्ते में मुसीबत है, खाई है, नदी है फिर भी ॐ महाचेतना उस मनुष्य को वह अडचने पार करने की प्रेरण देगी। पड़ते लड़ते वह मनुष्य एक ही निच्चित ध्येय रखेगा तो पर्वत शिखर पर जरुर पहुच जायेगा और जंगल की भूलभुलैया से निकलने का मार्ग खोज जंगल से बहार निकल जायगा।


      उसी जंगल की भूलभुलैया में भटके हुए दुसरे मनुष्य को जंगल से बहार निकल ने का निच्चित ध्येय नहीं होगा तो उस मनुष्य का ध्यान कोई पर्वत शिखर नहीं जायगा तो सोचिये क्या होगा? जंगल की भूलभुलैया से बहार निकलने की अपने चेतना मनोभाव पर द्र्ठ छाप के आभाव में ॐ महाचेतना उस मनुष्य को कुछ भी मदद नहीं कर शकते। वह मनुष्य जंगल में आगे तो बढ़ता रहेगा किंतु कोई भी अड़चन उसका मार्ग बदल देगा और वह मनुष्य आने वाली सभी अड्चनो पर अपना मार्ग बदलता बदलता जंगल की भूलभुलैया में ही भटकता रहेगा।


     ॐ महाचेतना सभी मनुष्य की चेतना में मनोभाव में रहे निच्चित जीवनध्येय के संकल्प को ही मददरूप होते है। किंतु यदी कोई मनुष्य को अपने जीवन में निच्चित ध्येय नहीं होगा तो ॐ महाचेतना उस मनुष्य के सभी सगे-स्नेही कुटुंब की चेतना मनोभाव द्वारा जानते है की वह सगा स्नेही यह मनुष्य के लीये क्या सोचता है और उन सभी की सोच इस मनुष्य के लीये कैसी है। फिर ॐ महाचेतना उस ध्येय हिन मनुष्य के लीये उसके रुनानु बंधन में बंधे मनुष्य, मित्रो, रिश्तेदारों के मनोभाव अनुसार इस ध्येयहिन मनुष्य का भावी निर्माण का कार्य शुरू कर देते है।


     यदी इस ध्येयहिन मनुष्य के सभी रिश्तेदारो से अच्छे सबंध हो तो उसके लीये अच्छा सोचेगा अच्छा मनोभाव रखेगा तो इस ध्येय हिन मनुष्य के लीये कुछ सकारात्मक हो सकता है। किंतु मनुष्य का निच्चित जीवन ध्येय ना हो ऊपर से सभी रिश्तेदारों से सबंध ख़राब कीये हो जिन से सबंध बिगड़े हो उनकी चेतना द्वारा ॐ महाचेतना को जो संकेत मिले उस प्रकार से ॐ महाचेतना इस ध्येयहिन मनुष्य के जीवन में हस्तक्षप करने लगाते है। और ध्येयहिन मनुष्य बहोत ही परेसान हो जाता है इस ध्येयहिन मनुष्य मुसीबतों के भवर में फंस जाता है।


     जीस मनुष्य को अपना निच्चित जीवन ध्येय है वह एक अपनी आँखों से देख ते मनुष्य जैसा है। जो अपनी आँखों से देख कर अपने मार्ग को खोज कीये हुए ध्येय तक पहोच जाता है। और जीस मनुष्य को अपना ध्येय नहीं वह एक अंधे मनुष्य जैसा है उसको पता नहीं कहा जाना है इस अंधे को जो मनुष्य मिले वह सब इस ध्येयहिन् अंधे को गोल गोल फिराते है। और वह ध्येयहिन् अँधा मनुष्य भटकता ही रहता है वह कही नहीं पहोच सकता है।


     विज्ञान द्वारा जो शोध-संसोधन होते है उसके पीछे भी चेतना और ॐ महाचेतना का गठबंधन ही कारणभुत होता है। कोई भी मनुष्य जन समुदाय की सुख सुविधा के लीये विज्ञान के शोध-संसोधन लगा में हुआ है मनुष्य का जीवनमंत्र जीवनध्येय ही उसकी विज्ञान की शोध-संसोधन है। तो उसकी छाप भी उसकी चेतना पर द्र्ठ होती है और वह शोध-संसोधन करने वाला मनुष्य जीस को सभी वैज्ञानीक कहते है उसको उसकी चेतना द्वारा ॐ महाचेतना योग्य मार्गदर्शन करते है। वैज्ञानीक मनुष्य को शोध-संसोधन के लीये जरुरी नएनए विचार और प्रेरणा ॐ महाचेतना उस वैज्ञानीक को उसकी चेतना द्वारा देते है। उस वैज्ञानीक को जरुरी सामग्री और शोध-संसोधन के लीये जरुरी धन ॐ महाचेतना की कृपा द्वारा ही दुसरे मनुष्यों द्वारा मील जाते है। शोध-संसोधन बिना रुके चलता ही रहता है और अंत में वह वैज्ञानीक ॐ महाचेतना की कृपा से अपना शोध-संसोधन पूर्ण करता है। इस विश्व में सभी वैज्ञानीक शोध-संसाधन मनुष्य के अंतर की चेतना और ॐ महाचेतना के गठबंधन द्वारा ही संभव बनता है।


     सनातनधर्म में कहा गया है भक्ति करो भक्ति करो यदी भक्ति करो तो भगवन भी मील जाते है। आज तक कीसी ने प्रश्न नहीं कीया की भक्ति क्या है? और भगवन कौन है? जो भगवान है वही सभी व्यक्ति का निच्चित जीवनध्येय है भाग्य सवारने वाला ही भगवन जो मनुष्य का कोई भी ध्येय हो उसको ही भगवान कहते है। जीस ध्येय को प्राप्त करने को महेनत या संघर्स करना पड़े उसे कहते है भक्ति और जो कोई भी मनुष्य उसका निच्चित जीवन ध्येय यानी उसके भगवान निच्चित करे और उन्हें प्राप्त करने के लीये महेनत करे यानी की भक्ति करे उस मनुष्य ध्येय सिद्धि यानी की उसके भगवान मील ही जाते है।


       सुख का मार्ग–  ज्ञान, ध्येय, संकल्प,  कर्म, फल, कृतज्ञता, परमानंद।

       दुःख का मार्ग–   अज्ञान – प्रारब्ध – वैराग्य – अकर्म – आभाव – फरीयाद – हीनता।


      मनुष्य अपनी पांच दिव्येंद्रिय मनोभावना काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया  द्वारा अपनी एक अलग सृष्टि की रचना करता है।

काम= यदी मनुष्य में “काम” की भावना ना हो तो मनुष्य आपस में स्त्री- पुरुष की जोड़ी बना पाते? संतान प्राप्ती कर पाते? क्या एक नर-मादा के काम-प्रणय  बिना सृष्टी की कल्पना हो सकती है? 


क्रोध= यदी मनुष्य में “क्रोध” की भावना न हो तो मनुष्य में रक्षा का स्वभाव कहा से होता? क्रोध भावना के बीना मनुष्य अपने परिवार का, अपना, अपनी माल मीलकत का, अपने धर्म संस्कार का, अपने राष्ट्र मातृभूमी का रक्षण कैसे कर शकता है?


लोभ= यदी मनुष्य में “लोभ” की भावना ना हो तो मनुष्य थोडा थोडा इकट्ठा करके अपनी संपति बसा शकता? लोभ भावना के आभाव में मनुष्य कुछ संग्रह ही न करता, तो माल मीलक्त ही ना होते सुख-सुविधा ही न होती मनुष्य की सभ्यता संस्कार भी न होता, लोभ भावना के बिना मनुष्य क्या आज की मानव सभ्यता के शिखर तक पहूचता?


मोह= यदी मनुष्य में “मोह” की भावना ही ना हो तो क्या एक ही जोड़ी जीवन भर प्रेम पूर्वक एक दूसरे को समर्पित रह सकती है? क्या परिवार में सगे-स्नेही ओ में मधुर रिश्ते बने रह सकते है? मनुष्यों के आपसी सम्बंधो के बिना क्या समाज व्यवस्था सभ्यता का विकाश हो सकता है?


माया= यदी मनुष्य में “माया” की भावना ही ना हो तो मनुष्य को भौतीक सुख सुविधा ,माल मीलक्त, पत्नी परिवार संतान, धर्मकार्य आदी कार्यो में रसरुची ही ना हो मनुष्य को संसारीक भोग विलाश में रसरुची ना हो तो क्या मनुष्य विविध शोध-संशोधनों द्वारा आज के विकशीत सभ्य समाज तक पहुचता?


मनुष्य और सृष्टी के सभी जीवमें “काम” “क्रोध” “लोभ” “मोह” “माया” यह पांचो मनोभावना है इसी लीये प्रकृति के विविध रंग है मनुष्य जीवन में इतने उतर चदाव है। सृष्टी के सभी जीवो में यह पांचो मनो भावनाए न होती तो यह सुन्दर सृष्टि ही कहा से होती?


       किंतु एक बात सत्य सनातन है की मनुष्य के जीवन में यह पांचो मनोभावना ओ का समन्वय ही वैकुंठ स्वर्ग जैसा सुख उत्पन्न करती है। मनुष्य जीवन में यह पांचो मनोभावना ओ में से एक मनोभावना का धर्म नाम दमन भी मनुष्य के स्वभाव में विकृति उत्पन्न करता है। मनुष्य जीवन में यह पांचो मनोभावना ओ में से एक भी मनोभावना का भोग-विलास नाम अतिरेक भी स्वभावगत “विकृति” उत्पन्न करता है। मनुष्य के जीवन में यह पांचो मनोभावना ओ का समतोलन ही एक स्वस्थ, समजदार, तटस्थ, सकारात्मक विचारधरा के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। और एसे विवेकी कर्मशील मनुष्य अपनी महेनत से जो भौतिक सुख सुविधा की सृष्टि का सर्जन करता है। 


    इस पृथ्वी पर मनुष्य जो भू-भाग पर रहता हो वहा के कुदरती आबोहवा के अनुसार खानपान एवं रहने बसने की सुविधा हो उस अनुरुप मनुष्य समुदाय की जीवनशैली हो जाती है। और वहा के भू-भाग की आबोहवा अनुरूप वहा बसने वाले मानव समुदाय की धार्मीक सामाजीक आर्थीक रीतीरीवाज का सांस्कृतिक विकाश होता है।


    इस दिव्य सृष्टि समस्त विश्व मे अलग अलग सभ्यता अपने प्रक्रुतिक परीवेश मे भिन्न भिन्न मत भिन्न भिन्न आचार विचार रखती है। इस मत मतांतर से ही एक सुसंस्क्रुत सभ्यता का दुसरी सुसंस्क्रुत सभ्यता से निरंतर संघर्श होता रहता है। किंतु हमे यह समजना होगा की ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने सभी मनुष्य को उनके समुदाय को अलग अलग संस्कार- स्वभाव दिया हुआ है इस लीये कोई भी मनुष्य या उनके समुदाय को एक दुसरे पर धार्मीक एवं सांस्कृतिक द्वेश नफरत रखने का कोई अधीकार नहीं है। यदी सभी मनुष्य का स्वभाव संस्कार उसके समुदाय के रीति रिवाज धार्मीक मान्यता एक समान हो तो इस विश्व में जो रंगबेरंगी सस्कृति है वह कहा से होती? जीवन के इतने सारे अलग अलग रंग कहा से होते? यदी सभी मनुष्य का स्वभाव जीवन सोच एक जैसा होता तो सबंधो में जीवन जीने में जो विविध रंग है जो उतार चढाव है जो जीवन जीने का आनंद है वह कहा से होता? मानव सभ्यता मे विश्वास करने वाले एवं सनातन विचार को मानने वाले सभी मनुष्य को दुसरे समुदाय के मनुष्य से एवं दुसरी सांस्कृतिक धार्मीक विचारधारा से द्वेश भाव या उंचनीच एवं भेदभाव रखना वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का महा अपराध है।


       मनुष्य अपने मन मे कीसी से द्रेशभाव नफरत ना रखे किंतु जो कर्म करता हो उसका जो धर्म संस्कार हो वह धर्मसंस्कार अनुरुप कर्म महेनत के कारण उसके जो आश्रित हो उनके अपने हित होते है। मनुष्य को दुसरे मनुष्य या उनके विरोधी धर्म संस्कार के कारण अपने एवं अपने आश्रीतो के हित पर अपने धर्म संस्कारो पर संकट हो तब संगठीत बन अपने हितो की रक्षा करना धर्म है। यदी कोई त्राहित मनुष्य या उनका समुदाय उनके स्वभावगत लक्षण से कोई भी दुसरे निर्दोष मनुष्य उसके कर्म अनुसार आश्रीतो को प्रताड़ित करता हो तो कभी अन्याय सहन नहीं करना है। कीसी भी प्रकार के दोष बिना कोई मनुष्य दुसरे निर्दोश मनुष्य या उनके समुदाय से द्वेश नफरत कर उन्हे प्रताडीत करे उनको हानी पहोंचाए तो वह दंडनीय अपराध है। कोई दोष के बिना कोई मनुष्य केवल अपने स्भावगत विकृति एवं अपने सांस्कृतिक धार्मीक मान्यता के प्रभाव मे दुसरे मनुष्यो एवं उनके धर्म समुदाय से अन्याय करता है तो,,,अन्याय सहन करने वाले मनुष्य एवं उनके धर्मसमुदाय पर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का कोप उतरता है। अन्याय सहन करने वालो को यातनाए सहनी पडती है। इस लीये कभी भी कीसी का अन्याय सहन नहीं करना चाहीए अन्याय का विरोध करना ही धर्म है। अन्याय कर्ता मनुष्य या उसका समुदाय कीतना ही शक्तिशाली हो किंतु उनका अन्याय शहन न कर उनके विरुध्ध आवाज उठा उनका विरोध कर उनसे लडाइ लडने वालो के साथ सदा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का आशिर्वाद होता है। अन्याय के विरुध्ध संगठीत बन लडाइ लडो विजय हमेशा सत्य की होती है संस्कारो की होती है।


       मनुष्य उसके अज्ञानता भरे पंथसंप्रदाय के वैराग्यक प्रभाव में आ अपना मूल स्वभाव छोड़ ज्यादा ही निर्माल्य नपुंशक विचारधारा से ग्रसित बन या लाचारी के वश या उसके निर्मल स्वभाव के कारण अन्याय सहन करता है। तो वह ज्यादा से ज्यादा दबता जाता है क्योकी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा निर्बल मनुष्य एवं उसके धर्म समूह को कभी सहाय नहीं करते है। किंतु मनुष्य अपनी निर्बलता को त्याग कर अन्याय विरुद्ध आवाज उठाये तो विजय हमेशा उसी की होगी उसमे कोई संका नहीं है। क्युकी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा जो समर्थ है जो सक्षम है जो अन्याय के विरुध्ध एकमत है उनका साथ सदाय देते है। इस विश्व के सभी मनुष्य अकेले नहीं है उनका कुटुंब है माता-पिता, पति-पत्नी, संतान, भाई बहन, सगा स्नेही है समाज, राज्य एवं राष्ट्र उसके साथ जुड़े हुए है मनुष्य सब से ताल मेल रख कर अपना जीवन जीने के लीये बाध्य है। जो भू-भाग की आबोहवा के अनुरुप खान-पान हो रीतरीवाज हो कुटुंब में माता-पिता या पत्नी, संतान कौटुंबीक भाइ बहन सामाजीक सगा स्नेही के साथ जो व्यवहार करे उसके सामाजीक नीती नियम हो उनका पालन करना ही धर्म है। हम जीस राष्ट्र के नागरिक अधीकार का भुगतान करते हो वह राष्ट्र के सविधान कायदे कानुन एवं नीती नियम का पालन करना पड़ता है। मनुष्य अपनी धर्ममान्यता के अनुसार जो सर्वोच्च इश्वरीय शक्ति को मानता हो या उस धर्मसमुदाय के धार्मीक श्रद्धा विश्वास के सभी नियम के पालन के लीये मनुष्य बाध्य है।


       समाज एवं राष्ट्र के धाराधोरण का पालन कर मनुष्य निर्भय बन कर अपने कुटुंब में समाज में अपना यथा योगदान दे सर्वांग विकाश कर सकता हो। राष्ट्र के नीती नियम कोई भी मनुष्य या उनके समुदाय को अन्याय कर्ता ना हो और राष्ट्र के मुख्य धारा मे अपने आपको जोडकर एक सामान्य मनुष्य अपने आपको या अपने समुदाय को सुरक्षित मानता हो। कोई भी बंधन के बिना मनुष्य या उसका समुदाय अपना सामाजीक विकाश एवं अपने धार्मीक आस्था के कार्य बिना भय कर शकता हो यह राष्ट्र एवं समाज न्याय व्यवस्था ही रामराज्य है। जहा सभी मनुष्य अपनी धार्मीक, सामाजीक, एवं राष्ट्रीय कर्तव्य निर्भयता से प्रमाणीक ता से सभी से मेलमीलाप से पुर्ण कर सके एसी राष्ट्र एवं समाज व्यवस्था ही धर्म है।


       मनुष्य को कीसी भी दुसरे मनुष्य से अन्याय हो या एक समुदाय को दुसरे समुदाय से अन्याय हो धर्मसंस्कार पर संकट हो तो निती कहती है की सबसे पहले अपने राष्ट्र के नितीनियम एवं कायदे-कानून हो उन मे विश्वास रख कर न्याय प्राप्त करने के लीये प्रयास करना चाहीए। यदी राष्ट्र के राजा या राष्ट्र के नितीनियम प्रताडीत समुदाय को न्याय देने में असमर्थ है तो अन्याय शहनकर्ता मनुष्य या उनके समुदाय को अन्याय कर्ता मनुष्य या उनके समुदाय का पूर्णरूप से सामाजीक आर्थिक बहिस्कार करना चाहीए यही नितीनियम है धर्म है। आर्थीक बहीश्कार करने से अन्याय कर्ता दोषी मनुष्य या उनका धार्मीक समुदाय आप से या आपके समुदाय से हिंसक बनता है तो राष्ट्र के जो धाराधोरण है नितीनियम कायदे कानुन है उस पर विश्वास कर संयम से काम ले राष्ट्र के धाराधोरण कायदे कानून के अनुसार उन विरोधी ओ का प्रतिरोध करे।


       राष्ट्र के धारा धोरण निती नियम या कायदे कानुन राष्ट्र के नागरीक मनुष्य या उनके समुदाय को रक्षण देने मे असमर्थ हो तो पहले सामाजीक धार्मीक एकता बनानी चाहीये। एक होकर अपनी पसंद या नापसंद त्याग कर समाज के बुद्धिजीवी सर्व हीत मे जो निर्णय करे उसका मान सम्मान रख सबको एक हो एकजुट हो अपने समुदाय समाज के हीत मे हो वह कार्यवाही करनी चाहीये। नितीन्याय के अनुसार धर्म के अनुसार अन्याय के विरुध्ध संघर्ष करना चाहीए मातृभूमी छोड़ने से अच्छा मातृभूमी में मील जाना वही श्रेष्ठ है वही धर्म है। जो धर्मसमुदाय के लोग अपने ही धर्मसमुदाय के विस्थापीत प्रताडीत लोगो के समर्थन मे आगे नही आते है वो धर्मसमुदाय के लोग स्वंम् अपना एवं अपनी आने वाली नइ पीढी का अहीत करते है।


       मातृभूमी संकट में हो, मूल धर्मसंस्कार संकट में हो तब राष्ट्रीयता एवं धर्मसंस्कार के लीये सभ्य लोगो को एक हो आपसी धर्मएकता से संकट का सामना करना पड़ता है। समूह में एक सामान बर्ताव को ही एकता कहा जाता है मनुष्य को एक समान बर्ताव का प्रेरक तत्व है एक समान धर्म मान्यता जो सनातन धर्म सम्विधान श्री रामायण से ही सम्भव है। मातृभूमी के मूलधर्म संस्कार पर संकट हो तब वह भूमी के मूल धर्मनिवासी समुदाय संकट समय अलग अलग मत राख एक राय नहीं होंगे तो निच्चित ही वह मूलनिवासी अपनी मुलभूमी एवं मूल धर्मसंस्कार को नष्ट कर देंगे।


       विश्व में कीसी भी भौगोलीक स्थान पर रहने वाले मनुष्य का संकट समय एक सामान बर्ताव न कर पाने का मुख्य कारण –‘अपने मूल धर्म संस्कार के नीती नियम का पालन नहीं करना एवं अपने मूल मातृभूमी के सांस्कृतिक, राजकीय इतहास की अज्ञानता’ है। जो प्रजा अपने भव्य भूतकालीन धार्मीक, सांस्कृतिक एवं राजकीय धरोहर का ज्ञान अपनी नयी पीढ़ी में सिंचन नहीं करेगी और अपने प्राचीन धर्म विचारधारा के बदले निजी व्यक्तिगत विचारधारा से उत्पन निजी पंथसंप्रदाय के अवैज्ञानीक अप्रकृतीक नियम पालन से एक पंगु वैराग्यक धर्म विचारधारा के वाहक बनेगे तो वह प्रजा का खंडखंड हो सर्वनाष होना निच्चीत है।


       जो प्रजा अपने मूल धर्मसंस्कार, संकृति एवं भव्य राजकीय इतिहास के प्रति जागरूक है – जो अपने भौगोलीक स्थान की आबोहवा अनुरूप प्रकृतीक रूप से विकसित सनातन विचारधारा से उत्पन धर्मसंस्कार का पालन करते है – वही धर्म समुदाय सर्वाग सुखी समर्थ बन आदर्श रामराज्य की स्थापना कर पाते है।


       आज विश्व में ज्यादातर सभी राष्ट्र में लोकतांत्रिक  सरकार है सभी राष्ट्र में रहने वाले सभी मनुष्य अपनी विवेक बुध्धी से अपना नागरीक अधीकार का प्रयोग कर चुनाव मे अपना मत दे बहुमती से राष्ट्रनिर्माण के लीये सरकार का चयन करते है। किंतु यदी कोई राजनैतीक पक्ष अपने ही राष्ट्र के बहुमत नागरीक उनके धर्म समुदाय के विरुद्ध हो तो सभी लोगो को एकजुट हो उस राष्ट्र द्रोही धर्मद्रोही राजनैतीकपक्षका बहीश्कार कर ना चाहीए। अपनी पसंद नापसंद अपने व्यक्तिगत अहं आकंक्षा का त्याग कर राष्ट्रहित-धर्महित के लीये राष्ट्र सरकार बनाने के लीये अपना मत अपना अभिप्राय जरुर देना चाहीए। राष्ट्र के हीत मे धर्म के हीत मे अपना मत अभिप्राय देना सभी का धर्मदाइत्व है। राष्ट्र सरकार चयन के लीये राष्ट्र के सभी नागरीक मनुष्य को समय खर्च कर यह धर्म कार्य करना ही चाहीए। जो प्रजा अज्ञान के अंधकार में डूबकर अपने मातृभूमी के मूलधर्म संस्कार के घोरविरोधी हो एसे राजनैतिक पक्ष का समर्थन कर स्यम अपने हाथो अपने धर्मसमुदाय, राष्ट्र, मातृभूमी का सर्वनाष करते है।


       विश्व में बहुत से राष्ट्र में सामाजीक एवं धार्मीक भिन्नता के कारण वर्ग विग्रह होते रहते है। एक समुदाय दुसरे समुदाय से हिंसक संघर्ष करता है राष्ट्र की संरक्षण रक्षण व्यवस्था छिन्नभिन्न होती रहती है। तब एक राष्ट्र के जो लाचार-प्रताड़ित अन्याय सहन करने वाले समुदाय विश्व के दुसरे राष्ट्र में आश्रय लेने के लीये विवश होते है। मनुष्य धर्म और मानवता के लीये दुसरे राष्ट्र ऐसे प्रताडीत विस्थापीत मनुष्य समूहों को निराश्रित मानकर अपने राष्ट्र में स्वीकार कर राजनैतीक आश्रय देते है।


       किंतु निती और न्याय यह कहता है की आश्रय देने वाले राष्ट्र के नितीनियम एवं राष्ट्र के बहुमत समुदाय के धार्मीक सामाजीक जीवन अनुरूप निराश्रित समुदाय के धार्मीक सामाजीक विचार नितीनियम या रुढी न हो तो समय बीतते आश्रय देने वाले राष्ट्र या राष्ट्र के बहुमत समुदाय को धार्मीक सामाजीक संकट हो सकता है। एसे विरोधी संकट रुप निराश्रित समुदाय को कभी भी कोई भी राष्ट्र सरकार को आश्रय देना उचीत नही है। किंतु निराश्रित समुदाय आश्रय देने वाले राष्ट्र के अनुकूल जीवन पद्धति अपनाए एवं आश्रय दाता राष्ट्र में रहने वाले बहुमत समुदाय के धर्मिक मत सामाजीक विचार नितीनियम अपनाकर अपने धार्मीक मत सामाजीक विचार नितीनियम का त्याग करे तो उन प्रताडीत विस्थापीत समुह के लोगो को आश्रयदेना वह राष्ट्र की राजनैतीक कर्तव्य बनता है। 


   यदी हम मानव स्वभाव एव प्रक्रुति नियम को समज ले सभी मानव सभ्यताओ का आदर करे धर्म को पंथ सम्प्रदायो से न जोडकर वैशवीक मनवता संस्कारो के मापडंडो से जोडे तो समस्या ही कहा है? किंतु हम ना मानव स्वभाव को जाने न ही प्रक्रुति नियम को समजे बस अपने अपने अप्राक्रुतिक पंथ सम्प्रदायों के चित्रवीचीत्र मान्यता ओ के भंवर में डूब हम अपना प्रकृतिक मनुष्यत्व खो देते है। हम सब मै सत्य मेरा पंथ सम्प्रदाय सभ्यता ही सत्य और दुसरे सब पंथ सम्प्रदाय सभ्यता असत्य की मनोदशा मे डूब मनोविकृत बन जाते है। इस मनोविकृत मनोदशा के आवेश में कब हम एक सभ्य मनुष्य से आसुरी नरपिचाश [ जेहादी ] बन जाते है। या फीर मिथ्या तत्वज्ञान के वाहक हो पंगु भिरु वैरागी बन अपने धर्म, समाज, राष्ट्र के लिये स्वयं संकट बन जाते है वह स्वयं हमे भी ज्ञात नहीं रहता है।


     हमे स्वयं अपने विवेक बुध्धि से सनातन सत्य को समजना होगा और पंथ सम्प्रदाय का अस्विकार कर सत्य का स्विकार करना होगा आदि अनादि श्री सत्य सनातन धर्म को धारण करना ही होगा। जब हम सभी सभ्यताओ का आदर कर सत्य धर्मपथ पर अग्रेसर होंगे तब ही मानव सभ्यता का सुवर्ण सुर्योदय होगा।