हाइकू

धर्म प्रशस्ति  भारत प्रशस्ति

   हाइकूहाइकू का 5+7+5=17 अक्षर का बंधारण होता है एवं प्रत्येक हाइकू का अपने आप मे एक स्वतंत्र गूढ़ अर्थ होता है। धर्म प्रशस्ति मे सनातन धर्म आधारित 155 हाइकू एवं भारत प्रशस्ति मे भारत क़े गौरवमय इतिहास संबधीत 156 हाइकू है। दोनो प्रशस्ति मे 155+156 = 311 हाइकू है।

धर्म प्रशस्ति

लिख दिपक सत्य धर्म ज्ञानम आदि अनादि ।। 1

 

प्रथम वंदे गणेश गजानंद रिध्धि सिध्धि सं ।। 2

 

 

ॐ आदिशक्ति अखंड अगोचर चौद भुवनी ।। 3

 

महा चैतन्य – श्री जगत जननी अंबे भवानी ।। 4

 

श्री ब्रह्मदेव सृष्टि रचनाकार ज्ञान संस्कार ।। 5

 

श्री हरिविष्णु सृष्टि पालनकर्ता श्रम कर्तव्य ।। 6

 

श्री सदाशिव – सृजन विनाषाय – युध्ध आध्यात्म ।। 7

 

त्रिगुणी शक्ति – महामाया वैष्णवी – धर्म धारिणी ।। 8

 

धर्म ज्ञानम – विणा सरस्वती च – धर्म संस्कार ।। 9

 

धर्म कर्तव्य – धारा महालक्ष्मी च – धर्म फलाय ।। 10

 

धर्म युध्धाय – ज्वाला भद्रकाली च – धर्म विजय ।। 11

 

पुराण ज्ञान – श्री दैवी भागवत – सर्वोच्च शक्ति ।। 12

 

ब्रह्म पुराण – ब्रह्मचर्य बौध्धिक – ज्ञान पुरुष ।। 13

 

विष्णु पुराण – भोग वैकुंठ सुख – कर्म पुरुष ।। 14

 

शिव पुराण – योग ध्यान आध्यत्म – सिध्ध पुरुष ।। 15

 

पंच शरीर – सोलह शक्ति चक्र – शिव ज्ञानम ।। 16

 

जिवन सत्य – सप्तपद आध्यात्म – शिवत्व मोक्ष ।। 17

 

जिवन उदय – प्राप्त पंच इंद्रिय – अखंड धारा ।। 18

 

धारा प्रभाव – निर्माणम स्वभाव – द्रढ़ धारणा ।। 19

 

धारणा मय – मन आत्मा शरीर – स्व कर्मयोग ।। 20

 

योग कर्मण्ये – संक्षिप्तम समय – लिन ध्यानम ।। 21

 

ध्यान गहन – विस्तृत स्व चेतना – सुन्य समाधि ।। 22

 

लिन प्रकृति – सिध्ध पंच समाधि – पद अघोरी ।। 23

 

अघोरत्वम – सूक्ष्म विराटानंद – शिवत्व मोक्ष ।। 24

 

ध्यान संगीत – लिन नृत्य समाधि – नटराजना ।। 25

 

ध्यान प्रणय – लिन प्रेम समाधि – अर्धनारेश्व ।। 26

 

ध्यान शिवाय – लिन कर्म समाधि – कुबेरपति ।। 27

 

धयान त्रांडवा – लिन युध्ध समाधि – महारुद्राय ।। 28

 

ध्यान ॐकार – लिन राम समाधि – महाचैतन्य ।। 29

 

राम चेतना – लिन महाचैतन्य – शिवलिंगम ।। 30

 

शिव त्रांडवा – श्री सत्य शक्तिपीठ – विरभद्राय ।। 31

 

धर्म रक्षार्थ – नव दुर्गा पार्वती – विनाष दुष्ट ।। 32

 

रण चंडिका – चंड मुंड मर्दन – चामुंडा नमः ।। 33

 

वाघ वहिनी – महिषा श्रु मर्दनि – असुर त्राहि ।। 34

 

ॐ महाकाली – चंड प्रचंड रूप – धर्म विजय ।। 35

 

सुख समृध्धि – रक्त बली प्रसाद – दैवी प्रसन्न ।। 36

 

भुमि भैरवी – ज्वालाजी छिन्नमस्ता – आदि वाराहि ।। 37

 

तिर्थ यात्राय – श्री दैवी शक्तिपीठ – गिरि कंदरा ।। 38

 

गण रक्षक – ॐ भेरवाय नमः – काल बटूक ।। 39

 

स्व मंगलम – द्वादश ज्योतिर्लिंग – अभिषेकम ।। 40

 

श्री गणेशाय – शिवशक्ति पुत्रम – कर्तिकेयम ।। 41

 

इंद्र नारद – सप्तर्षि विश्वकर्मा – ब्रह्म सुताय ।। 42

 

मच्छ कच्छप – वराह वामनम – नरसिंहम ।। 43

 

परशुराम – श्रीराम श्रीकृष्णवे – युग देवतं ।। 44

 

श्री हरिविष्णु – युग अवतारम – पद्मनाभम ।। 45

 

राधे गोविंद – गोकुल वृंदावन – प्रेम आध्यत्म ।। 46

 

बरबरीक – ठाकुर श्रीजी नमः – श्री चारधाम ।। 47

 

श्रीमद गीता – श्रीकृष्‍ण दिव्य ज्ञान – योगेश्र्वरम ।। 48

 

दुष्ट दलन – ॐ हनुमंत नमः – श्री रामभक्त ।। 49

 

शक्ति श्रीयंत्र – सकल कालयात्रा – ब्रहमांड उर्जा ।। 50

 

उर्जा जागृते – संस्कृत श्लोक मंत्र – इष्ट देवतं ।। 51

 

प्राण प्रतिष्ठा – विधी चल अचल – देव स्थपना ।। 52

 

नित्य दर्शन – रद्य अंतर शुध्ध – देव मंदिर ।। 53

 

प्रभात संध्या – पुष्प दिप आरती प्राक्षालनम ।। 54

 

पंच अमृत – अन्नकूट प्रसाद – देव प्रसन्न।। 55

 

शिल्प स्थापत्य – सर्वजन सुखाय – वास्तुदेवतं ।। 56

 

वेद पुराण – श्रीरामायण गीता – धर्म ग्रंथम ।। 57

 

नृत्य भजन – कथा सत्संग यात्रा – धर्म उत्सव ।। 58

 

कुंभ त्रिशूल – ॐ स्वस्तिक तिलक – धर्म प्रतिक ।। 59

 

योग आसन – ध्यान प्राणायम – दिव्य कलाप ।। 60

 

गंगा यमुना – नर्मदा गोदावरी – कृष्णा कावेरी ।। 61

 

सिंधु ब्रपुत्रा – नव सरिता नमः – श्री सरस्वती ।। 62

 

शनि शुक्राय – पृथ्वी बुध्ध मंगल – रहुवे केतु ।। 63

 

सूर्यआदित्य – नवग्रह देवतं – गुरुवे नमः ।। 64

 

अग्नि आकाश – वायु वरुण भूमि – तत्व प्रकृति ।। 65

 

बिली पिपल – तुलशी बरगद – तरु प्रक्रुति ।। 66

 

वृक्ष अरण्य – मुक्त जिवन लीला – दिव्य प्रकृति ।। 67

 

पवित्र क्रिया – यज्ञ होम हवन – वंदे प्रकृति ।। 68

 

 अंतरनाद – संकल्प सिद्ध देव – शाबर मंत्र ।। 69

 

संकल्प सिध्धि – चोसठ योगमाया – युग योगिनी ।। 70

 

प्रथम भोग – नवचंडि हवन – स्थान देवता ।। 71

 

स्थान देवता – जुजारू धर्मयोध्धा – धर्म रक्षक ।। 72

 

रक्षार्थ धर्म – विरगती प्राप्तम – नाग देवतं ।। 73

 

तिर्थ यात्राच – धर्मण्ये दान पूण्य – यक्ष देवतं ।। 74

 

धर्म उत्थान – गृहस्थ सुख संग – गांधर्व देव ।। 75

 

संसार त्याग – वैराग्यम संन्याशी – किन्नर देव ।। 76

 

संसार प्रित – लिप्त विषय भोग – पितृ देवतं ।। 77

 

पितृ तर्पण – पवित्र गंगा गया – प्रयागराज ।। 78

 

मातृ तर्पण – श्रीसरस्वती बिंदु – सिध्धपुरम ।। 79

 

पाप कर्मण्ये – भुत प्रेत पिशाच – राक्षस योनी ।। 80

 

परम गति – ज्ञं गरुड़ पुराण – मृत्यु संस्कार ।। 81

 

तत्व चिंतक – निज़ विचार धारा – पंथ स्थापना ।। 82

 

नर पिशाच – पंगु भिरु वैरागी – पंथ भक्ताना ।। 83

 

आदि अनादि – श्री सत्य सनातन – शाश्र्वत धर्म ।। 84

 

मनुष्यत्वम – पूर्ण पुरुषोत्तम – धारण धर्म ।। 85

 

समस्त विश्र्व – प्रखंड पंथजाल – धर्म श्रध्धाय ।। 86

 

सर्वोच्च शक्ति – ॐ जगत जननी – शाक्य धर्मम ।। 87

 

अंबे भवानी – ब्रह्मा विष्णु महेश – सनातनाय ।। 88

 

गायत्रि नम: – चार वेद संस्कृत – वैदिक धर्म ।। 89

 

अम्बिका नम: – चोविस भगवंत – जय जिनेन्द्र ।। 90

 

शिवलिंगम – संकल्प शिव ध्यान – शिव संप्रदा ।। 91

 

विष्णवे नमः – श्रीकृष्ण शरणंमं – वैष्णव मत ।। 92

 

जगत मिथ्या – हठ परम पद – नाथ भगवा ।। 93

 

धम्म बौध्धम – बुध्ध शर्ण गच्छामि – पंथ वैराग्य ।। 94

 

गुरु नानक – गुरु ग्रंथ साहिब – सिख्ख संप्रदा ।। 95

 

अबराहम – दश सूत्रिय ज्ञान – संप्रदाय ज्यू ।। 96

 

ईश्वर पुत्र – ज्ञानम बायबल – पंथ इसाई ।। 97

 

प्रकृति तत्व – निती नियम ज्ञान – चाइना ताओ ।। 98

 

अग्नि पुजस्य – विस्थापित फ़ारस – लुप्त जर्थुष्टि ।। 99

 

नष्ट सभ्यता – इंका आज्तेक माया – धरा प्राचिन ।। 100

 

अंतिम साँस – पूज्य मोर आदित्य – पंथ यज़दि ।। 101

 

नबि मम्मद – कुराण शरियत – पंथ इस्लाम ।। 102

 

तंत्र साधना – गोचर अगोचर – प्रबल विका ।। 103

 

प्रकृति पुत्र – विलुप्त वनवासी – सभ्यता दंश ।। 104

 

ओजा त्रांत्रिक – भय लालच पिड़ा – अंध श्रध्धाय ।। 105

 

भक्त संकरा – हठयोग संन्याश – मठ अखाडा ।। 106

 

काम क्रोधाग्नि – लालच मोह माया – मनो भावना ।। 107

 

हठ सन्याशी – मर्दन मनोभाव – कुंभ मिलन ।। 108

 

सर्व मनुष्य – पंच मनो भावना – तिन गुणम ।। 109

 

अराजकता – भय भ्रम जंजाल – तमो गुणम ।। 110

 

छल कपट – अति महत्वाकांक्षा – रजो गुणम ।। 111

 

निज आनंद – स्विकार रंगमंच – सतो गुणम ।। 112

 

ब्रह्मचर्यम – गृहस्थ वानप्रस्थ – सत्य संन्याश ।। 113

 

बटूक सत्य – त्रेता द्वापर कलि – आयु रहश्य ।। 114

 

सोल संस्कार – धर्म पथ दर्शक – ऋषि ब्राह्मण ।। 115

 

व्यवस्थापक – भूमि धर्म रक्षक – विर क्षत्रिय ।। 116

 

दान पुण्यच – अर्थम उपार्जना – कर्तव्य वैश्य ।। 117

 

अकर्मी भिक्षु – अधर्म आचरण – मलेच्छ शुद्र ।। 118

 

शूद्र वाल्मिकी – लिख ज्ञान महान – श्री रामायण ।। 119

 

भिल शबरी – भोजन मिठे बेर – समरूपता ।। 120

 

कर्तव्य धर्म – शिखर मापदंड – श्री रामायण ।। 121

 

शाश्र्वत धर्म – न भूतो न भविष्य – राम चरित्र ।। 122

 

आज्ञाकिंतह – मात पिता श्रीगुरु – श्री रामचंद्र ।। 123

 

वचन निष्ठा – भात्रु बांधव सखा – श्री रामचंद्र ।। 124

 

पालन कर्ता – व्रत एक भार्याय – श्री रामचंद्र ।। 125

 

धर्म पालन – युध्ध नियम त्याग – श्री रामचंद्र ।। 126

 

असुर कुल – अधर्म विनाषक – श्री रामचंद्र ।। 127

 

यथार्थ वध – त्राड्का बाली रावण – धर्म पालन ।। 128

 

स्त्री शिलरक्षा – केशरीया कर्तव्य – गिध्ध जटायू ।। 129

 

 

शौर्य जागृत – ज्ञानी जामवंतजी – शंखनादम ।। 130

 

हनुमंतेय – भरत व लक्ष्मण – तपस्वी त्यागी ।। 131

 

एकात्म लक्ष – नल निल अंगद – राम कर्तव्य ।। 132

 

भालू वानर – एकात्म रामकाज – गिध्ध गिलैरी ।। 133

 

राजा सुग्रिव – अहं सेना अर्पण – श्री रामचंद्र ।। 134

 

अनुशासन – विराट कपि सेना – स्था रामराज्य ।। 135

 

धर्म आक्रांता – रामराज्य स्थापक – श्री रामचंन्द्र ।। 136

 

धर्म विजय – दिपावली उत्सव – रामाभिषेक ।। 137

 

प्रचंड शक्ति – रोमन यूरो राज्य – रामनामह ।। 138

 

अरबी धरा – पवित्र रामदान – रामनामह ।। 139

 

पंथ इस्लामी – जावा सुमात्रा माल्य – संस्कृति राम ।। 140

 

धम्म बौध्धम – हिंदी चिनी प्रदेश – रामायणम ।। 141

 

समस्त विश्र्व – श्रीराम चरित्रम – अभिभूतम ।। 142

 

श्री सनातन – धर्म संविधानम – श्री रामायण ।। 143

 

कश्यप अत्रि – गौतम जदमग्नि – भृगु भाद्राज ।। 144

 

स्था सनातन – वशिष्ठ विश्वामित्र – स्वयंभूमनु ।। 145

 

पंच कर्तव्य – आध्यात्म सनातन – एकात्म सत्य ।। 146

 

श्रम कर्तव्य – भोजन आनंदम – आतिथ्य धर्म ।। 147

 

काम कर्तव्य – प्रणय नर मादा – सुख शरीरं ।। 148

 

मोक्ष प्राप्तिम – संतान वेलवंश – धर्म संस्कारी ।। 149

 

भार्या संतान – स्वभूमि धर्म रक्षा – आक्रमकता ।। 150

 

शुभ संकल्प – उच्च जिवन लक्ष्य – परमार्थम ।। 151

 

पूर्ण तृप्तता – कृतज्ञता वंदन – ॐ आदिशक्ति ।। 152

 

धर्म पिताच – मम मातृ संस्कृति – जय भारत ।। 153

 

जय भारत – जय जय श्रीराम – जय भवानी ।। 154

 

ॐ जयकारा – श्री सत्य सनातन – धर्म की जय ।। 155

भारत प्रशस्ति

 

लिख दिपक – भव्य गौरव गाथा – भारतवर्ष ।। 156

 

प्रकृति पुत्र – यज्ञ मूर्ती पूजन – आदि सभ्यता ।। 157

 

सुमेरी ग्रिक – मोंहे द्रविड़ ब्राह्मि – मूर्ती पूजक ।। 158

 

जंबू इलावृ – यूरो आर्य संस्कृत – यज्ञ वैदिक ।। 159

 

वेद पुराण – उदय धर्म आदित्य – आर्यावृतम ।। 160

 

धर्म स्थापना – नव सहस्त्र वर्ष – सप्तर्षि सवं ।। 161

 

वैदिक ज्ञान – सप्त विध्या विज्ञान – यज्ञ आहूति ।। 162

 

धर्म विज्ञान – गुरुकुल आश्रम – ऋषि सप्तर्षि ।। 163

 

सगर पुत्र – विभक्ते दशो दिशा – धर्मण्ये विश्र्व ।। 164

 

श्री रामायण – सनातन संस्कार – राम चरित्र ।। 165

 

महाभारत – वंदे जगत गुरु – श्रीकृष्ण गीता ।। 166

 

धर्मी पांडव – पांच सहस्त्र वर्ष – कलि युगाब्द ।। 167

 

धर्मी भरत – चक्रवर्ती राजन – भारतवर्ष ।। 168

 

जिन संस्कार – ज्ञानम आग्म निग्म – म्हाविर प्रभु ।। 169

 

वैराग्य योगी – हठयोग साधना – गुरु गोरख ।। 170

 

प्रखंड धम्म – ज्ञान उच्च त्रिप्टक – ध्यानस्थ बौध ।। 171

 

धर्म ज्ञानम – वेदांत भाष्य मिंशा – आदि शंकरा ।। 172

 

विध्या अभ्यास – तक्षशिला नालंदा – ज्ञान वंदन ।। 173

 

सभ्य भारत – सोलह जनपद – सुवर्ण युग ।। 174

 

एक भारत – विजय धर्मरथ – अजातशत्रु ।। 175

 

यवन घात – रक्षा भारतवर्ष – राजा पोरस ।। 176

 

भाव बंधुत्व – राष्ट्रप्रेम जागृत – निती चाणक्य ।। 177

 

अश्र्वमेधम – सम्राट चंद्रगुप्त – भारत मौर्य ।। 178

 

धम्म शरणं – भष्म धर्म संस्कार – चंड अशोक।। 179

 

मर्दन धम्म – पुनः धर्म स्थापना – विजय शुंग ।। 180

 

ब्राह्मण ग्रंथ – दूषित धर्म ज्ञानम – यवन हूण ।। 181

 

तत्व चिंतक – हूणराज्य कूशाण – राजा कनिष्क ।। 182

 

पुनः जागृत – लिख धर्म पुराण – सातवाहना ।। 183

 

विश्र्व विजय – विर विक्रमसेन – धर्म स्थापना ।। 184

 

श्रीशक्तिपीठ – द्वादश ज्योतिर्लिंग – पुन स्थापना ।। 185

 

वराहम्रहि – तिथी काल गणना – विक्रम सवं।। 186

 

अवंति जय – सातवाहन शक – ब्रह्म क्षत्रप ।। 187

 

शक धर्मण्ये – क्षत्रप अग्निवंश – ब्रह्म वशिष्ठ ।। 188

 

शक सोलंकी – चौहाण परमार – प्रतिहारम ।। 189

 

सहस्त्र वर्ष – राज्य धर्म सम्राज्य – स्वर्ण भारत ।। 190

 

गंग पल्लव – शुंग सातवाहन – गुप्त गुहिल ।। 191

 

चोल चन्देला – कालचुरी कार्कोट – कण्व कदंब ।। 192

 

पुश्यभूतिम – कुशाण कामरुप – पाल पांडया ।। 193

 

रोरा कापिशा – मैत्रक वाकटाक – सिंधब्राह्मणा ।। 194

 

काबुलशाहि – राष्ट्रकूट चालुक्य – भाग्य भारत ।। 195

 

हूण मर्दना – चक्रवर्ती सम्राट – समुद्रगुप्त ।। 196

 

लिख सहित्य – विजय अश्र्वमेघ – हर्षवर्धना ।। 197

 

आयुर्वेदम – ज्योतिष गणितज्ञ – खगोल शाश्त्र ।। 198

 

आर्यभट्टम – श्रुश्रुति पतंजलि – विज्ञान ऋषि ।। 199

 

राजशेखरा – पाणिनी कालिदास – भृत्रारि भोज ।। 200

 

दिव्यसाहित्य – रस राग आध्यात्म – सेवा संस्कृत ।। 201

 

धर्म विजय – निर्माण देवालय – भारतवर्ष ।। 202

 

सूर्य मंदिर – श्रीशक्ति शिवालया – भव्य मंदिर ।। 203

 

पद्मनाभम – चतुर्भुज सुरेशा – विष्णु प्रसादा ।। 204

 

जिन शासन – सम्मेत शेत्रुंजय – जिनालयम।। 205

 

खंडन शाक्य – अध्वैत भग्वा पंथ – शंकराचार्य ।। 206

 

जागा अरब – बर्बर हिंसा पंथ – धर्म संकट ।। 207

 

कापिशा राज्य – हिंदूकुश गांधार – अजेय दुर्ग ।। 208

 

भेद बौध्धम – विरगती दाहिर – विनाश सिंध ।। 209

 

रक्षार्थ धर्म – अरब अभियान – त्रिदेव योध्धा ।। 210

 

कूटनितीज्ञ – क्षत्रप प्रतिहार – नागभट्टम ।। 211

 

गुहिल योध्धा – मलेच्छ सर्वनाशा – बाप्पा रावल ।। 212

 

कार्कोट योध्धा – मर्दन उम्मयद – ललितादित्य ।। 213

 

मलेच्छ वध – युध्ध निती तक्षक – विजयभव ।। 214


  धर्म पालक – राष्ट्रकुट राजन – अमोधवर्ष ।। 215


 

महान योध्धा – क्षत्रप प्रतिहार – मिहीर भोज ।। 216

 

वध खलिफा – अब्बासी तवल्लक – मूंछ मर्दन ।। 217

 

आदि वराह – मर्दन मजहब – भारत भुमि ।। 218

 

काबुल हिंदू – राजन जयपाल – धर्म प्रहरी ।। 219

 

लाहोर युध्ध – आनंद त्रिलोचन – जूजारु योध्धा ।। 220

 

सिंध मर्दन – मलेच्छ संहारक – भिम सोलंकी ।। 221

 

धर्म प्रहरी – शाकंभरी चौहाण – वाक्पति राज ।। 222

 

चंदेला राज्य – रक्षा धर्म संस्कार – विधयधर ।। 223

 

श्रीवस्ति राजा – लख मलेच्छ वध – सुहलदेव ।। 224

 

शैव संकल्प – वध मसुद गज्नि – भोज प्रमार ।। 225

 

धर्मण्ये युध्ध – बिस हिंदवा राज्य – हिंद विजय ।। 226

 

गज्नवी स्वाहा – युध्ध बहराइच – धर्म विजय ।। 227

 

 सुदूर पुर्व – विजय धर्मध्वजा – राजेंद्र चोल ।। 228

 

पुर्व मलय – जावा सुमात्रा बाली – हिंदू साम्राज्य ।। 229

 

लांगकाशुका – फुगान श्रीविजया – चंपा साम्रज्य ।। 230

 

चेनला बाली – खमेर राजहंता – मजापाहिता ।। 231

 

द्वा शह्स्त्राब्दि – विजय सनातन – धर्म साम्रज्य ।। 232

 

पुर्व दक्षिण – ज्वालामुख विक्राल – फटा प्रलय ।। 233

 

अग्नि त्रांडव – प्राकृतिक विपदा – महा विनाश ।। 234

 

क्षेत्र युरोप – प्रलय ठंड हिम – नष्ट संस्कृत ।। 235

 

क्षेत्र पच्चिमी – ध्वज रोम इसाइ – धस्त वैदिक ।। 236

 

भारतवर्ष – अकाल दश वर्ष – मृत्यु त्रांडव ।। 237

 

बचा भारत – ध्वस्त धर्म संकृति – वैराग्य जागा ।। 238

 

भक्त शंकरा – अखाडा वैराग्यम – गुरु भगवा ।। 239

 

भाव वैराग्य – पंगु धर्म संस्कार – अहिंसा धर्म ।। 240

 

दया करूणा – क्षमादान अधर्म – भगवा हिन्दू ।। 241 

 

दिल्ली राजन – तोमर धर्मयोध्धा – अनंगपाल ।। 242

 

म्लेच्छ मर्दनि – गुर्जरात क्षत्राणि – नायकादेवी ।। 243

 

क्षमा मलेच्छ – पापाचार जधन्य – समर्थ पृथ्वी ।। 244

 

छल मलेच्छ – बंधक पृथ्वीराज – महा अनर्थ ।। 245

 

युध्ध मलेच्छ – राठौड जयचंद – रणकेशरी ।। 246

 

धर्म प्रहरी – गरवी गुर्जरात – भिम द्वितीय ।। 247

 

धर्म विजय – चंदेला राज्य – पर्मार्दिदेवा ।। 248

 

धर्म जुजारू – चहमाण नांदेडा – रणथंभोर ।। 249

 

धर्म रक्षक – उजैन परमार – राजा शुभ्रत ।। 250

 

छल मलेच्छ – अश्र्व गैरीला निती – ध्वस्त भारत ।। 251

 

अहिंसा धर्म – आधिपत्य स्विकार – हिंसक पंथ ।। 252

 

अरबी पंथ – भष्म ज्ञान संस्कार – नालंदा पीठ ।। 253

 

सतित्व रक्षा – राणी पदमावती – अग्नि जौहर ।। 254

 

संकट काल – निंद्रा धर्म संस्कार – घोर तिमिर ।। 255

 

जनोउ शिखा – कर भंग मलेच्छ – ब्राह्मण धर्म ।। 256

 

मल उठाय – भंगि बन ब्राह्मण – मलेच्छ हर्म ।। 257

 

नृप पालक – आधिपत्य मलेच्छ – रक्षार्थ प्रजा ।। 258

 

विर क्षत्रिय – निम्न कर्म स्विकार – दलित पद ।। 259

 

दास क्षत्रिय – बुनकर चमार – लाचार धर्म ।। 260

 

धर्म सुन्यता – खंडित देवालय – अस्त आदित्य ।। 261

 

प्रगट भये – विर धर्म रक्षक – तपस्वि संत ।। 262

 

हरि व बुक्का – साम्राज्य विजयम – स्था धर्मराज्य ।। 263

 

हिंदूत्व मोभ – कुम्भा चुडा हम्मीर – धर्म प्रहरी ।। 264

 

श्री गजपती – रुद्रप्रताप देव – शाहि मर्दना ।। 265

 

मुगल मंछा – राजपुत मित्रता – ध्वस्त ब्राह्मणा ।। 266 

 

दिल्ली हिंदवा हेमु विक्रमादित्य – अंतिम छत्र ।। 267

 

अडग विर – महाराणा प्रताप – युध्ध मुगल ।। 268

 

रण टंकार – क्षत्राणि दुर्गादेवी – युध्ध केशरी ।। 269

 

वाड्यार योध्धा – हिरया केम्पे गोडा – धर्म रक्षक ।। 270

 

अहोम राज्य – सेनापती लाचित – भुमि रक्षक ।। 271

 

भाण केशरी – विर गौकुला जाट – अमर ज्योति ।। 272

 

तिनसौ योध्धा – राठौड दुर्गादास – कूटनितीज्ञ ।। 273

 

हिंदू स्वराज – छत्रपती शिवाजी – जाणता राजा ।। 274

 

बुंदेला विर – राजन छत्रशाल – जुजारु योध्धा ।। 275


 भट्ट मराठा – बल्लाल बाजीराव – हिंद केशरी ।। 276



 पेशवा राज – विर मराठा योध्धा – भगवा जय ।। 277


 

त्रावणकोर – विर मार्तंडवर्मा – धर्म पालक ।। 278

 

अमर कृति – राघव यादव्यिम – वेंकटाध्वरि ।। 279

 

जिवंत धर्म – लिख राम चरित्र – तुलशीदास ।। 280

 

रक्षार्थ धर्म – गुरु तेगबादूर – शिश दानम ।। 281

 

शस्त्र व शास्त्र – गुरु गोविंदसिंह – हिंदू खालसा ।। 282

 

सिख्ख कटार – महाराजा रणजी – पंजाब जय ।। 283

 

चर्च आदेश – अरब बर्बरता – मुक्त यूरोप ।। 284

 

इसाई ध्वज – एक यूरोप राज्य – युद्ध कृजेड ।। 285

 

विश्र्व विजय – रक्षार्थ इंडियंस – मिशनरीज़ ।। 286

 

विचार क्रांति – युरोपीय संस्थान – भारतवर्ष ।। 287

 

निती कृजेड – विभाजीत भारत – रक्षार्थ हिंदू ।। 288

 

फैला ईसाई – एक सूत्र इस्लाम – क्षति हिंदुत्व ।। 289

 

राज्य राजन – मातृ धर्म संस्कारी – प्रजा स्वराज ।। 290

 

स्वराज काज – योध्धा रण मर्दानि – मणीकर्णिका ।। 291

 

भगतसिंह – विर सावरकर – बिरसामुंडा ।। 292

 

वंदन वीर – सशस्त्र क्रांतिकारी – भारतपुत्र ।। 293

 

छल कांग्रेस – अहिंसा गांधी भेद – हिंदुत्व हत्या ।। 294

 

गोपा अष्टमी – साधू संत संन्यासी – निर्मम हत्या ।। 295

 

वैराग्य प्रभा – इस्वर प्राप्ति पंथ – निर्माल्य हिंदू ।। 296

 

धर्म अज्ञान – इतिहास अज्ञान – भारत हिंदू ।। 297

 

भ्रमीत हिंदू – छुआछूत कलंक – महा संकट ।। 298

 

तिन भारत – उच्च दलीत वन – राष्ट्र संकट ।। 299

 

क्षेत्र मलेच्छ – संविधान भारत – असुरक्षीत ।। 300

 

संगठनम – केशव व माधव – भारतवर्ष ।। 301

 

राष्ट्र जागृते – स्वयं सेवक संघ – राष्ट्र प्रथम ।। 302

 

धर्म जागृते – गुरुकुल स्थापना – धर्म प्रथम ।। 303

 

 अनुशासन – नित्य शाखा स्थापना – संघ विजय ।। 304

 

प्राचिन धर्म – श्री सत्य सनातन – धर्म विजय ।। 305

 

धर्म आक्रंता – केशरी धर्मध्वजा – विश्र्व विजय ।। 306

 

भारतवर्ष – सनातन हिंदूत्व – संघ संकल्प ।। 307

 

नमस्ते सदा – वत्सले मातृभुमि – श्रेष्ठ वंदना ।। 308

 

श्री सनातन – धर्म संगठनम – सुवर्ण युग ।। 309

 

प्रजातंत्रम – विजय अश्र्वमेघ – नरेंद्र मोदी ।। 310

 

भारत राष्ट्र – सुखम समृध्धम – विश्र्वम गुरु ।। 311

 

।। जय भारत  जय भवानी ।।

 

।। ॐ नमः शिवाय ।।

।। हरहर महादेव ।।

।। जयजय श्रीराम ।।

    

    जीस मनुष्य को अपने मातृ धर्मसंस्कार एवं अपने गौरवमय इतिहास का ज्ञान नही वह मनुष्य पशु समान गँवार है। और एक गँवार मनुष्य का आचरण ही अपने कुल, धर्म, राष्ट्र, एवं समाज के विरुध्ध होता है।

 

   “अज्ञान शंका को जन्म देता है, शंका मिथ्या धाराधारणा को जन्म देता है। मिथ्या धाराधारणा ओ से जन्म लेते है मनधड़ंत असत्य। मनधड़ंत असत्य से जन्म लेते है धर्म नाम विविध पंथ सम्प्रदायों के चित्रवीचीत्र मान्यता ओ का विश्र्व। इस पंथ सम्प्रदायों के चित्रवीचीत्र मान्यता ओ के भंवर में डूब मनुष्य अपना प्रकृतिक मनुष्यत्व खो देता है। मनुष्य मै सत्य मेरा पंथ सम्प्रदाय ही सत्य और दुसरे सब पंथ सम्प्रदाय असत्य की मनोदशा मे डूब मनोविकृत बन जाता है। इस मनोविकृत मनोदशा के आवेश में कब वह एक सभ्य मनुष्य से आसुरी नरपिचाश [ जेहादी ] बन जाता है। या फीर मिथ्या तत्वज्ञान का वाहक हो पंगु भिरु वैरागी बन अपने धर्म, समाज, राष्ट्र के लिये स्वयं संकट हो जाता है वह उस मनुष्य को स्वयं भी ज्ञात नहीं रहता है।  

     ज्ञान केवल सहज सत्य सनातन ज्ञान ही शंकाओ को नष्ट करता है। शंकाए नष्ट होने से मिथ्या धाराधारणा भी समाप्त होती है। मिथ्या धाराधारणा समाप्त होने से मनधड़ंत असत्य नामशेष होता है। मनधड़ंत असत्य के नामशेष होने से पंथ सम्प्रदायों का अस्तित्व नहीं रहता। रहता है केवल सत्यज्ञान जो सनातन है जो सत्य धर्म है जो आदिअनादि है जो मनुष्य को पूर्ण मनुष्यत्व प्रदान कर मानव सभ्यता को सुवर्ण शिखर पर पहुचने का मार्ग है।।।।।” 

 

।। एकत्म सत्य  सत्य सनातन ।।

दिपकजी किशनजी 

9913463838

107, सहयोग रेसिडेंशी, देवपुरा, डीसा हाइवे, पालनपुर 385001, उत्तर गुजरात


विश्र्व मे धर्म केवल एक ही है श्री सत्य सनातन धर्म ।

श्री सत्य सनातन धर्म आदिअनादि है यह धर्म संस्कार हमारे रक्त  मे बहता हमारा प्राण है ।

प्रत्येक सनातन धर्मी अपने गौरवशाली इतीहास का ज्ञाता बने ।

प्रत्येक सनातन धर्मी शास्त्र आधारीत धर्म के पालनकर्ता बने ।

प्रत्येक सनातन धर्मी अपने जीवन मे श्री रामायण को सनातन धर्मसंविधान के रुप मे स्विकार करे ।

प्रत्येक सनातन धर्मी कर्मप्रधान वर्णव्यवस्था का स्विकार करे ।

प्रत्येक सनातन धर्मी अपने क्षेत्र मे गुरुकुल की स्थापना कर राष्ट्रवाद व धर्मवाद का स्वीकार करे ।

श्री सत्य सनातन धर्म की केशरिया विजय धर्मध्वजा समस्त विश्र्व मे लहराय यही हमारा शुभ संकल्प है ।


।। संघ शक्ति कलियुगे ।।


।।  एकत्म सत्य  सत्य सनातन ।।

।। श्री सत्य सनातन धर्म विजयते ।।

।। जय भारत जय भवानी ।।