ॐ आदीशक्ति- जगतजननी जगदंबा।

     सूर्य एक तारा है पृथ्वी और आठ ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है क्या जीवन केवल पृथ्वी पर ही है? सूर्य एवं सूर्य समान दुसरे २०० अरब तारे हमारी आकाश गंगा में है क्या कही जीवन होगा ? 

 

     हमारी आकाश गंगा मे सूर्य के समान २०० अरब से भी ज्यादा तारे है। इस ब्रह्मांड मे ४०० अरब तक तारे हो एसी विशाल आकाश गंगाए है इस ब्रह्माण्ड में ऐसी एक दो नही दुसरी २०० अरब से भी ज्यादा आकाश गंगाए है। अब कल्पना करो २०० अरब आकाश गंगाए उस में भी २०० अरब से ज्यादा तारे और प्रत्येक तारे को अपना ग्रह मंडल कीतना विशाल हे ये ब्रह्माण्ड?

 

     इस एक ब्रह्माण्ड के उस पार दुसरे कीतने ब्रह्माण्ड होंगे? ये सब कल्पना के बहार है। मनुष्य इस पृथ्वी पर अपने कदमो पर (६) छह फुट से ज्यादा की छलांग भी नहीं लगा शकता इस पृथ्वी के सिवा यह ब्रह्माण्ड मे कही भी जीवन होगा ये भी नहीं जानता। ये समस्त ब्रह्माण्ड और क्या पता अनेको ब्रह्माण्डो का संचालन कौन कर रहा है कोई कुछ नहीं जानता। ब्रह्माण्ड की बाते जाने दो हमारी सूर्यमाला के बारे मे भी मनुष्य क्या जानता है? सूर्यमाला भी जाने दो इस पृथ्वी के बारे में भी ये मनुष्य कीतना जानता है ?

 

     इस पृथ्वी पर जो वायुमंडल है जो प्राणवायु है विविध महासागर पानी से छलक रहे है विविध भू-खंड है विविध प्रकार की आबोहवा है। ये जो समस्त महासागर और विविध भू-खंड क्या पता कीतने ही प्रकार के सजीवो से चेतन है जहा नजर करो वहा कीतने ही प्रकार के विविध सजीवो की उपस्थीती दिखाइ देती है। जो देख रहे है जो अनुभव कर रहे है वो सब बहुत ही औलोकीक है पता नही इस स्वर्ग जैसी पृथ्वी को कुछ मुर्ख लोग नर्क या मृत्युलोक क्यो कह रहे है? यहाँ तो सब जगह जीवन है चेतना का संचार है उमंग और उत्साह है। हम जो पर्वतो को देख हे है जो चारो ओर का अहलादक वातावरण देख रहे है जो भूभाग हम देख रहे है जो नदिया, तालाब एवं महासागरो को हम देख रहे है। इन सब में लीन आनंद कील्लोल करते हुए अनेक प्रकार के सजीवो की जीवन लीला हम देख रहे है। स्वाभाविक है हमारे मन में प्रश्न उठता है? यह ब्रह्माण्ड कोन चला रहा है? यह सृष्टि का पालन पोषण कोन कर रहा है? यह सब चलायमान रखने के पीछे कीसका क्या प्रयोजन है ? 

 

     यह एक अखंड अगोचर उर्जा शक्ति है जीसका एक दुसरे में निरंतर रूपांतर हो रहा है हर जगह हर कोना चेतन है छोटे से छोटा अणु भी गतीमान है। बड़ेबड़े ग्रह- तारे- आकाश गंगाए और ब्रह्मांड भी गतीमान और चेतन है। यहाँ पर कुछ भी निर्जीव जैसा है ही नहीं, अणु के केद्र न्युट्रोन के आसपास प्रोटोन और प्रोटोन के आसपास परिक्रमा करते इलेक्ट्रॉन्स है। न्युट्रोन के अन्दर भी एक भेदी कण है जिसे विज्ञानं हिग़्सबेज़ोन (इश्वरीयकण) कहता है। सभी अणु मे प्रोटोन और इलेक्ट्रान की संख्या पर अलग अलग तत्व का अस्तित्व बनता है। हर तत्व बडा सवरूप ले ग्रह, ग्रहमाला, सूर्य, आकाश गंगाए, ब्रह्मांड बनते है। ओर छोटे से छोटे अणु परमाणु से लेकर बडे से बडे विशाल ब्रह्मांड तक सभी एक दुसरे की परिक्रमा करते है। कौनसी शक्ति, कौनसी उर्जा निरंतर सबको गतीशील बनाय रखता है ?

 

     इस ब्रह्मांड मे एसे अगोचर तत्व भी है जीस मे इलेक्ट्रोन – प्रोटोन –न्युट्रोन नही है जो बहुत ही नाटकीय है। जो क्वोंटम (दलआधारीत) तत्व के साथ दुसरे तेरह तत्वों का संयोजन सवरूप है। क्वोंटम (दलआधारीत) नहीं वैसे यह तेरह तत्व में अणु-परमाणु नहीं फिर भी है। आपस मे एकलय मे यह तेरह तत्व इतने नाटकीय है अगोचर है की वो चौद्वे तत्व के अणु-परमाणु में निरंतर परिवर्तन करते रहते है यहा कोई स्थिर एवं कायम नहीं है। हर एक सजीव जीव में जो औलोकीक चेतना है वह भी ये तेरह अगोचर तत्व की उर्जा का संयोजन सवरूप है। यह तेरह तत्व मील कर क्वोंटम (दल) का एक दुसरे में निरंतर रूपांतर करते रहते है जो आज के विज्ञान के लीये भी एक पहेली ही है। जीस प्रकार पारे एवं सोने में एक इलेक्ट्रान की ही भिन्नता है किंतु विज्ञान कभी भी पारे में से सोना ओर सोने में से पारा प्रयोगशाला में नहीं बना सकता है। किंतु हर एक चेतन जीव मनुष्य सहीत जो कोई भी प्रजाति का हो अपने शरीर में रही इस चेतना द्वारा एक तत्व का दुसरे तत्व में निरंतर रूपांतर करते रहते है। सभी जीव (चेतन) खुराक एवं प्राण के लीये श्वास में आक्सीजन (प्राणवायु) ले उस आक्सीजन (प्राणवायु) का कार्बन में रूपांतर कर उर्जा प्राप्त करते है। वृक्ष एवं लताए भी कार्बन ले उस का आक्सीजन में रूपांतर कर देते है। हर एक सजीव एक तत्व ग्रहण कर उस तत्व का स्वरूप बदल कर दुसरे तत्व में जोड़कर उस से पोषण ग्रहण करता है।

 

    यह चौदह (१४) तत्वों में से एक तत्व की भी कमी हो तो?

  १. जीसमे अणु-परमाणु हो वह सर्व तत्व। 

  २. अग्नि –  अग्नि के बिना ब्रह्माण्ड कैसे होता?

  ३. आवाज-  आवाज के बिना सृष्टि की कल्पना भी क्या हो सकती है?

  ४. द्रष्टि- मनुष्य एवं कोइ भी जीव को कुछ भी दिखाई नहीं देता तो क्या यह सृष्टी होती ?

  ५. ठंडी-गर्मी- ठंड एवं गर्मी के बिना ब्रह्माण्ड की कल्पना भी हो सकती है क्या?

  ६. वृद्धि-  वृद्धि के बिना हर एक जीव का विकास कहा से होता?

  ७. परिवर्तन- एक तत्व का दुसरे तत्व में रूपांतर यानी परीवर्तन ही न होतो?  

  ८. प्रकाश – ब्रह्मांड मे प्रकाश ही ना हो तो क्या पृथ्वी पर जीव सृष्टी होती? 

  ९. तरंग- कोई भी तरंग के बिना ब्रह्माण्ड की कल्पना क्या हो सकती है?

  १० संवेदना- कीसी भी जीव में कोई भी संवेदना ही ना हो तो? 

  ११. विचार- विचार के बिना मनुष्य सृष्टि की कल्पना क्या कोइ कर सकता है?

  १२.  गुरुत्वाभार– आकर्षण -अपाकर्षण (गुरुत्वाभार) के बिना क्या यह ब्रह्माण्ड चलयमान रह सकता है?

  १३.  समय- इस ब्रह्मांड मे यदी समय का तत्व न हो तो?

  १४.  गती- गती के बगेर सब-कुछ रुक जायगा तो ब्रह्मांड ही कहा से हो सकता है?

 

   इन १४ तत्वों के मिले हुए स्वरूप को ही हम उर्जा कहते है।

 

     इन १४ तत्वों को ही प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ने १४ भू-वन कहा है। इस अनंत ब्रह्मांड के पदार्थ और प्रतिपदार्थ जैसे तो ना जाने कीतने तत्व जिनको बनाने वाला और चलाने वाला कोन है? इन १४ तत्वों के मिले हुए स्वरूप को ही अखंड अगोचर ब्रह्मांड उर्जा प्रकृति कहा गया है जिसका अंश ज्योतिबिंदु स्वरुप आत्मा- चेतना है।

 

     जीसने ना जन्म लीया है जीसे ना मृत्यु प्राप्त हुई है जहा शुरुआत हुई है जहा मध्य है और जहा अंत होना है वहा हर एक जगह पर जीस उर्जाशक्ति की सर्वव्यापक उपस्थीती है। कण से ले बड़े बड़े ब्रह्माण्ड जीस उर्जाशक्ति से चलयमान है, जो अखंड है अगोचर है जीसका हर जगह पर वास है वही आदीअनादी शक्ति है। जड़-चेतन सभी इस उर्जाशक्ति के नियम के अनुशार चलयमान है, जो उर्जाशक्ति हर एक प्रजाती के जीवन का उद्गम है। जीस के द्वारा ये सभी धटमाल का सर्जन होता है वो प्रकृति ही है। मे जो समज रहा हु में जो कुछ लीख रहा हु आप जो कुछ पढ़ रहे है जो समज रहे हो वो सब उस अगोचर-अखंड सर्वव्यापी आदीशक्ति “प्रकृति” के आभारी है।

 

     प्रकृति अपना शुद्ध श्वेत ज्ञान हर एक मनुष्य को देती ही है किंतु सभी मनुष्य को अपने जीवन दरमियान जो भिन्न भिन्न धारा होती है उस प्रकार वो भिन्न भिन्न धारणा के मनोरंगों में रंगा होता है। प्रकृति का शुद्ध-श्वेत रंग भी मनुष्य के स्वयं की भिन्नभिन्न धारणा ओ के रंग में रंग जाता है इस लीये ही इस विश्व में इतने सारे मत-मतान्तर एवं पंथ- सम्प्रदाय अस्तित्व में है।

 

     यह प्रकृति है जो हिरन को भूख लगे तब उसे घास के मैदान तक जाने की प्रेणना देती है। यह प्रकृति है जो बाध को भूख लगे तब वाघ को हिरन जहा घास चरता है वहा जाने की प्रेणना देती है। यह प्रकृति है जो घास चरते हिरन को वाघ से सावधान करती है। यह प्रकृति है जो वाघ को हिरन का शिकार करने की चपलता देती है। यह प्रकृति है जो हीरन को वाघ का भय दे जान बचाके भागने की प्रेरणा देती है। यह प्रकृति है जो वाघ को भी हिरन के पीछे भाग कर उसे पकड़कर शिकार करने का बल-चपलता एवं प्रेणणा देती है।

 

     यह प्रकृति है जो सृष्टि के सभी जीव को अपना कर्म करने की सद्प्रेणणा देती है। यह प्रकृति जीस जीव का कर्म महेनत संधर्ष ज्यादा उस कर्मशील जीव को ज्यादा सहयोग करती है। यदी हिरन का भागने का कर्म ज्यादा तो हिरन को ज्यादा सहयोग और यदी वाघ का भागने का कर्म ज्यादा तो वाघ को ज्यादा सहयोग। प्रकृति का तो एक ही नियम है जो ज्यादा महेनत करे अपना कर्म पूर्ण निष्ठा से करे उस कर्म को सहयोग करना।

 

     समग्र सृष्टि में जो कर्म की घटमाल चल रही है वो चलाने वाला या करने वाला भी प्रकृति है। उस की प्रेरणा से में लीख रहा हु ओर आप पढ़ रहे है। यह प्रकृति की अच्छी और समज में आये एसी परिभाषा हमारे प्राचीन ऋषिमुनियो ने की है। ‘‘ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा” के स्वरुप मे तेजस्वी और सवरूपमान माता ॐ स्वरूप में समस्त सृष्टि में सर्व व्यापक सत्य है। अष्ठभुजा सभी हाथ में अलग अलग अस्त्र शस्त्र है उन की विराटता के अनुरूप सिह या बाघ की असवारी है। इस में कुछ भी समज में आ रहा है? और समज में आ रहा है तो क्या समज में आ रहा है? विचार कीजीए प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी कीतने ज्ञानी थे की एक पहेली मे अखंड प्रकृति के स्वरुप का निरूपण कर दिया था। और हमे ज्ञान दिया की यह समग्र सृष्टि में पूजने योग्य मात्र एक ही शक्ति “ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा” है।

 

     ॐ जो समग्र सृष्टि का नाद है ॐ—समग्र सृष्टि के नर (मनुष्य) और नारी (मादा) को उन के मन आत्मा द्वारा सद प्रेरणा देने वाली “ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा”  

 

     कहा जाता है की ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ॐ सवरूप में समग्र सृष्टि में सर्वव्यापक सत्य है। सनातन धर्म आधारित श्रीयंत्र में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अखंड उर्जा का वास होता है। श्रीयंत्र जहा स्थापीत होता है वह स्थान में ब्रह्माण्ड उर्जा का वास होता है वहा सुख समृद्धि का वास होता है।

 

     जनन जो एक स्त्री से ही संभव है, एक अंकुर से ही जीव सृष्टी की रचना होती है। इस लीये यह समस्त ब्रह्माण्ड गोचर अगोचर सभी का जीस उर्जाशक्ति ने जनन कीया एवं समस्त जीवसृष्टी का एक माता की तरह पालन पोषण करती है वह आदीशक्ति है। इस लीये प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ओ ने कल्पना की यह समग्र सृष्टि का पालन पोषण करने वाली दिव्य आदी अनादी शक्ति एक माता स्वरुप है। इस लीये यह जो औलोकीक आदी अनादी अगोचर उर्जा शक्ति प्रकृति को भारतीय ऋषिमुनीओ ने माता की उपमा देकर “ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा” के स्वरुप मे उल्लेख कीया है। यह सृष्टि बहुत ही सुंदर है इस लीये ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को अपार तेजस्वी सुंदर मुख वाले माता की तरह उल्लेख कीया है।

     

  यह आदीअनादी शक्ति इतने सारे शुभ कार्य कैसे करते है? इस लीये ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को अष्टभूजा देवी माता की तरह उल्लेख कीया है। अर्थात ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा अष्ट हाथ द्व्रारा इस सृष्टि का सुंदर सुरूप संचालन कर समस्त जीवसृष्टी का एक माता की ममता से पालन पोषण करती है।



     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के सभी भुजाओ में अलग अलग शस्त्र है जिनका एक अर्थ यह है।


1. गदा   गदा कर्मशक्ति का प्रतिक है।

     इसका अर्थ यह अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा जो शुभकार्य की शरुआत करते है वो कभी अधुरा नहीं रहता है। वो शुभकार्य हमेशा पूर्ण होता ही है क्यो की गदा का प्रहार जहा होता है वहा सब परीपूर्ण हो जाता है।

     गदा द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा समस्त विश्व के मनुष्यों को एक संदेश देते है की तुम जीस कार्य की शुभ सरुआत करो वो कभी अधुरा नही रखना चाहीये। एकबार शरु हुए उस शुभ कार्य को परीपूर्ण कर के ही थमो कोई भी शुभकार्य अधुरा छोड़ना अपराध है। और सब से पवित्र शुभकार्य है अपनी मातृभूमी एवं धर्म का कल्याण करना उस का पुरे विश्व में फैलावा करना।

   

2. धनुषबाण–   धनुषबाण दूरंदेशी एवं लक्ष्य वेध का प्रतिक है।

     इसका अर्थ यह अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा जो शुभकार्य करते है वो हमेशा पहले से पूर्व नियोजित आयोजन से ही करते है। लक्ष्य पहले से ही निर्धारीत होता है सम्पूर्ण आयोजन बद्ध एकग्रता से लक्ष्य वेध भी करते है अर्थ लक्ष्य प्राप्ती करते है।

    धनुषबाण द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा समस्त विश्व के मनुष्यों को जीवन का एक लक्ष्य बनाकर उसकी प्राप्ती के लीये आयोजन बद्ध महेनत करने का संदेश देते है। जीस मनुष्य के जीवन का कुछ भी जीवनध्येय (संकल्प) नहीं है उनको ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा कुछ भी सहाय नहीं करते। सभी मनुष्य को अपने जीवन का एक ध्येय (लक्ष्य) बनाकर उसकी प्राप्ती के लीये संकल्प ले महेनत संधर्ष करना चाहीए। हमें गर्व होना चहिए की हम सब विश्व के प्राचीनतम सनातन धर्म धरोहर का हिस्सा है और हमारा लक्ष्य होना चाहिये पूरा विश्व सुसंस्कृत बने और विश्व मे सनातन धर्म संस्कार की विजय धर्मध्वजा लहराए।

3. त्रिशूल     त्रिशूल तीनो काल एवं विध्वंशकता का प्रतिक है।

     इसका अर्थ भूत- वर्तमान- भविष्य ये तीनो काल समय गती एवं संसार की सभी घटमाल सब इस अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के अधीन है। इसका दूसरा अर्थ यह भी होता है की जो कुछ भी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से प्रगट हुआ है उसका विनाष करने विध्वंश करने भी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा समर्थ है।

     त्रिशूल द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा समस्त विश्व के मनुष्यों को भूतकाल से नया कुछ शिख बोधपाठ ले कर भविष्य के लीये एक जीवन ध्येय बनाकर, एक निच्चीत लक्ष्य बनाकर, कठोर संकल्प ले उसे प्राप्त करने के लीये वर्तमान में प्रमाणीकता से महेनत करने का संदेश देते है। हमें हमेशा यह बात याद रखनी चाहीए की यह सब ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का ही सर्जन है इन सबका विसर्जन या विध्वंश करने भी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही समर्थ है। सच्चा सनातन धर्मी वह हे जो अपने भव्य धार्मीक, सांस्कृतिक, एवं राजनैतिक इतिहास का ज्ञाता हो, जो भविष्य में भी अपनी आने वाली पीढ़ी को सुसंस्कृत –सभ्य सनातन धर्म का उजाला देने को कृतनिश्चयी हो, और वर्तमान में तन, मन, धन से सनातन धर्म संस्कार एवं मातृभूमी के उत्थान में लगा हुवा हो।

 

4. कमल एवं अग्नि   कमल और अग्नि दोनों पवित्रता की निशानी है।

     इसका अर्थ यह अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस ब्रह्माण्ड में पवित्र शक्ति है। इस ब्रह्माण्ड में ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से पवित्र और पूज्य दूसरी कोई भी शक्ति नहीं है।

     कमल एवं अग्नि द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस विश्व के मनुष्यों को समाजीक, आर्थीक एवं धार्मीक व्यवहार जीवन कर्म में प्रामाणीक एवं पवित्र रहने का संदेश देते है। हमें हमारे कुटुम्ब के प्रती, समाज के प्रती, राष्ट्र के प्रती, धर्म के प्रती प्रामाणीक रहना है। चाहे कीतनी ही विसंगतता क्यों न हो, धर्म नाम पंथ सम्प्रदायो का प्रभाव चाहे दलदल के सामान हो, हर हाल में हर कीमत पर इन दलदल सामान पंथ सम्प्रदायो के प्रभाव में भी हमे सनातन धर्म संस्कार के कमल की तरह खिलना है। समय पडने पर हमे अग्निका स्वरूप ले सनातन धर्म संस्कार के लीये सब पवित्र कर देना हे।

 

5. शंख शंख सभी शुभ कार्य की शरुआत में बनाया जाता है।  

          इसका अर्थ यह अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस ब्रह्माण्ड में समग्र सृष्टि में होने वाले सभी कार्य के कर्म में या फिर निरंतर होने वाले सभी घटमाल में सबसे पहले शुभ आरम्भ करने वाली दिव्यशक्ति है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा सभी जगह पर विद्यामान है अणु-अणु, कोने-कोने, जड़-चेतन सभी जगह सबसे पहले ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही है।

      शंख द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस विश्व के मनुष्यो को सभी शुभ कार्य में, धर्मरक्षा एवं दान-पूण्य करने के कार्य में सबसे प्रथम रहने का संदेश देते है। हम सभी सनातन धर्म सभ्यता मे विश्वास करने वाले मनुष्यो को हमारे सभी धर्म उत्सवो मे, सामाजीक उत्सवो मे, हमारी शक्ति एकता स्वरुप धर्म सोभायात्रा मे, एक जूट हो तन, मन, धन से आनंद उल्लास से प्रथम रहेना हे सहभागी बनाना है।

     राष्ट्र पर के संकट, धर्म संस्कार पर के संकट सभी सनातन भाई-बहेनो पर के संकट पर हमें एक हो एकजूट हो धर्म राष्ट्र एवं धर्म अनुनाई की रक्षा को प्रथम रहेना हे। यदी जरुरत पड़ेतो शंखनाद कर आक्रमण कर असभ्यता रूपी संकट का सर्वनाष करना है।

 

6. तलवार –   तलवार जो तटस्थता एवं न्याय का प्रतिक है।

     इसका अर्थ यह अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से ज्यादा निर्मल एवं तटस्थ इस विश्व में और कोई नहीं है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का न्याय कीसी भी पक्षपात बिना सम्पूर्ण न्याय है जो अपराध करे उसको सजा अवश्य मीलती ही है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को कोई भेदभाव या प्रिय-अप्रिय नहीं है जो जैसा कर्म करे उसे वेसा ही फल मीलता है। किंतु याद रखना अपने धर्म के विरोधीयो अधर्मीयो का कीसी भी प्रकार का अन्याय सहना ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के लीये सबसे बड़ा अपराध है। और अन्याय सहने के अपराध की सजा वह शहनशील मनुष्य और उसके धर्म समुदाय को विरोधी अधर्मी संस्कृति के दास गुलाम बनकर अवश्य भुगतनी पड़ती है। जो हम से अन्याय करता हे या हमारी मातृभूमी का अहित करता हे उसे क्षमादान देना भी महा अपराध है और इस की सजा है अपनी ही भूमि पर लाचार बनकर विलुप्त होना।

     तलवार द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस विश्व के मनुष्यो को हमेशा तटस्थता से सद्कर्म करने की प्रेरणा देते है। सभी मनुष्य जो कर्म करता है वो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा देख रहे है। जो कोई भी पक्षपात बिना उन के कीये हुए कर्मो का न्याय देगे। सभी मनुष्य को पूर्ण निष्ठा से तटस्थ रहकर निती एवं न्याय की समज से मातृभूमी अवं राष्ट्रहित में सदकर्म करने चाहीए ऐसा संदेश ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा देते है।

7. सुदर्शन चक्रसुदर्शनचक्र जो निरंतर होती घटमाल सतत निरंतर चलते कर्म और सुंदर दर्शन का प्रतिक है।

     इसका अर्थ यह अगोचर शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा निरंतर उनका कार्य करते ही रहते है। ब्रह्माण्ड के सभी तत्व सब कुछ एक दुसरे में लयविलय होता ही रहता है। इस ब्रह्माण्ड या समग्र सृष्टि में जो कुछ है वो बहुत ही सुंदर है अदभुत है अवलोकीक है वो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का ही स्वरूप है। सुदर्शन का एक अर्थ अच्छा-दर्शन, सुंदर-दर्शन होता हे विश्व मे जो अस्भयता हे विकार है उसका सर्वनाश भी निरंतर अच्छे दर्शन, सुंदर दर्शन द्वारा करते रहना चाइये इसका प्रतिक हे।

     सुदर्शन चक्र द्वारा ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस विश्व के मनुष्यों को संदेश देते है की सभी मनुष्यों को अपने जीवन में निरंतर कुछ ना कुछ अच्छे कर्म करते रहना है। सभी मनुष्य को दुसरे मनुष्य को ज्ञान की बात कहनी चाहीये, अच्छा कर्म करना एवं एक अच्छी विचारधारा के वाहक बनाना चाहीये। अज्ञान से भरी अव्यवहार विचारधाराए जो मानव सभ्यता सनातन धर्म संस्कार पर संकट बनती हो उसे अपने उच्च और सुंदर अवलोकीक ज्ञान रूपी विचारधारा से निरंतर ख़त्म करते रहेना है।

     सुसंस्कृत लोगो का सुदर्शन रुक गया तो जो अधर्मी है जो असुरी है उनकी पंथ संप्रदायीक विकृत विचारधाराओ से पाखंड, भय, डर का अंधकारी साम्राज्य स्थापीत हो जायगा। सभी सनातन धर्म संस्कार के लोगो को ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से प्ररेणा ले निरंतर अच्छी सुन्दर विचारधारा रख मातृभूमी एवं धर्म हीत में सद्कार्य करते रहेना है।

 

8. आशीर्वाद – ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा इस सृष्टि के समस्त जीव को आशीर्वाद देते है हम जो देख रहे है जो जान रहे है वो सब ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से उत्पन्न हुआ है। इस समस्त सृष्टी का पालन पोषण भी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही कर रहे है। जड़-चेतन, सकारात्मक-नकारात्मक, भलाई-बुराई, देव-दानव, ये जो हम हमारे आसपास से लेकर ब्रह्माण्ड की अगोचर घटमाल देख रहे है वो सब ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की महालीला है।

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा कभी कीसी मनुष्य मे भेदभाव नही करते हम सनातन विचारधारा के लोग एक मां एक शक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के पुत्र है। हमे भी सनातन धर्म सभ्यता मे विश्वास करने वाले कीसी भी मनुष्य या जातीगत समाज से कीसी भी प्रकार का उच्च-नीच का भेदभाव नही करना चाहीये। हम सब सनातनधर्म सभ्यता के लोगो को एकात्म हो मीलजुल कर रहेना चाइये।

 

     सभी जीव में प्राणरूप चेतना है वो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का अंश ही है। “जीस प्रकार पानी के बुलबुले पानी में पैदा होकर पानी में ही विलय हो जाते है सभी जीव की आत्मा-चेतना ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से उत्पन्न होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व टकाये रख फिर से ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा में विलीन हो जाते है”।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा अत्यंत निर्दय भी है और ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा जितना निर्मल भी कोई नहीं है। जो इस विश्व में बसे सभी मनुष्यों को प्रेरणा देते है की हंमेशा प्रेममय कृतग्य बने रहो किंतु जो कोई तुम्हारे धर्मकार्य में विघ्न उत्पन्न करे तो निर्दय बनकर उनका सर्वनाष करने से भी हिचकीचाहट ना करो।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ॐ स्वरूप ही है प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी ने सुंदर तेजस्वी अष्ठभुजा वाली देवीमाता की आराधना की है। एवं ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को उनके दिव्य तेज अनुरूप इस जगत में सर्व प्राणियों में सर्वोच्य ऐसे वाघ या शेर की सवारी दी जो हंमेशा सर्वश्रेष्ठ ही है। प्राचीन भारतीय ऋषिमुनी यो ने इस प्रकार ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के स्वरूप का वर्णन करके समस्त सृष्टि में यह सर्वोच्य शक्ति को पुज्य माना है। सनातन धर्म शास्त्र के अनुसार त्रिदेव- “ब्रह्मा-विष्णु-महेश” भी इसी दैवीशक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से ही उत्पन्न हुए है। त्रिगुणी शक्ति             ॐ श्रीमहासरस्वती ॐ श्रीमहालक्ष्मी ॐ श्रीमहाकाली का सयुक्त स्वरूप ॐ श्री माता वैष्णवी जगदंबा का ही स्वरूप है।

 

     देव-दानव पृथ्वी पर की समस्त जीवसृष्टि यह समस्त सूर्य- चन्द्र- तारा-आकाशगंगाऐ सब कुछ ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा से ही उत्पन्न हुआ है जो घटमाल के चक्र से फिर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा में ही विलीन होने वाला है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का इस ब्रह्माण्ड में अणु ही अणु में वास है कोई स्थान खाली नहीं सब कुछ भरा हुआ है। भारत में प्राचिन ऋषिमुनी ओ ने देवी-देवता ओ ने इसी उर्जाशक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के गुणगान, प्राथना करने की एवं पूजन करने को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म माना है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के कृतग्य बनना सभी मनुष्य मात्र की पवित्र धर्मकर्तव्य है। इस जगत मे ‘प्रकृति’ चारो ओर हम जो देख रहे है वो समस्त सृष्टी जड-चेतन वोही ‘प्रकृति’ उसे चलाने वाली निभाने वाली सब ‘प्रकृति’ ही है। हम जहा रहते है वहा की ‘प्रकृति’ के अनुसार हमे रहना चाहीए वो हमारा मनुष्य मात्र का धर्मं है। हम जो जानते है जो देख रहे है वो सब हमारे उपयोगीता के लीये ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने ही सर्जन कीया है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा स्वरूप प्रकृति ने सभी मनुष्य को सद्बुद्धि दी, हाथ- पैर- सर्व इन्द्रिया दी, अगम-निगम का ज्ञान दिया, जीने के लीये जल, जमीन और वायु दिए, सभी प्रकार के जीवसृष्टी का निर्माण कीया है। इस पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य सर्व जीव ॐ आदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के ऋणी है। मनुष्य को समस्त जीवसृष्टी मे सबसे ज्यादा बुद्धि-शक्ति मीली है इस लीये सभी मनुष्यो का तो विशेष कर्तव्य बनता है की ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का रुण चुकाने के सर्वश्रेष्ठ प्रयत्न करे।

 

     सुबह ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के प्रतिक रूप छबी या श्रीयंत्र को एक दिप-धुप करके प्राथना करनी चाहीये की “हे माता ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा आपने हमे जो सर्व सुख संपत्ती सदबुध्धी दिये है उसके लीये हम आपको कोटी कोटी वंदन करते है। हम हमारी विवेक बुद्धि से जो अच्छा जीवन ध्येय बना कर उसे प्राप्त करने के प्रयास करे उसमे आप माता ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा सहाय करना हम सब को बहोत प्यार देना अच्छी बुद्धि देना। हम सनातन धर्म संस्कार को पुरे विश्वमें फेला सके समस्त विश्वमें सनातन धर्म की विजय धर्मध्वजा लहरा सके वह आशिर्वाद देना।

 

     बारबार मांगने वाले एवं छोटीछोटी बातो पर असंतोष फरियाद करने वाले मनुष्य ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के अप्रिय है। “हमारे यहाँ कोई हमारा आश्रित हो और उसकी सभी छोटीमोटी जरुरते हम परिपूर्ण करते रहे फिर भी वो कोई कर्म करे नहीं और नइ-नइ मांगे चालू रखे छोटी-छोटी बातो पर असंतोष व्यक्त करे तो हमको उस पर प्रेम आये या गुस्सा?‘’ तो फिर यह चौदह भुवन की मां ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा सभी मनुष्य सभी जीवको माता की तरह पालन पोषण करके उनकी सभी जरुरते परिपूर्ण करते हो तो ॐ जगतजननी में अविश्वास करके उनमे असंतोष व्यक्त करना वो महा अपराध ही है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को जो मनुष्य सुबह प्राथना करके कृतज्ञता के भावसे जो मीला उसके लीये आभार व्यक्त करता है जीवन मे जो नही मीला उसके लीये अपना जीवनध्येय (लक्ष्य) बना उसे प्राप्त करने के लीये आशीर्वाद मांगता है उसके साथ ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के आशीर्वाद हंमेशा होते ही है।

     और जो मनुष्य अपने जीवन से फरियाद करता है असंतोष व्यक्त करता है या सुबह-शाम पुरे दिन कोई कार्य या कर्म न कर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के नाम पर इश्वर, भगवान या परमात्मा की अवधारणा करके संसार छोड़कर उनको याद कीया करता है। एसे मनुष्य पर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का कोप उतरता है उस मनुष्य को बहोत ही यातनाए सहनी पड़ती है।

 

     सभी मनुष्य मात्र को……

१. प्रक्रुति के सभी जीव मात्र का आदर करे क्युकी सभी जीव ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने खास प्रयोजन से ही बनाया है। सभी जीव में निरंतर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की अवलोकीक उर्जा का ही अंश है।

२. विश्व के सभी मनुष्य को अपने संसारीक, धार्मीक, एवं आर्थीक कर्तव्य प्रमाणीकता से पूर्ण करने चाहिये। जीस मनुष्य को जो कर्तव्य मीला है वो ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा द्वारा ही मीला है वह कर्तव्य पूर्ण करना वो मनुष्य मात्र के लीये अनिवार्य धर्मकार्य है।

 

एक कहानी  …….

     एक रुषीमुनि थे उनकी सेवा को दो सेवक थे दोनों रुषीमुनि को समर्पित। एक बार रुषीमुनि को दुर गांव धर्मकार्य को अपने सेवको को भेजना हुआ। रुषीमुनि ने दोनों सेवको को बुलाकर उनको दुरगांव जा करने के धर्मकार्य की जानकारी एवं उधर करने के कार्य की समज दी। दोनो सेवको को आज्ञा दी तुम दोनों मेरा घर्मकार्य करके मेरे पास वापस आओ दोनों सेवक रुषीमुनि का सौपा धर्मकार्य करने आश्रम से रुषीमुनि के आशीर्वाद ले रवाना हुए।

 

     एक सप्ताह बाद दोनों सेवक आश्रम में वापिस आये रुषीमुनि ने उनको सौपे गये धर्मकार्य की जानकारी मांगी। पहले सेवक ने रुषीमुनि ने सौपे हुए धर्मकार्य को पूर्ण निष्ठा से पुर्ण कीया उसने सारी विगत रुषीमुनि को बताई। रुषीमुनि उस सेवक पर प्रसन्न हुए अब दुसरे सेवक को कीये हुए धर्मकार्य की जानकारी देने को कहा। दुसरा सेवक था उसने कहा की हे गुरूदेव मे आश्रम से बहार तो गया किंतु मैंने निरंतर आप गुरूदेव को याद कीया दिन-रात आपका ध्यान कीया। रुषीमुनि ने कहा किंतु मैंने जो धर्मकार्य करने को तुम्हे वहा भेजा था उसका क्या कीया? सेवक चुप क्यु की सेवक ने रुषीमुनि देव द्वारा सोपा हुआ धर्मकार्य कीया ही नही था। यह दुसरे सेवक ने तो रुषीमुनि देव को याद करने में ही समय व्यतीत कर दिया था। जब की प्रथम सेवक ने रुषीमुनि देव को मनमें रखकर रुषीमुनि देव का सोंपा धर्मकार्य कीया था।

 

     रुषीमुनि प्रथम सेवक से प्रसन्न हुए और दुसरे सेवक को शिक्षा दी देखो मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ ही था मेरी प्रेणना से ही मेरा सौपा धर्मकार्य करने तुम वहा गये थे और वापिस मेरे पास ही तुमको आना था। मुझे जो मेरा सौपा कार्य करे वो ही सेवक पसंद है मैंने दिन-रात मुझे याद करने को कहा ही नही था बस सुबह एक बार मेरा स्मरण करके मेरे आशीर्वाद लेने थे। मे तो यही था मे उस सेवक पर ही प्रसन्न रहूँगा जो मेरा सौपा हुआ धर्मकार्य पूर्ण निष्ठा और प्रमाणीकता से पूर्ण करके वापिस मेरे पास आये कार्य अधुरा रखकर बस मेरे गुणगान करने वाले सेवक मुझे अप्रिय है।

 

     इस कहानी की तरह सभी मनुष्य को भी प्रकृति रूप ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने इस पृथ्वी पर खास प्रयोजन खास धर्मकार्य के लीये भेजा है। कीतने मनुष्य पूर्ण निष्ठा या प्रमाणीकता से अपना धर्मकार्य पूर्ण कर वापस ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के पास जाते है ? इस विश्व के केवल10% मनुष्य ही। बाकी के 90% मनुष्य ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की विविध अवधारणा करके उनको इश्वर, भगवन, परमपिता या दुसरे कोई भी स्वरूप में मानकर उनको याद करने में चापलूसी करने में समय व्यतीत करते है। धर्मधारणा के नाम विविध प्रकार पंथ संप्रदाय के उटपटांग क्रिया कलाप कर समय की बर्बादी करके एक दुसरे के समुदाय से राग, द्वेश करने में ही जीवन व्यतीत कर देते है।

 

     सब आये कहा से? ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के पास से। फिर कहा जायेंगे? ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के पास। यहाँ क्या करने आये? ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का सौपा हुआ धर्मकार्य करने के लीये। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ने सभी मनुष्य को क्या कार्य करने पृथ्वी पर भेजा है?  

 

        “जिन्होंने हमे जन्म दिया वो हमारे माता-पिता जिनको हमने जन्म दिया वो हमारे संतान, हमारा जीवन साथी, हम जो कर्म करते हो उस मे हमारे कर्म आधीन आश्रितों, मातृभूमी, हमारे धर्म संस्कार और राष्ट्र बस इतनो को ही हमे समर्पित होना है”।

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के अनुकंपा से जीवन जीने के लीये हमें जो कुछ भी मीला है उस के कृतग्य बनना चाहीए। जो हमें मीला    है उसका धन्यवाद प्रगट करना और जो हमें नही मीला उसे पाने के लीये एक जीवन ध्येय बना महेनत संधर्ष करना चाहीये।

 

     देवीशक्ति ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा “प्रकृति” कीस मनुष्य से  ज्यादा प्रसन्न होंगे? कीस मनुष्य को ज्यादा आशीर्वाद देंगे? बारबार छोटी-छोटी बातो पर असंतोष फरियाद करने वाले मनुष्य को? विविध पंथ संप्रदाय के प्रभाव में एक दुसरे समुदाय से लड़ते मनुष्यसे ? ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के नाम से विविध पंथ संप्रदाय के नाम पर उटपटांग क्रिया ए करने वाले मनुष्य से? संसार का त्याग करने वाले मनुष्य से? नहीं यह क्रिया ओ से ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा कभी कीसी मनुष्य पर प्रसन्न नहीं होगी। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा हंमेशा ऐसे व्यक्ति या मनुष्य पर ही प्रसन्न होगी जो उन से मीला हुआ धर्मकार्य पूर्ण निष्ठा से परीपूर्ण करता है जो महेनत और संघर्ष करता है।

 

     आज हम देखते है की सभी मनुष्य अलग अलग समुदाय पंथ संप्रदाय मे बटा हुआ है। अलग अलग समुदाय अलग अलग मान्यता ए अलग अलग संप्रदाय में विश्वास कर के दुसरे पंथ संप्रदाय से राग द्वेश करता है लड़ाई जगडा करता है। अप्रकृतीक, अवैज्ञानीक, वैराग्यक, हिंसक मनोवृति विचारधारा के प्रभाव वाले पंथ संप्रदाय के प्रभाव में मनुष्य अपना मनुष्यत्व छोड़कर हिंसक विचारधारा का विकृत वाहक बन हिंसा की हदे पार करता एक जीता जगता दानव बन जाता है। या फीर पंथ संप्रदाय के प्रभाव में मनुष्य अपना मनुष्यत्व छोड़कर इश्वर (परमतत्व) को खोजता एक नपुंसक विचारधारा से ग्रसीत हो एक भीरु सब अन्याय सहता लाचार सा कुंठीत मनोविकृत बन अपने धर्म समुदाय के सर्वनाष का कारण बन जाता है। ये सत्य हे की कीसी भी पंथ सम्प्रदाय के धर्मनाम से असत्य विचारधारा से ग्रसित मनुष्य अपना नैसर्गिक मनुष्यत्व गवा देता है।

 

     किंतु एक माता के संतान अपनी माता को अलग अलग नाम से संबोधीत करते है जो जैसा समजे जैसा सीखे वैसे ही आचरण करते है। उसका अर्थ यह नहीं है की सब संताने एक दुसरे का विरोध करते रहे। सभी मनुष्य अपनी जो पंथ संप्रदाय आधारित मान्यता धारणा होती है उसी नाम से अपनी इश्वरीय शक्ति को संबोधन करता है। यह प्रकृति एक ही है अलग अलग नाम के संबोधन से ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को कोई फर्क नहीं पड़ता है। फर्क यहाँ रहने वालो को और ऐसी ही छोटी बात पर अलग अलग पंथ संप्रदायीक मान्यता के मनोशिकार हो एक दुसरे से द्रेश राग करने वाले मनुष्य को, उनके पंथ संप्रदाय के समुह को दुवीधा पड़ती है वो विश्व समुदाय के अप्रिय एवं रोष के भोग बनते है।

 

     विश्व के सभी समुदाय के रीत रीवाज वह समुदाय का जीस भू-भाग पर सभ्यता विकास हुआ हो वहा की प्राकृतीक आबोहवा के अनुरूप है जो सर्वथा जो भी समय और संजोग आधारित यथायोग्य है। इसी लीये एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति से रागद्वेश करने से अच्छा है सभी समुदाय संस्कृति का सन्मान करना चाहीए। यह पृथ्वी पर हर एक मनुष्य को अपनी सोच समज के अनुसार अपनी पंथ संप्रदायीक धर्म मान्यता के अनुरुप जीवन जीने का अधीकार है।

 

     सच्चा धर्म वही है जो सर्वशक्ति समर्थ “प्रकृति” का ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का मान सन्मान रखे। सभी जीव मात्र का आदर करे जो सांसारीक एवं प्रकृतीक धटमाल चलता है उसका आनन्द ले। जहा जो भू-भाग की जैसी आबोहवा है उस प्रकृति के अनुरूप कुछ भी रीतरीवाज है उसका आनन्द ले। सत्य स्वीकार करो की इस विश्व मे जो अलग अलग विविधता है वह प्रकृति की स्वीकृति से ही है जो अलग अलग रीतरीवाज है वो भी प्रकृति की स्वीकृति से ही है। जो कुछ हुआ है या जो हो रहा है वो सब ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की स्वीकृति से ही हो रहा है। इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्यो को एक दुसरे से या एक दुसरे पंथ संप्रदायीक धर्ममान्यता ओ से सभ्यता ओ से  रागद्वेश का प्रश्न ही नहीं है।

 

     ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा सभी व्यक्ति को उसके शुद्ध विचार और समज देते है। कोई भेद नही करते जीसकी जो जरुरत है उसकी सभी जरुरते परिपूर्ण करते है। किंतु सभी मनुष्य को वो जीस पंथ संप्रदायीक धर्ममान्यता मे विश्वास करता है आसपास का जो देखा जो सिखा उसी हिसाब से अपनी विवेक बुद्धि से सोचता समजता है। अलग अलग रीतरीवाज संस्कृति का जो सभ्यता विकास हुआ है वह इस पृथ्वी पर की भू-भाग की अलग अलग आबोहवा के अनुरुप से सर्वथा योग्य ही है। किंतु एक भू-भाग की आबोहवा के अनुरुप की मान्यताए एवं सामाजीक रित रिवाज दुसरे भू-भाग की आबोहवा के अनुरुप योग्य नहीं हो सकते है। भारत जैसे गरम देश में जो सामाजीक रीतरीवाज योग्य है वह साइबेरीया जैसे शर्द प्रदेश में योग्य नहीं हो सकते। अरब जैसे मरुस्थल के सामाजीक रीत रीवाज युरोप जैसे हरियाले प्रदेश के लीये योग्य नहीं हो सकते। और युरोप जैसे सामाजीक रीतरीवाज दक्षिण अमेरिका के जंगलो के वातावरण के योग्य नहीं हो सकते।

 

       इस पृथ्वी पर अलग अलग भू-भाग की आबोहवा प्रकृति के अनुरुप से जो धार्मीक मान्यताए वं सामाजीक रीतरीवाज होते है वह योग्य ही है। किंतु यह बात समजे बिना एक दुसरे की पंथ संप्रदायीक धार्मीक मान्यता एवं संस्कृति सभ्यता पर आक्रमण करना। दुसरे समुहो के रीतरीवाजो की रहने की पद्धति पर द्रेश करना, अपने पंथ संप्रदायीक मान्यताए एवं रीतरीवाज का जबरदस्ती प्रचार प्रसार करने के लीये निर्दोष लोगो को यातनाए देना निंदनीय अपराध है। एसी विनाषकारी विकृत पंथ संप्रदायीक मान्यता वाले समुदाय जो सभ्य संस्कृति पर मानव मुल्यो पर संकट हो नैसर्गीक धर्म मान्यता पर संकट हो उनका उनके समुदायका बहीश्कार एवं विरोध सबको मीलके करना चाहीये।

 

       ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही इस पृथ्वी के सब जीवो का पालन पोषण करते है सबकी करता धरता है। सभी धटमाल सभी रुतुचक्र सुबह-शाम, दिन-रात जडचेतन सभी ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के आधीन है। हम जो देख रहे है जो सुन रहे है जो अनुभव कर रहे है वह सब ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा के आधीन है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही इस विश्व के समस्त मनुष्यो को शुद्ध समज देते है। किंतु इस विश्व का हर मनुष्य अपने संस्कार के गुणदोष से क्या समजता है यह एक अलग बात है इसी लीये ही इतने सरे पंथ संप्रदाय है इतने सारे मत मतान्तर है। किंतु सभी पंथ संप्रदाय के मत मतांतर में थोडा बहोत सत्य भी तो है और यह सब अलग अलग पंथ संप्रदाय के मान्यता एवं सा्ंस्कृतीक सभ्यता विकास ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा द्वारा ही तो है।

 

        हमे जो समज में आया वह हमारी विवेक बुद्धि के अनुरुप सही है किंतु हमने जो पंथ सम्प्रदाय में जन्म लीया उस पंथ सम्प्रदाय की मान्यता के ऐसे नियम रीत-रीवाज जिनके पालन से असुविधा हो दुसरे पंथ सम्प्रदायीक मान्यता के समुदाय के साथ संघर्ष हो ऐसे नियम पालन करना मुर्खता है अज्ञान है।

 

     सत्य तो यही हे की जीसका खंडन हो वह पंथ संप्रदाय हे और जीसका खंडन न हो वही धर्म है। कीसी भी पंथ संप्रदाय के प्रभाव में मनुष्य हमेशा अपने आपको अपने पंथ संप्रदाय को सच्चा और दुसरे पंथ संप्रदाय को एवं उनके अनुनाई समुदाय को असत्य साबीत करने को इतना जनुनी हो जाता हे की उसे यह भी विवेक नहीं रहेता की वह कब मनुष्य से पशु बन गया है।

 

        मनुष्य का जन्म मीला है तो सबसे बड़ा पंथ-सम्प्रदाय हमारे लीये सनातन धर्म ही होना चाहीए। प्रकृति के नियमो का अनादर कर धर्म के नाम पंथ सम्प्रदाय के नियम पालन से उटपटांग क्रियाए करना जीस से सुवीधा नहीं है एसे जड़ नियम का पालन करना वह धर्म नहीं किंतु अधर्म है। प्राचीन भारतीय ऋषिमुनीयो ने जो प्रकृती अष्टभुजा वाली माता ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा का गुणगान कीया है वही सर्वश्रेष्ठ है। ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा द्वारा जो संदेश दिया है उसी के अनुसार जीवन जीना वही श्रेष्ठ जीवन शैली है। भारतीय ऋषिमुनी ओ ने जो प्रकृति का स्वरुप समजाया है वो नियम से जीवन जीने वाला समुदाय या मनुष्य पर ही ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा की सदा ही सदकृपा बनी रहती है।

 

विश्व में उर्जा दो प्रकार की होती है एक सकारात्मक एवं दूसरी नकारात्मक शास्त्र अनुसर दोनों उर्जास्रोत का उद्गम ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा ही है। किंतु नकात्मक उर्जा को भेसे (महिसासुर) की उपमा दी गयी है और सकारत्मक उर्जा को दुर्गा की उपमा दी गयी है। और सकारत्मक उर्जा हमेसा नकारत्मक उर्जा का नाश करती है इसे लीये ॐ आदीअनादी शक्ति के अंश दुर्गा को महिसासुर मर्दिनी कहा गया है। महिसासुर (भैसा) आसुरी काली शक्ति ओ का रूप है, महिससुर की सेना में चंड एव मुंड (आक्रामकता एवं हिंसा) शुंभ एवं निशुम्भ (मिथ्याभिमान एवं अविवेक) रक्तबिज (आसुरी विचारधारा का बिज) है। आदीअनादी की दिव्य उर्जा से आसुरी काली शक्तिओ का नाष होने से आदीशक्ति को महिसासुर मर्दिनी कहा गया है। चंड एवं मुंड रूपी आक्रामकता एवं हिंसा का प्रभाव आपने प्रबल प्रचंड रूपसे समाप्त करने वाली चंडी चामुंडा महाशक्ति है। शुंभ निशुभ रूपी मिथ्या भिमान अविवेक को अपने विराट औलोकीक रूप से निर्मूल कर सबको आशीर्वाद देने वाली माँ दुर्गा निरंजनी है। रक्तबीज रूपी आसुरी विचारधरा का अपने विकराल रूप से सर्वनाष  करने वाली माँ महाकाली है। आसुरी प्रभाव के बाद जग कल्याणी त्रिगुणी शक्ति (माँ महासरस्वती, माँ महालक्ष्मी; माँ महाकाली) माँ वैष्णवी के प्रभाव को बढाया गया है।


     भारतीय उपखंड मे सनातन धर्म मान्यता मे माता श्री वैष्णोदेवी के दर्शन-पूजन का बहुत ही महत्व है जो त्रिगुणी शक्ति महामाया है। श्री सरस्वती देवी- -श्री महालक्ष्मी देवी- श्री महाकाली देवी इन तीनो श्री दैवी शक्ति का अलग अलग प्रभाव एवं महत्व है।

  

१. श्री सरस्वती देवी

  श्री सरस्वती देवी का आसन पीले रंग का है जो विध्या-ज्ञान-अनुशाषन का प्रतिक है। श्री सरस्वती देवी ज्ञान ,विध्या, संस्कार, कला, कारीगरी की अधिष्ठाता देवी है। समाज में विध्या-संस्कार-प्रेम-अनुशासन-विवेक-बुद्धि-गीत-संगीत-कला सब कुछ ही श्री सरस्वती देवी के साथ जुडा हुआ है जो पीले रंग के प्रभाव मे है।

   

  

२.   श्री महालक्ष्मी देवी

  श्री महालक्ष्मी देवी का आसन लाल रंग का है जो शुभकर्म -कर्मफल- धनधान्य एवं एैश्वर्य का प्रतिक है। श्री महालक्ष्मी देवी मनुष्य के द्वारा होते कर्म एवं कर्म फल के अधिष्ठाता देवी है। समाज में राष्ट्र में जो आर्थिक व्यवहार होता है जो व्यापर वृद्धि होती है जो समस्त लेन-देन होती है जीसके कारण सभी मनुष्यो का जीवन धोरण उच्च होता है। मनुष्य समूह-समाज समृद्ध कर्मफल श्री महालक्ष्मी देवी के साथ जुडा हुआ है जो लाल रंग के प्रभाव मे है।

   

३. श्री महाकाली देवी

   श्री महाकाली देवी का आसन नीले रंग का है जो युध्ध, वीरता, पराक्रम, शक्ति एवं सामर्थ्य का प्रतिक है।

         समाज जीवन में श्री महासरस्वती के प्रभाव से समाज संस्कारी हो, प्रेम मय हो, कला-संगीत- विज्ञान का बहुत ही विकाष होता हो। लोग अनुशासन प्रिय एवं विवेक बुध्धी से प्ररुब्ध हो। महालक्ष्मी के प्रभाव से धन-धान्य की विपुलता हो लोग प्रामाणीकता से कर्म महेनत करते हो चारो ओर सुख समृध्धी हो। किंतु समाज में धर्म मे राष्ट्र मे श्री महाकाली का प्रभाव न हो समाज में वीरता, पराक्रम, धर्म्युध्ध का प्रावधान ही न हो तो धर्म मे समाज मे राष्ट्र मे श्री महासरस्वती एवं श्री महालक्ष्मी का प्रभाव कीतने समय तक चिरकाल रह शकेगा ?

 

         श्री महाकाली देवी जो रक्तबीज असुर का संहार करने वाली देवी शक्ति है। ऐसी विनाषकारी पंथ संप्रदायीक सोच जो सदियों से फलती फुलती आई हो और मनुष्य सभ्यता पर धर्म संस्कारो पर संकट बन चुकी हो। एसी विकृत विनाषकारी सोच वाले एक असभ्य आतंकी का वध करो तो दुसरे दस असभ्य आतंकी विकृत विनाषकारी सोच के झंडे लेकर खड़े हो जाते है। श्री महाकाली देवी खप्पर में असुरो का रक्त पीती है। अर्थात ऐसी विकृत पंथ संप्रदायीक विनाषकारी सोच का सर्वनाष करने के लीये पहले अपने आप को उस विकृत सोच से पुर्ण अवगत करवाना पडता है। उस विकृत विनाषकारी सोच को अपने रक्त में उतार के वह विकृत पंथ संप्रदायीक सोच से भी बड़ी शुध्ध सनातन धर्म अनुरुप सोच का प्रभाव बडाना पडता है। उस असुर असभ्य आतंकी से भी ज्यादा बड़ा विकराल स्वरूप धारण करना पडता है। श्री महाकाली की जीह्वा मुखसे बहार लंबी है अर्थात बौध्धीक वार तो शुध्ध तर्क दे जीह्वा से देकर आसुरी सोच का खंडन करना पडता है उस का प्रतिक है। हमे उन की हर बात का खंडन कर उन को बौध्धीक रुप से तोड देना है। श्री सदाशिव जो ध्यान, धर्म, नीती, अघोर, प्रेम की उच्च अवस्था के देव है किंतु असभ्यता और असुरो का सर्वनाष करने के लीये श्री सदाशिव के अनमोल ज्ञान को भी विपत्ति काल मे धर्मरक्षा के लीये भूल जाना पड़ता है। इसलीये श्री महाकाली देवी को श्री सदाशिव की छाती पर पैर रखे हुए दर्शाए गए है। जब धर्म संस्कार संकट मे हो मातृभुमी संकट मे हो पुरी मानव सभ्यता संकट मे हो तब श्री महाकाली का प्रचंड स्वरूप धारण कर के श्री सदाशिव के धर्मज्ञान, प्रेम सारे निती नियम की छाती पर पांव रख आसुरत्व का काल बन कर आगे निकलना पडता है। चंडप्रचंड स्वरुप धारण कर एक एक कर के उस विकृत विनाषकारी पंथ संप्रदायीक सोच का फेलावा करने वाले असुरो का आतंकीयो का सर्वनाष करना पडता है।

 

     धर्म यह कहता है पहेले अपने अंदर ही प्रचंड उर्जा शक्ति का वास करे जो धर्मज्ञान से संभव है। अपने सनातन धर्म को अपने जीवन मे उतार धर्म का पालनकर धर्मयोध्धा बने। श्री महाकालीदेवी रक्षण एवं भक्षण के अधिष्ठाता देवी है जो समाज में सम प्रमाण में यह त्रिगुणी शक्ति श्री माता वैष्णवी का महत्व है वह समाज चौमुखी विकास साधकर धर्मस्थापना करने को समर्थ बनता है। पीला रंग श्री महासरस्वती देवी –लाल रंग श्री महालक्ष्मी देवी –नीला रंग श्री महाकाली देवी इन तीनो शक्ति के साथ ॐ महाचेतना का शुध्ध पवित्र सफेद श्वेत रंग मीलेगा वहा समाज राष्ट्र धर्म सर्वांग विकाष करेगा।


     सनातन शाक्यधर्म को धारण करने वाले सभी सनातनी मनुष्यों को प्रात काल शुबह अपनी कुलदेवी की पूजा प्राथना कर ॐआदीशक्ति श्री जगतजननी जगदंबा को याद कर, विश्व कल्याणी देवी ॐआदीशक्ति के दिव्य अंश भारतवर्ष के सभी शक्ति पिंड स्वरुप देवी दुर्गा की संस्कृत स्तुति महिससुर मर्दिनी श्रोत्रम को लाय्बध्ध गा कर सामूहिकता से घरघर में दैवी उर्जा का प्रभाव बढ़ाना चाहीए।