देवत्व योनि – नाग यक्ष गांधर्व।

     आत्मा जिसे हम चेतना शक्ति कहते है यह चेतना के पांच स्तर होते है।


१. स्थूल शरीर-

     जो दिखाइ देता है वह मनुष्य का स्थूल शरीर है जीस का रंग लाल है जो कर्मशक्ति का प्रतिक है। स्थुल शरीर मे दो शक्ति केन्द्र होते है चेतातंत्र एवं बुद्धितंत्र जीसको मस्तिष्क कहते है। इन दो शक्तिचक्रो से स्थूल शरीर का सुरुप संचालन होता है।


२. कारण शरीर-

     कारण शरीर शक्ति की सारी क्रिया ओ का कारक है जीसका रंग नीला है। कारण शरीर मे तीन शक्तिकेन्द्र होते है। कर्मेन्द्रिय चक्र जो सहश्त्रार्थ का समवाय है आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, जीस से अनुभुती होती है इन का संयोजक है।दिव्येन्द्रियचक्र जो विशुध्ध का समवाय है काम ,क्रोध, लोभ, मोह, माया का संयोजक है। मनोचक्र जो कारण शरीर का केन्द्र है जो आत्मा (चेतना) के केन्द्र स्वाधिष्ठान का समवाय है। सर्व अनुभव जीस से संचालित होते है वह तीनो तत्व  मन, दिव्येंद्रिय एवं कर्मेन्द्रिय से कारण शरीर का संचालन होता है।


३. महाज्ञान शरीर- 

     महाज्ञान शरीर का रंग पिला होता है ज्ञान विध्या शांति अनुशासन का प्रतिक है। मनुष्य को जो याद रहता है वह यादशक्ति एवं जीसका नाष नही होता वह महायादशक्ति जो चेतना के साथ जुडी है जीसका मृत्यु के बाद भी अस्तित्व रहता है जिसे कुछ धार्मीक संत मणिपुर चक्र कहते है। ज्ञानचक्र एवं महाज्ञानचक्र (मणीपुरचक्र) महाज्ञान शरीर का भाग है।


४. शुक्ष्म शरीर-

     शुक्ष्म शरीर का रंग हरा है जो प्रकृति का रंग है। जो सभी जीव मात्र को बांधकर भी रखता है एवं सभी जीव मात्र को स्वतंत्रता से रहने की अनुमती भी देता है। मनुष्य का “विचार” एक मनुष्य से दुसरे मनुष्य कैसा बर्ताव करते है वह “लौकीकता” एवं मनुष्य का दुसरे मनुष्यो पर कैसा प्रभाव है वह “प्रभा” यह तीनो शक्ति चक्र शुक्ष्म शरीर का हिस्सा है। विचार जो मूलाधार का समवाय है। लौकीकता जो अनाहत का समवाय है। प्रभा जो आग्या का समवाय है। यह तीन शक्तिचक्र एवं मूलाधार, अनाहन एवं आज्ञा यह छह शक्तिचक्र शुक्ष्म शरीर के हिस्सा है।


५. दिव्य शरीर-

     दिव्य शरीर जो स्वयम ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना के साथ जुडा हुआ है जीसका रंग श्वेत है। जो पवित्रता एवं प्रसिद्धी का प्रतिक है। सहस्त्रार्थ, विशुद्ध एवं स्वाधीस्ठान दिव्य शरीर का हिस्सा है।


 दिव्य शरीर के  १,सहस्त्रार्थ, २,विशुद्ध, ३,स्वाधीस्ठान महाज्ञान शरीर के  ४,मणिपुर शुक्ष्म शरीर के ५,आज्ञा, ६,अनाहत, ७,मूलाधार 


    यह सात शक्ति चक्र को मीला कर ही चेतना बनती है जिसे सब आत्मा के रूप में जानते है।

       यह सब शक्तिचक्र एक लय में कार्य करते है और इस लय का गणित बहुत ही गूढ़ है इसका ज्ञान मै प्रत्यक्ष ही योग्यता देख प्रमाण देने को समर्थ हु। इस ज्ञान से मनुष्य को चमत्कार एवं गूढ़विद्या सहज हो जाते है।


       आत्मा (चेतना) ॐ महाचेतना का अंश मात्र है जो अविनाशी अजर अमर है। आत्मा एक से अनेक हो अनेको शारीर में पुनः जन्म धारण करती है एवं अनेक आत्मा से एक आत्मा बन एक शरीर में जन्म धारण करती है। आत्मा जब ॐ महाचेतना में स्थिर होती है तब स्वाधीस्ठान शक्तिचक्र के सिवा दुसरे शक्तिचक्र का नवसर्जन होता है। शरीर में आत्मा के स्थापन के बाद आत्मा के सात शक्तिचक्रों के प्रतिबिंब नए सात शक्तिचक्र बनते है शरीर आपने से ॐ उर्जा से दो शक्तिचक्र उत्पन्न करता है कुल सोलह शक्तिचक्रों का योग बनता है।


     आत्मा जब शरीर में होती है तब आत्मा पर 1-पूर्वभव 2-भूमी 3-माता-पिता 4-धर्म संकार 5-राज्यदेश 6-कुल 7-संगत 8-विद्या-ज्ञान 9-आनंद 10- आघात 11-अर्थ-आजीविका 12-ग्रह-नक्षत्र का प्रभाव पड़ता है। मनुष्य जन्म से तीस वर्ष तक पूर्वभव का फल भोगता है, तीस से पचास तक धीरेधीरे पूर्वभव का असर काम हो पचास की आयु बाद मनुष्य को इस जन्म का फल भोगना पड़ता है।


    स्वयम प्रकृति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का सूत्र है।

      आत्मा की केवल दो ही गती है एक जीव के शरीर में चेतना स्वरुप में और दूसरी स्वंयम “प्रकृति” ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना मे विलीन तीसरी कोई गती नहीं और यदी तीसरी कोई गती हो तो वह अवगती है। जो कोई भी स्वरूप में अपने शुक्ष्म अस्तित्व मे विधमान होती है।


       मनुष्य जो जीवन कर्म करता है उसकी वह छाप आत्मा चित्त पर पड़ती है इस लीये ही मनुष्य जीवन काल में जो कार्य करता है उसका हिसाब चित्रगुप्त रखता है एसा कहा जाता है। इस लीये मनुष्य के चित में पड़ा हुआ प्रभाव जो गुप्त ही रहता है जो मृत्यु बाद ॐ महाचेतना में विलय होते ही लुप्त होता है। जो धारा धारणा या स्वभाव मनुष्य अपने जीवनकाल रखता है वह स्वभाव उसकी आत्मा भी रखने लगाती है। मृत्युबाद जब आत्मा जो चेतना है वह मनुष्य शरीर से अलग होती है तब वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखती है। प्रकृति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की जो ॐ महाचेतना है वह इतनी निर्मंल है की जब तक आत्मा चेतना स्वीकार न करे की शरीर का साथ छुट गया है अब ॐ महाचेतना मे विलय होना ही धर्म है तब तक आत्मा का ॐ महाचेतना में विलय नहीं होता है।

        चेतना आत्मा की अवगती के मुख्य तीन कारण है।


      1 संसार में प्रीत रहेने से या आकस्मिक मृत्यु के लगते आघात से आत्मा स्वीकार नहीं करती की वह शरीर से अलग है और वह अस्वीकार ही ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में विलीन होने से अपने आप को रोकती है ओर आत्मा अवगती को को प्राप्त होती है।


      2   जो मनुष्य समाज के लीये, धर्म के लीये महत्वपुर्ण कार्य जीवन काल मे कीये होते है। उस मनुष्य को बहुत ही ज्यादा जनसमुदाय उनके मृत्यु के बाद याद करे या उस मृतात्मा की पूजा प्राथना करनी शुरू कर उनमे अपनी आशक्ति चित्त केन्द्रित करते है। एसी अवस्था मे ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना वह आत्मा (चेतना) को अपने मे विलीन नहीं करते और वह आत्मा भी अवगती को प्राप्त होती है।


      3   अवगती को प्राप्त आत्मा जो देवगती को प्राप्त हो देव-दैवीशक्ति का स्वरुप लेते है। उन देवशक्ति मे विश्वास कर जो लोग उनमे आशक्त हो उनकी पुजा करते है। देवशक्ति कोई भी कारण वश उनमे आशक्त मृत्युपाई हुई व्यक्ति की आत्मा को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में विलीन होने से रोक देते है। और सारी अवगती प्राप्त आत्मा जो देवशक्ति की तरह पूजी जाती है वह अपने दल बनाती है।


     इसलीये मनुष्य के मृत्यु के बाद उसके अग्निसंस्कार या समाधी संस्कार के बाद तीसरे दिन उसकी मरणोत्तर लौकीक क्रिया पूर्ण करनी चाहीए। उसके बाद उस मृत मनुष्य के पीछे रुदन करना नहीं चाहीए मृत्यु के चोथे दिन से बारहवे दिन के बिच शुभ दिन देखकर श्रीहरी विष्णुनारायण का पूजन एवं श्री गरुडपुराण का पाढ करना चाहीये। धर्मसंस्कार अनुसार विधिविधान पुर्वक मृतात्मा की आत्मा सत्मार्ग पर जाये ॐ आदीअनादी जगतजननी जगदम्बा की ॐ महाचेतना में विलय हो उसके लीये सामुहीक प्राथना करनी चाहीए।


       जो आत्मा अवगती है वह चेतना स्वरूप ही होती है ओर वह उनके जीवन काल दरमियान जो कर्म कीये हो उस अनुसार पहचान  स्थान प्राप्त करने की अधिकारी बनती है। जिसे हम कइ योनी ओ मे वर्गीकृत करके अलग अलग नाम से जानते है।


       हमारे शास्त्र मे जोगमाया दैवीशक्ति एवं नाग -यक्ष -गांधर्व -कीन्नर –पितृ आदी देवत्व को प्राप्त अवगती देवयोनी प्रकार के उल्लेख है।


देवी योगमाया जो धार्मिक स्त्री अपने जीवन काल में पूर्ण पवित्रता से समर्पण से श्री शक्तिपिंड महामाया की पूजाभक्ति की हो वह पवित्र स्त्री की चेतना (आत्मा) दैवी स्वरुप श्री जोगमाया के नाम एक स्थान ग्रहण कर देवत्व की अधिकारिणी होते  है।


नागदेव जो मनुष्य धर्म की रक्षा को लडाइ लड वीरगती को प्राप्त होते है वह नागदेवयोनी को प्राप्त हो देवत्व के अधिकारी बनते है। जो धर्मसंस्कार, कुवारीकन्या, गोऊमाता के रक्षण मे विरगती को प्राप्त होंगे वही नागलोक मे जा देवत्व का भोग करेंगे। नागदेव के ही मेले लगेंगे लोग इन का ही गुणगान कर इनकी पुजा प्राथना करेंग। यग्य हवन मे भी स्थानदेव के नाम से नागदेव का पहला भोग होगा।


यक्षदेव जो मनुष्य सदा धर्म कार्य को प्रधानता देते है जो धर्मउत्सव धर्मयात्रा धर्मस्थान निर्माण को तन मन धन से सहभागी बनते है। धर्मकार्य के दौरान कीसी कारण से यह धार्मीक मनुष्य की जीवन लीला समाप्त होती है तो यह मनुष्य देवत्व को प्राप्त हो यक्षदेव कहलाते है। धर्म रक्षा धार्मीको की रक्षा यक्षदेव सदा तत्पर होते है।


गांधर्व देवसंसारीक सुखो का भोग करते हुए जो मनुष्य समाज उपयोगी कार्यो मे लीप्त होते है। जो सदा दुसरे मनुष्यो की सहाय करना अपना धर्म समजते है। जिन्होने धर्म के लीये तन मन धन से सहायता की हो। जो मंदिर निर्माण एवं निभाव मे सक्रिय हो जो गौशाला रामरोटी से जुडा हो वह मनुष्य मृत्यु बाद गांधर्वयोनी मे जा देवत्व को प्राप्त होता है।


कीन्नरदेव जीस मनुष्य ने संसार से वैराग्य ले लीया हो। जो कामविषय वासना एवं अर्थ को अधर्म मानता हो। जो अपने धाराधारणा अनुसार कीसी भी देवशक्ति मे चाहे घ्यान आधारीत देवशक्ति हो या आत्मा आधारीत देवशक्ति हो उनमे आशक्त हो। जो अपने आपको धर्मगुरु मानता हो और मनुष्यमर्यादा का उलंधन करते हुए चमत्कार से जनसमुदाय को आकर्शीत करता हो। वो सभी मनुष्य मृत्यु के बाद कीन्नर योनी मे जा देवत्व को प्राप्त होते है। इन कीन्नरदेवो की लोग पुजा पठ करते है उन्हे भोग चडावा चडाते है।


पितृदेव जो सामान्य कौटुंबीक जीवन जीते है वह मनुष्य मृत्यु के बाद उपर दिये गये कोइ भी कारण से अवगती को प्राप्त होते है वहसभी पितृदेव कहलाते है। मनुष्य मे जो स्वभाव संस्कार हो वह स्वभाव संस्कार या पसंद ना पसंद उनकी आत्मा जो चेतना स्वरूप होती है वह धारण करती है।


        इन सभी वर्गीकृत देवत्व प्राप्त अवस्था को हम अवगती प्राप्त आत्मास्वरुप देव दैवीशक्ति ही कहेंगे।

       विश्व के बहुत से स्थानो पर अवगती प्राप्त आत्मा स्वरूप चेतना को देव-देवी मानकर उनकी पूजा अर्चना या उन को भोग लगा कर प्रसन्न करने में आता है। कुछ मनुष्य समूह की मान्यता होती है की यह देवदेवी जो स्थानदेव कहलाते है वह गोचर अगोचर एवं अलोकीक रीत से उनकी पूजा करने वाले लोगो को मदद करते है। आत्मा आधारित देव या देवशक्ति सभी अच्छी हो यह संभव नहीं है क्युकी सबको अपने अलग अलग स्वभाव गुणदोष होते है। सभी आत्मा आधारित देव या देवीशक्ति के अपने अंगत पसंद या नापसंद भी होते है  इस लीये सभी देव या देवीशक्ति के मनुष्य द्वारा कीये जाते पुजापाढ एवं भोग चडावे के व्यवहार हमेशा अलग अलग होते है।


        जो आत्मा अपने धार्मीक जीवन काल के दौरान भोग-विलाष कर्म सांसारीक व्यवहार को महत्व न देते हो और वैराग्य जीवन को ही महत्व देते हो एसी देवशक्ति को अपना जीवन संकल्प दे पूजा-पाठ करने वाले मनुष्य कीस प्रकार से सांसारीक सुख और वैभवलक्ष्मी या एश्वर्य के सुख प्राप्त कर शकते है? जो अपने जीवन काल दौरान प्रखर अहंवृत्ति के मनोशिकार हो जो समाज जीवन मे बडे पद पर रह छोटीछोटी बातो पर सामान्य लोगो पर अपना प्रभुत्व जमाते हो। यदी एसे प्रखर अहंवृती वाले मनुष्य अपनी मृत्यु के बाद अवगती प्राप्त हो तो उनको देव देवीशक्ति मान कर पूजने वाले मनुष्यों से छोटी से छोटी भूल भी हो जाये तो वह देवशक्ति उनको पूजनेवाले मनुष्यों को माफ नही करते। उन्हे दंड दे परेशान कर धोर विपत्ति के भंवर मे फंसा देते है। जो मनुष्य ऐसे अवगती आत्मा आधारित चेतना स्वरुप देवशक्ति में आशक्त हो उन मनुष्यो को बहुत चीजो का ध्यान रखना जरुरी होता है। खासकर जीनकी पुजापाढ करते हो वह आत्मा आधारीत देव देवीशक्ति की पसंद नापसंद का बारीकी से ध्यान रखना पडता है।


        कोई मनुष्य आत्मा आधारीत एसे देवशक्ति की पूजा करता है जिसे मदिरा पसंद नहीं और वह मनुष्य मदिरा पिता है तो उसे अपने जीवन मे दु:ख यातनाए भुगतना पडेगा। जो आत्मा आधारीत देवशक्ति को मदिरा पसंद है और वह देवशक्ति की पूजा करने वाले मनुष्य वो देवशक्ति को मदिरा का भोग नहीं चढ़ाएगा तो उस मनुश्य को अपने जीवन मे दु:ख यातना सहने पडेंगे। ऐसी तो बहोत छोटीछोटी बातो से आत्मा आधारीत देव दैवीशक्ति उनकी पूजा करने वाले मनुष्य से नाराज हो जाती है। फिर उन मनुष्यो को आत्मा आधारीत एसे देवशक्ति जीवन मे रुकावटे उत्पन्न कर यातना देते है। बहुत मनुष्य भक्ति भाव में ऐसी आत्मा आधारित देव या देवीशक्ति को कुछ भी वचन दे देते है। जैसे की हे देव देवी मे आपको इस प्रकार से या उस प्रकार से प्रस्सन करूँगा मै आपके दर्शन आऊंगा आदी आदी किंतु समय संजोग से वह संभव ना हो तो यह देवशक्ति उस वचन देने वाले व्यक्ति को बहुत परेसान कराती है उसके जीवन मे रुकावटो का दौर शरु होता है।


        आत्मा आधारीत देव दैवीशक्ति के स्वभाव एवं व्यवहार भी जीवित मनुष्य जैसे होते है उनके पसंद नापसंद भी जीवित मनुष्य जैसे होते है। भारत में देव दैवीशक्ति से मन्नत मांगने का चलन बहुत है। कोई भी मनुष्य आत्मा आधारीत देव दैवीशक्ति को कोई भी कार्य सिध्धी हेतु मन्नत मांगता है वचन देता है की बदले में भोग प्रशाद चढ़ाऊंगा या पूजा कराऊंगा या पैदल चल कर आऊंगा आदी आदी। किंतुवह देव दैवीशक्ति को मन्नत के अनुसार दिया वचन भंग करो तो देव दैवीशक्ति कभी उस मनुष्य को पता भी नहीं लगने देंगे की वह मनुष्य देव दैवीशक्ति के रुणानुबंधन के भंग का गुनाहगार बनता है। उस मनुष्य को जीवन मे धीरे धीरे दु:ख, यातना, तकलीफ बढ़ने लगाती है वह मनुष्य अपने जीवन मे परेसान हो जाता है। फिर वह मनुष्य अपने दु:खो एवं परेशानी यो का समाधान प्राप्त करने के लीये कोई आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति जीस के शरीर में प्रवेश करते हो एसे तांत्रिक, भूवा- ओझा की मदद लेने को विवश हो जाता है।


        यही से धर्म के नाम अंधश्रद्धा का खेल शरु होता है। सभी देव दैवीशक्ति जो आत्मा आधारित है उन के मंदिर स्थान की पूजा सेवा के लीये एक तांत्रिक भूआ –ओझा होता है जो देव या दैवी के सेवक कहलाते है। किंतु यह आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति हमेशा तांत्रिक भूआ-ओझा के माध्यम से उन की शरण मे गये मनुष्य को सच्चा मार्गदर्शन करे वह जरुरी नहीं है। किंतु जो देव दैवीशक्ति के प्रकोप है उनके और जीनकी शरणमे गये वो देव दैवीशक्ति के आपसी अहं के चक्कर में मनुष्य पहले से ज्यादा दु:ख, यातना, तकलीफो के भंवर मे फंस जाता है। इसिलए देव दैवीशक्ति से प्रताडीत मनुष्य को कभी भी अपनी समस्या के निवारण के लीये दुसरे कोइ त्राहित देव दैशक्ति या उनके सेवक तांत्रिक भूआ- ओझा के पास उनकी शरण मे जाना उचित नही है।


        कोई भी तांत्रिक भूआ-ओझा जीन की सेवा पूजा करते है वह देव दैवीशक्ति जो आत्मा आधारित है उनकी सम्पूर्ण आशक्ति में होते है प्रभाव मे होते है। वो तांत्रिक भूआ-ओझा पर सम्पूर्ण नियंत्रण देव दैवीशक्ति का ही होता है। देव दैवीशक्ति वह तांत्रिक भूवा-ओझा का हरेक प्रकार से मानशिक शोषण ही करते है। किंतु ऐसे आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति के माध्यम उनकी सेवा पुझा करने वाले तांत्रिक भूवा- ओझा के शरीर ही होते है। तांत्रिक भूवा-ओझा कभी सर्वांग सुखी नहीं होते है वो भी ऐसे आत्मा आधारीत देव दैवीशक्ति यो के दिये दुःख से यातना ही सहन करते है।


        जो मनुष्य आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति को अपने घर में इष्टदेव के रुप मे पूजते है उनको इन दैवीशक्ति ओ की पसंद नापसंद का ख्याल रखना चाहीये । दैवी शक्ति का पूजास्थान हमेशा स्वच्छ रखे निरंतर सुबह उनकी दिप-धुप जो करते हो वह नियमीत करे। हर महीने की निच्चीत  तिथि पर या हर वर्ष का निच्चित पूजा पाठ करते हो वह सम्पूर्ण विधी विधान से पूर्ण करे। यदी कोइ दैवीशक्ति की समस्या हो तो घर के सभी सदश्य इखट्टा हो देव दैवीशक्ति की तिथीवार पर उनको जो प्रसाद का भोग लगते हो उस से दुगना प्रसाद का भोग लगा कर सामुहीक माफ़ी मांग कर देव दैवीशक्ति को प्रस्सन करे एवं उनके प्रकोप से मुक्ति प्राप्त करे। जो देव दैवीशक्ति की कुलदेव दैवी के रुप मे धर मे पूजा होती हो उन देव दैवीशक्ति के अलावा दुसरे त्राहित आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति के साथ कोई भी रुण का बंधन बंधने से लेकर उनकी सभी प्रकार की मन्नत मांगने से या उनमे श्रद्धा रखने से दूर रहो। जो देव दैवीशक्ति की कुलदेव या इष्ट देव के रुप मे धर मे पुजा होती हो वह देव या देवी की मन्नत भी कागज पर लीख कर मांगनी चाहीये। मांगी हुइ मन्नत पूर्ण हो तब जो वचन दिया हो उस प्रकार प्रसाद धुप का चडावा चडा देव दैवीशक्ति को प्रसन्न कर मन्नत लीखा कागज जला देना चाहीये।


        घर मे पित्तर देव हो तो कभी भी उनको स्थान दे बिठाना नहीं चाहीए आत्मा का अवगती में नहीं सदगती मे ही मोक्ष हो कल्याण होता है। जीनके घर पर पित्तर देव को स्थान दे उनका मंदिर बना पूजा पाठ होती है उस घर में कभी सुख शांति नहीं होती। हमेशा छोटे बड़े विध्न विनत्ती आते ही रहते है। इसी लीये पित्तर देव के मोक्ष के लीये परिवार के सभी सदश्य इकटठे हो मत्रुतार्पण या पितृतर्पण कर सामुहीक शास्त्रोक्त विधि विधान से नारायणबलि (तर्पण) विधि करनी श्रेष्ठ होती है। पित्तरदेव के लीये सामुहीक प्राथना करनी चाहीये जीस से उन्हे मोक्ष प्राप्त हो वह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना में विलीन हो वही इष्ट है। बहुत बार अवगती प्राप्त पित्तरदेव उनके जीवन काल दौरान आत्मा आधारित देव देवीशक्ति में अशक्त होते है एवं देव दैवीशक्ति के रुणानुबंधन में बंधे होते है। इसलीये आत्मा आधारित देव देवीशक्ति उन मे आशक्त मनुष्य की आत्मा चेतना को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना मे विलय होने से रोक देती है। इस लीये वह मनुष्य स्त्री हो या पुरुष वह पित्तर देव बन के घर में स्थान मंगाते है। किंतु जीस घर में पित्तर देव को स्थान दिया हो उस घर में कभी सुख शांति नहीं रहती छोटे बड़े विघ्न आते ही रहते है इसी लीये पित्तरदेव का तर्पण कर उन्हे मोक्ष मार्ग दिखाना ही श्रेष्ठ है। पित्तरदेव का तर्पण करने से पहले घर में स्थान ग्रहण इष्ट देवदेवी जो आत्मा आधारित देव देवीशक्ति है उनकी प्राथना करके उनको भोग लगा के उनको प्रस्सन करके पित्तर देव तर्पण की विधि करानी जरुरी है।


     “प्रकृति” ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा जो ॐ महाचेतना है वह सभी जीव मात्र की सभी मनुष्य यो की जो जीवन जरुरते होती है उन जरुरतो को परीपुर्ण करते है। सभी मनुष्यो को केवल ॐ महाचेतना पर विश्वास कर अपना उच्च जीवन लक्ष्य बना कर उसे प्राप्त करने हेतु महेनत करनी होती है। जब आत्मा आधारित अवगती देव दैवीशक्ति के पास बारबार विनंती कर अपनी जीवन जरुरतो के लीये मांग रख मन्नते माननी पड़ती है। इन देव दैवीशक्ति मे आसक्त मनुष्य हमेशा मांगता ही रहता है और मांगने की वृति अच्छी नहीं होती। कर्म महनत करने वाले मनुष्य सुखी जीवन जीते है एवं हमेशा मांगने वाले मनुष्य दरीद्र बन दु:खी जीवन जीते है।


     मन मे प्रश्न उठता है की एक ही देव दैवीशक्ति के इतने बहुत सारे अलग अलग स्थान पर मंदिर एवं सभी मंदिरो की अलग अलग आभा ऐसा क्यों? मनुष्य की चेतना (आत्मा) अवगती प्राप्त देव दैवीशक्ति मे आशक्ति के वश ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की ॐ महाचेतना मे विलीन नहीं होती और वह आत्माए स्थान लीये देव दैवीशक्ति की सेवा मे रुके रहते है। जब कोई नये स्थान पर देव दैवीशक्ति के मंदिर की स्थापना होती है वहा ऐसी सेवा मे रुकी आत्मा ही वो देव दैवीशक्ति के नाम पर नए मंदिर मे मूर्ती प्राण प्रतिष्ठीत हो स्थान लेते है। जो उस देव दैवीशक्ति के नाम पर दिपधुप प्रसाद भोग चडावे का व्यवहार लेते है। किंतु उसका स्भाव गुण दोष थोड़े तो अलग पड़ने ही है इस लीये एक मुख्य आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति के नाम पर बहुत सारे अलग अलग स्थान पर मंदिर होते है। एक ही देव दैवीशक्ति के मंदिरो की अलग अलग आभा एवं व्यवहार होते है। देव दैवीशक्ति की पूजा अर्चना करने वाले मनुष्य उनके स्वभाव को जाने बगैर उनसे जो गलत व्यवहार करते है उनकी सही समय संपुर्ण विधी विधान से पूजा पाठन नही करते वह इन देव दैवीशक्ति के प्रकोप के भागी होते है।


         किंतु इन सारी दुवीधा प्रकोप से बचने का श्रेष्ठ मार्ग एक ही है ध्यान क्रिया। नियमीत सुबह ध्यान क्रिया करने से ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ॐ महाचेतना का शुभ प्रभाव बढ़ने से आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति का प्रभाव कमजोर होता है। और जीस परिवार या कुटुंब में नियमीत सुबह सामुहीक ध्यान क्रया होती हो या सुबह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ॐ महाचेतना का कृतग्य आरती प्राथना होती हो वहा आत्मा आधारित गोचर ओगोचार कोई भी बुरी शक्तिया अपना प्रभाव फेला नहीं शकते है।


     “”याद रखे जीस कुटुंब परीवार मे ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की कृतग्य आरती पूजा होती हो, श्री शक्तिपीठ महामाया दैवी की पूजा अर्चन होती हो या ध्यानक्रया नियमीत होती हो कुटुंब परीवार के सभी सदश्य अपना जीवन लक्ष्य बना उसे प्राप्त करने को महेनत करते हो वह कुटुंब परीवार ही सर्वांग सुखी होता है।””


         इस लीये अंधश्रद्धा के जनक ऐसे आत्मा आधारित कोई भी देव दैवीशक्ति के संकल्प या व्यवहार से दूर रहने में ही समजदारी है। घर पर जो अपने इष्ट देव दैवीशक्ति हो उसी की पूजापाठ करे वार्षिक भोग धरे उन्हे ही प्रसन्न करे। जो अपने इष्ट नही एसे अवगती प्राप्त देव दैवीशक्ति के व्यवहार एवं बाधा- मन्नत से जीत ने दूर रहे उतने ही सुखी रहोगे।


       सबसे ज्यादा बुरा या अहित उन मनुष्यों का होता है जो आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति को संकल्प देते है उन से मन्नत मांगते है की उनके विरोधीया शत्रु को आप हानी पहोचाये उन्हे तकलीफ एवं यातनाए दे। अब आत्मा आधारीत देव दैवीशक्ति तो कीसी निर्दोष को हानी नही पहुंचा सकते। किंतु ऐसे अधटीत कार्य आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति को सौपने वाले अधटीत अन्याय पुर्ण कार्य सिध्धी हेतु मन्नत मांगने वाले मनुष्यो को नुकशान या हानी अवश्य उठानी पडती है।


     आत्मा आधारित देव दैवीशक्ति को अपशब्द बोलने नहीं चाहीए उनकी ध्रुणा  करनी नहीं चाहीए जो उनके स्थान है मंदिर है उनका मान सम्मान रखना चाहीये। शीश जुका कर उन्हे प्रसंग के अनुशार दिपधुप करके प्रसाद भोग का चडावा चडा उन की आत्मा को प्रस्सन करना चाहीए। हाथ जोड प्राथना करनी चाहीए की आप सबको सुखी होने का आशिर्वाद दे एवं ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा सब का कल्याण करे सबको सदमार्ग पर ले जाये। 




सनातन धर्म के उत्सव एवं विधि-विधान।


देव स्थापन ; मंदिर में देव देवी की मूर्ती की प्राणप्रतिष्ठा अचल होती है। जब की घर में देवदेवी की छोटी मूर्ती की प्राणप्रतिष्ठा चल होती है। मूर्ती  की प्राण प्रतिष्ठा विधि विधान से संस्कृत श्लोको के मंत्राचार कर यग्य होम कर की जाती है। देव मूर्ती की नित्य पूजा को प्राक्षलन संस्कार कहते है।


प्राक्षलन ; सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय मंदिर या घर में बने छोटे मंदिर में विधि विधान पूर्वक की पूजा को प्राक्षलन पूजा कहते है। मंदिर में बिराजमान मुल नायक देवदेवी को संस्कृत मंत्रोचार से ही स्तुति आरती करने से मूर्ती  में प्राण जागृत होता है एवं पूजा करने वाले सेवक को शुभ फल प्रदान होता है। मूर्ती को अभिषेक, मंदिर की सफाई, मूर्ती को संगार, पुष्प एवं प्रसाद का भोग, धुपदीप, मुल नायक देवदेवी की नाम जप माला करना यह सब प्राक्षलन पूजा का एक भाग है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय पर संस्कृत श्लोक से की गई प्राक्षलन पूजा ही सर्वश्रेठ फल प्रदान करती है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय पर जो धार्मीक मनुष्य अपने घर के नजदीक के देवदेवी मंदिर में जा प्राक्षलन पूजा में भाग ले देवदेवी की मूर्ती के दर्शन करता है उसका ही अपने जीवन में सर्वांग सुख का भोग करने को  मीलता है। देवदेवी की मूर्ती की उर्जा से दर्शनार्थी की चेतना भी उर्जावान बनती है।


यज्ञ, हवन ; संस्कृत मंत्रो एवं विधि विधान पूर्वक प्रकांड ब्राह्मण द्वारा हवन कुंड में विविध आहुति अर्पण कर की जाने वाली विषेस पूजा को यग्न कहा जाता है। अलग अलग फल एवं मनोकामना हेतू विविध प्रकार के यग्न कीये जाते है जीस से देवदेवी की उर्जाशक्ति जागृत हो धार्मीक भाविक को शुभ फल प्रदान कर सारी मनोकामना पूर्ण होती है।


भजन किर्तन सत्सग ; भक्ति संगीत के भजन समूह में या एकेले गा अपने ईस्ट देवदेवी को प्रसन्न करा जाता है। सनातन ज्ञान, रामायण का ज्ञान , वेद उप्निसाद पुरानो के ज्ञान का सरवन एवं मनन करना सत्संग है।


धर्म उत्सव एवं धर्म शोभायात्रा ; नवरात्र में समूह में देवी माँ को प्रसन्न करने को समूह में नृत्य, सनातन धर्म उत्सव में नजदीक के मंदिर में समूह में उत्सव मनाया जाता है। उत्सव में शोभायात्रा का आयोजन होता है नगर में पुरे हर्षउल्लास से भव्य रंगारंग जाखिया तैयार कर ढोल नगर वाजिंत्र के साथ परिभ्रमण करा जाता है। धर्मउत्सव भव्य होने से एवं जयादा से ज्यादा धार्मीक भाई बहनों के सभागीता से धर्म की आपसी एकता बढती है एवं सकारात्मकता बढ़ने से जनसमुदाय की सुखकारी बढती है।


शाबर मंत्र संकल्प पूर्ति ; सनातन धर्मी को जब कोई समस्या एवं अड़चन आती हे तब वह देवदेवी की सरण में जाता है। जब रद्य के भाव से जो मद्दत देवदेवी से मांगी जाती है तब वह रद्य के भाव रूपी सब्दो को ही शाबरमंत्र कहा जाता है। शाबर मंत्रो के बंधन से देवदेवी मद्दत मागने वाले याचक कइ संकल्प या मनोकामना अपनी उर्जा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से पूर्ण करवाते है। बदले में देवदेवी को शाबर मंत्र सब्दो में जो वचन दिया हो वह परिपूर्ण करना होता है। 


     आध्यात्म के सप्त सोपान ; धारा-धारणा-योग-ध्यान-समाधी- अघोरत्व-शिवत्व के सप्त सोपानो द्वारा अर्थ काम धर्म मोक्ष की प्राप्ती ।


सनातन धर्म संविधान ;  रुषिमुनी ओ द्वारा रचित सनातन धर्मग्रंथ एवं श्री वल्मिकी जी द्वारा रचीत श्री रामायण। 

        “श्री सनातन साक्य धर्म अनुसार देवमन्दिरो में पूजापाठ शुध्ध संस्कृत श्लोको के उच्चारण से ज्ञानी प्रकांड पंडित ब्राह्मण द्वारा करवाना ही धर्मसंगत है। सनातन धर्म के सभी सोलह संस्कार का विधिविधान ज्ञानी ब्राह्मण से ही परिपूर्ण करवाना श्रेष्ठ है। सभी प्रकार के यज्ञ, होम  हवन, कथा, श्रवण, अनुस्ठान, चंडीपाठ, देवस्थापना, मंदिर में पूजा सभी धार्मिक कर्म का अधीकार सनातन साक्य धर्म संस्कार अनुसार एक ज्ञानी ब्राह्मण का है।“